ईस्टर्न रेलवेमेंस यूनियन की घोषणा.

श्रम कोड श्रमिक वर्ग के एकजुट व्यापक प्रतिरोध से ही इन कानूनों को रद्द करवाना हमारा मार्ग है।
बीएमएस को छोड़कर देश की लगभग सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की तीखी आपत्तियों के बावजूद, सरकार ने जबरदस्ती श्रम संहिताओं को लागू कर दिया। सरकार दावा करती है कि यह फैसला उन्होंने ट्रेड यूनियनों के साथ लंबी बातचीत के बाद लिया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह दावा पूरी तरह असत्य है—इस विषय पर कोई भी सार्थक या गंभीर चर्चा नहीं हुई।
श्रम कानूनों में बदलाव की योजना मोदी सरकार के कार्यकाल में 2017–18 से ही सामने आने लगी थी। तभी से ERMU सहित सभी यूनियनों ने सरकार को अपने सुझाव, दस्तावेज, तर्क और तथ्य सौंपे। परंतु सरकार ने केवल “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस”, “कंप्लायंस आसान करने” और “कवरेज बढ़ाने” के नाम पर, मजदूरों के अर्जित अधिकारों को कम करने का ही रास्ता चुना। सरकार का दावा है कि श्रम संहिताएँ मज़दूरों के अधिकार, कवरेज और सुरक्षा को बढ़ाएँगी। यह सब महज़ छलावा है। वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है।
श्रम संहिताएँ लागू होने पर मज़दूरों की सुरक्षा लगभग समाप्त हो जाएगी। कानून का दायरा घट जाएगा। कार्यस्थल सुरक्षा, वेतन, सामाजिक सुरक्षा—हर क्षेत्र में अधिकार सिकुड़ेंगे। और सबसे ख़तरनाक बात यह है कि मज़दूरों की सामूहिक आवाज़ व संगठन क्षीण होंगे। यूनियनों की भूमिका सीमित कर दी जाएगी। 51% वोट न मिलने पर किसी भी यूनियन को मान्यता नहीं दी जाएगी। सामूहिक सौदेबाज़ी के अधिकार को संकुचित कर दिया जाएगा।
यूनियनों ने हर स्तर पर सरकार को वैकल्पिक प्रस्ताव दिए। उदाहरण के तौर पर, सरकार ने फ़ैक्टरीज़ ऐक्ट, इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स ऐक्ट और कई अन्य कानूनों में ऊपरी सीमा (थ्रेशोल्ड) बढ़ाने का प्रस्ताव दिया। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। नए श्रम संहिताओं से और अधिक कारखाने तथा श्रमिक कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएँगे। न्यूनतम अधिकार, रोज़गार सुरक्षा, काम का माहौल—सब कमजोर होंगे।
जबकि यूनियनों ने स्पष्ट रूप से तर्क दिया था कि आधुनिक तकनीक के कारण कम श्रमिकों से अधिक उत्पादन संभव है। बड़े कारखाने छोटे-छोटे टीमों में बदल रहे हैं। ऐसे में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऊपरी सीमा कम की जानी चाहिए, बढ़ाई नहीं। लेकिन सरकार ने इन तर्कों को नज़रअंदाज़ किया और उल्टा रास्ता अपनाया।
श्रम संहिताओं के हर शब्द में यही सच्चाई छिपी है—जहाँ सरकार कहती है “अधिकार बढ़ेंगे”, वहाँ असल में अधिकार घट रहे हैं। जहाँ कहती है “कवरेज बढ़ेगा”, वहाँ दरअसल सिमट रहा है। जहाँ कहती है कि Take Home Pay बढ़ेगा, वहाँ मज़दूरों की सौदेबाज़ी क्षमता तोड़कर कम वेतन, अस्थिर रोजगार व चरम असुरक्षा को स्थायी किया जा रहा है।
22 नवंबर को प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो द्वारा जारी सरकार के बयान को ERMU तथा अन्य ट्रेड यूनियनों ने बिंदुवार खंडित किया है। तथ्य और तर्कों के साथ स्पष्ट किया है कि सरकार के हर दावे झूठे हैं। यह सिद्ध किया गया है कि श्रम संहिताएँ मज़दूर–हितैषी नहीं, बल्कि पूरी तरह मज़दूर–विरोधी हैं। कॉरपोरेट पूँजी के हित में यह मजदूरों के अधिकारों की निर्मम कटौती है।
गिग और प्लैटफ़ॉर्म श्रमिकों के लिए तो कोई भी न्यायसंगत रोजगार संबंध मान्य नहीं है। कोई नियमन नहीं है। ऐसे में सरकार का “सोशल सिक्योरिटी” देने का दावा सरासर धोखा है। जब रोजगार संबंध ही नहीं, तो सुरक्षा दे किसे?
गिग अर्थव्यवस्था का पूरा ढांचा ही अनिश्चितता पर आधारित है। सरकार उसी मॉडल को बढ़ावा दे रही है। डिलीवरी व परिवहन क्षेत्र में वाहन, ईंधन, रखरखाव—सब कुछ श्रमिक के अपने खर्चे पर। दिनभर की सीमाहीन मेहनत के बाद भी ऐप मालिकों द्वारा उनकी आय में अवैध कटौती की जाती है। और इन ऐप मालिकों की पहचान तक स्पष्ट नहीं होती।
अमेज़न, स्विगी जैसी कंपनियों के प्लेटफ़ॉर्म पर लाखों लोग काम करते हैं, पर कंपनी की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती। यही हाल ओला, उबर, रैपिडो जैसे परिवहन प्लेटफ़ॉर्मों में है। श्रमिकों की सुरक्षा पर सरकार का कोई ध्यान नहीं। उलटे उनकी कमाई लूटी जा रही है। अपना वाहन, ईंधन, रखरखाव—सबका खर्च श्रमिक का; और ऊपर से आय पर अवैध कटौती। यह पूरा तंत्र अवैध होते हुए भी सरकार उसे बढ़ावा दे रही है।
सरकार कहती है “सबको न्यूनतम मज़दूरी”, लेकिन यह पूर्णतः झूठ है। देश के 70% से अधिक श्रमिक आज भी कानूनी न्यूनतम वेतन नहीं पाते। श्रम संहिता में जिस न्यूनतम वेतन की बात है, वह सार्वभौमिक नहीं। सरकार का “चार स्तरीय राष्ट्रीय वेतन” भी वास्तव में राष्ट्रीय नहीं। यह क्षेत्र के अनुसार बदलता है। सरकार का “सबके लिए न्यूनतम वेतन” दावा छलावा है।
अब आता है Fixed Term Employment का मुद्दा। सरकार कहती है कि 2–3 साल के अनुबंध वाले श्रमिकों को नियमित श्रमिकों के समान लाभ मिलेंगे। यह दावा भी पूर्णतः झूठ है। वास्तविकता में फिक्स्ड टर्म श्रमिकों को नियमित श्रमिकों से कहीं कम वेतन मिलता है और सुविधाएँ लगभग नहीं के बराबर। अनुबंध समाप्त होने की अनिश्चितता के कारण वे कोई माँग भी नहीं उठा सकते। मालिक इसी भय का लाभ उठाते हैं।
एयर इंडिया और एलायंस एयर का उदाहरण इसका स्पष्ट प्रमाण है—फिक्स्ड टर्म श्रमिक वर्षों तक कम वेतन पर काम करते रहे। यानी कानून जो कहता है, ज़मीन पर वह लागू नहीं होता। सरकार का दावा कि फिक्स्ड टर्म श्रमिकों को समान वेतन मिलेगा—पूरी तरह झूठ है।
सरकार का यह दावा भी हास्यास्पद है कि “श्रम विवाद जल्दी निपटेंगे।” श्रम विभाग की भूमिका कमजोर कर दी गई है। निरीक्षण हटा दिए गए हैं। उनकी जगह ‘फैसिलिटेशन’ आया है। जब निरीक्षण का अधिकार नहीं, तो विवाद निपटारा और कठिन हो जाएगा। आज देश में 12 लाख से अधिक श्रम विवाद लंबित हैं। एक विवाद का निपटारा 3–5 साल लेता है। कई मामलों में निर्णय से पहले श्रमिक की मृत्यु भी हो चुकी है। श्रम संहिता इस स्थिति को और बदतर बनाएगी।
“समझौता मशीनरी” का उपयोग श्रमिकों की हड़ताल के अधिकार को सीमित करने के हथियार के रूप में किया जा रहा है। सामूहिक संघर्ष कुचलने का यही असली उद्देश्य है।
सरकार दावा करती है कि श्रमिकों को सशक्त किया जाएगा। पर सच्चाई उलटी है—मजदूरों पर एक नई श्रम-दासता थोप दी जा रही है। 400 से अधिक अपराधों को डिक्रिमिनलाइज़ कर दिया गया है। यानी मालिक कानून तोड़ें तो जेल नहीं होगी, केवल जुर्माना देकर बच जाएँगे। इससे कानून तोड़ने को बढ़ावा मिलेगा। यह अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति है।
यह सब एक संगठित धोखाधड़ी है। श्रमिक वर्ग पर चौतरफा हमला हो रहा है। नई श्रम संहिता उसका केंद्र है। उद्देश्य केवल आर्थिक शोषण नहीं—बल्कि मज़दूरों की सामूहिक शक्ति को तोड़ना और लोकतंत्र की अवसर-संरचनाओं को कमजोर करना है।
पहली बात—श्रमिकों के संगठित विरोध को अपराध घोषित करने का प्रयास किया जा रहा है। भारतीय न्याय संहिता 111 जैसी धाराओं से किसी भी ट्रेड यूनियन गतिविधि को अपराध ठहराया जा रहा है। कई यूनियन नेताओं को इसी आधार पर गिरफ्तार किया गया और महीनों जेल में रखा गया।
दूसरी ओर मालिकों को लगभग पूर्ण सुरक्षा दे दी गई है। वेतन रोकना, अचानक छँटनी—इन पर अब कोई आपराधिक दंड नहीं। यह पक्षपात स्पष्ट करता है कि श्रम संहिता मजदूरों पर आधुनिक दासता थोपने की योजना है।
लोकतंत्र के साथ इसका संघर्ष मौलिक है। श्रमिक अधिकारों को कम करना मतलब जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करना। सरकार लोकतांत्रिक ढांचा चलते रहने का दिखावा करते हुए भीतर से उसे खत्म कर रही है।
फिर भी मजदूर झुके नहीं हैं। कई राज्यों में 12 घंटे के काम के प्रयास को श्रमिकों ने रोका। कर्नाटक में 3 लाख से अधिक मजदूरों के संघर्ष से 1200 से अधिक कारखानों में 8 घंटे का काम बहाल हुआ। कई राज्यों ने कानून बदले हैं, पर सरकार संहिताओं को पूरी तरह लागू करने से डर रही है—क्योंकि मजदूरों का प्रतिरोध अभी भी मजबूत है।
श्रम संहिताएँ सितंबर 2020 में संसद से पारित हुईं। 26 नवंबर 2020 को ऐतिहासिक देशव्यापी आम हड़ताल हुई। उसी दिन किसान आंदोलन शुरू हुआ। तब से हर वर्ष 26 नवंबर को ERMU सहित सभी यूनियनें प्रतिरोध दिवस मनाती हैं।
इस वर्ष स्थिति और अधिक विस्फोटक है। सरकार द्वारा झूठे बयान जारी कर श्रम संहिताएँ लागू करने की घोषणा के बाद देशभर में स्वतःस्फूर्त विरोध शुरू हो गया है। कई राज्यों में मजदूर प्रदर्शन, रैली और श्रम संहिता की प्रतियाँ जलाकर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। 26 नवंबर को जिला स्तर तक विशाल मोर्चे निकले। और बड़ी लड़ाई की तैयारी जारी है।
सच्चाई सिर्फ एक है—श्रम संहिताओं के खिलाफ संघर्ष के अलावा कोई रास्ता नहीं।
यह सिर्फ वेतन या काम के घंटे की लड़ाई नहीं, बल्कि देश को लूट–तंत्र से बचाने की लड़ाई है। मजदूर, किसान और मेहनतकश लोग इस लड़ाई की अग्रिम पंक्ति में हैं। ये संहिताएँ इन्हें निरस्त्र करने का औजार हैं, ताकि कॉरपोरेट लूट का जंगलराज कायम किया जा सके।
यह लड़ाई शुरू हो चुकी है। और इस लड़ाई की गति व संभावनाएँ बताती हैं कि मजदूर किसी भी अन्याय के आगे झुकने वाले नहीं। ERMU इस लड़ाई को एक चुनौती मानकर—डिपो, शॉप, एरिया—हर स्तर पर मजदूरों के बीच जाकर इस विनाशकारी श्रम संहिता के परिणाम समझाकर जन–प्रतिरोध खड़ा करेगी।
सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाकर 22 दिसंबर को लखनऊ में AIRF सम्मेलन में सर्व–भारत स्तर पर दिल्ली में विशाल धरना–समावेश आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। सरकार जब तक इन कानूनों को वापस नहीं लेती—संघर्ष जारी रहेगा।
आइए संकल्प लें—इस मज़दूर–विरोधी कानून को हम रद्द करवाकर ही दम लेंगे। यह रेल मजदूरों की भी अस्तित्व–और–अधिकार की लड़ाई है। यह लड़ाई लड़नी होगी, और यह लड़ाई हम जीतेंगे।
ईस्टर्न रेलवेमेंस यूनियन
