अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा ने बिजली (संशोधन) बिल 2025 और नए बीज बिल 2025 की निंदा की

अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा (AIKMS) की अपील

अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा (AIKMS) ने 8 दिसंबर 2025 की अपनी अपील में देश के सभी मेहनतकश लोगों और किसानों से अपील की है कि वे हर गांव में बिजली (संशोधन) बिल 2025 (EAB 2025) और नए बीज बिल (NSB) के ड्राफ्ट की कॉपियां जलाएं।

अपील में बताया गया है कि EAB 2025 कैसे आम लोगों को अंधेरे में धकेल देगा। एक बार जब यह बिल कानून बन जाएगा, तो इससे बिजली वितरण प्राइवेट कंपनियों को सौंपना आसान हो जाएगा, जिससे काम करने वाले लोगों और किसानों के लिए बिजली के भाव में भारी बढ़ोतरी होगी।

यह अपील यह भी बताती है कि किस प्रकार NSB पूरी बीज आपूर्ति बड़ी निजी कंपनियों को सौंप देगा। एक बार NSB कानून बन जाने के बाद, केवल बड़ी कंपनियों को ही केंद्र और राज्य सरकारों से बीज बेचने का लाइसेंस मिलेगा, जिससे पूरा बीज बाज़ार उनके नियंत्रण में चला जाएगा। इससे किसान कॉरपोरेट-नियंत्रित फसल उत्पादन और विपणन (मार्केटिंग)की इच्छाओं पर निर्भर हो जाएंगे, जैसा कि कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग अधिनियम के माध्यम से योजना बनाई गई है।

अपील में कहा गया है कि एक तरफ तो किसान सभी फसलों के लिए फायदेमंद MSP के लिए आंदोलन कर रहे हैं और देश भर के मजदूर गारंटीकृत जीविका-योग्य मजदूरी और नौकरी की सुरक्षा के लिए आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ सरकार असल में ऐसे कदम उठा रही है जिससे किसानों और हमारे देश के सभी मेहनतकश लोगों की रोजी-रोटी और खतरे में पड़ जाएगी।


8 दिसम्बर 2025, संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर एआईकेएमएस की अपील

गांव-गांव में बिजली बिल 2025 तथा नया बीज बिल की प्रतियां दहन करो।

बिजली बिल आम लोगों को अंधेरे में धकेल देगा।

बीज बिल सम्पूर्ण बीज आपूर्ति कम्पनियों के हवाले कर देगा।

केंद्र सरकार बिजली बिल 2025 लेकर आई है जिसमें बिजली उत्पादन, पारेषण और वितरण को सरकारी क्षेत्र से समाप्त कर निजी कम्पनियों को सौंपा जाएगा। विधेयक कहता है कि अब बिजली आपूर्ति कम्पनियों के मुनाफे की गारंटी करने के सिद्धान्त पर की जाएगी। बिजली बिल के माध्यम से केंद्र सरकार पूरे बिजली क्षेत्र को निजी कंपनियों के हवाले कर कॉरपोरेट्स की अंधी लूट का रास्ता साफ कर रही है। जो सरकार किसानों को न्यूनतम, मुनाफा जनक फसल मूल्य निर्धारित नहीं कर रही, जो मजदूरों को जीने वाली न्यूनतम मजदूरी की गारंटी नहीं कर रही, वो कम्पनियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए गरीब मेहनतकश जनता से बिजली की मंहगी वसूली करने का कानून लेकर आयी है।

जब बिजली विभाग अस्तित्व में आया था, तब बिजली उपभोक्ताओं को दो प्रकार में माना गया था: पहला, साधारण उपभोक्ता, जो पंखा, बल्ब, फ्रिज़, इस्त्री आदि जैसे घरेलू कामों के लिए बिजली का उपयोग करते थे। दूसरा, वे लोग जो मुनाफा कमाने के लिए बिजली का उपयोग करते थे, जैसे उद्योगपति, फैक्ट्री मालिक और अन्य कारोबारी। साधारण उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली देने के लिए सरकार कुछ पैसा सब्सिडी के रूप में देती थी, और जो लोग मुनाफा कमाने के लिए बिजली का उपयोग करते थे, उनसे अधिक दर ली जाती थी, जिसे क्रॉस-सब्सिडी कहा जाता है। लेकिन अब, बिजली बिल में साधारण उपभोक्ता और मुनाफा कमाने वाले बड़े कारखानेदार, दोनों को एक जैसी दरें चुकानी होंगी।

इससे किसानों, मजदूरों, व्यापारियों, घरेलू उपभोक्ताओं, मध्य वर्ग व छोटे उत्पादकों के लिए बिजली उपभोग बेहद मंहगा हो जाएगा, लोगों से बिजली बिलों की जबरन वसूली की जाएगी और स्मार्ट मीटर अमल करके पहले पेमेंट करने और पैसा खत्म होने से बिजली अपने आप कटने की व्यवस्था बन जाएगी। स्मार्ट मीटर में यह भी व्यवस्था है कि पीक आवर्स यानी दिन की उस अवधि में जब खपत ज्यादा होती है, जैसे शाम 5 से 8 और सुबह 7 से 9 बजे तक सामान्य से अधिक रेट लिया जाएगा, जो लगभग 24 रुपये यूनिट करने की चर्चा है। यह प्रीपेड रिचार्ज फोन की तरह है, जिसमें पहले पूरे महीने 10 रुपये में बात हो जाती थी अब 300 रुपये भरना पड़ता है।

इसका मतलब यह नहीं कि एक यूनिट बिजली बनाने में कितने रुपये लगते हैं, बल्कि इसका मतलब है कि आपके घर तक बिजली पहुँचाने में जो भी खर्च होगा, उसके आधार पर रेट तय होगा। मान लो तूफान, चक्रवात या किसी और कारण से बिजली सप्लाई टूट जाती है, खंभे, तार, ट्रांसफॉर्मर जल जाते हैं, टूट जाते हैं या खराब हो जाते हैं, पहले जब वितरण क्षेत्र सरकारी था, तब इन सबकी मरम्मत की जिम्मेदारी सरकार की होती थी। अब निजी कंपनियाँ यह पूरा खर्च आम लोगों से वसूलेंगी। आम लोग पैसा देंगे तो बिजली सप्लाई बहाल होगी; नहीं देंगे तो बिजली कटी रहेगी। जितना ज्यादा नुकसान होगा, उतना ही ज्यादा बोझ, लाखों रुपये तक, लोगों पर डाला जाएगा, जिससे समाज का बड़ा हिस्सा अंधेरे में बैठने को मजबूर हो जाएगा। जैसे प्राइवेट स्कूल, प्राइवेट कॉलेज, प्राइवेट अस्पताल या अन्य निजी संस्थान कोई रियायत नहीं देते, पैसा है तो सेवा मिलेगी, नहीं है तो नहीं, उसी तरह, बिजली भी तभी चलेगी जब आपके पास पैसे होंगे; नहीं तो आप अंधेरे में ही रहेंगे। बिजली बिल 2025 के साथ बिजली विभाग के नियमित मजदूरों की बड़े पैमाने पर छंटनी होगी।

मोदी सरकार ने 2014 में दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत घर-घर बिजली देने की योजना चलाई थी जिसमें हर घर को कनेक्शन दिया गया था, जिनमें से बहुत सारे केवल कागजों पर थे। इन कागजी कनेक्शनों से भी तथा गरीबों की बढ़ती बदहाली के बावजूद उनके बकाया बिलों की हजारों रूपये की वसूली आज तेजी से की जा रही है।

विधेयक 2025 को वापस लेने, स्मार्ट मीटरों की स्थापना रोकने, कृषि ट्यूबवेलों के लिए मुफ्त बिजली देने और सभी घरेलू उपभोक्ताओं को 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने की माँग की जानी चाहिए। आधुनिक जीवन में बिजली दैनिक कामकाज और आजीविका की अनिवार्य जीवन-दाता है। सरकार के इस कदम की निंदा करते है कि इस आवश्यक साधन को कंपनियों के लाभ कमाने के साधन में बदलने की कोशिश का विरोध करना चाहिए।

बीज बिल

सरकार का दूसरा बड़ा हमला है, बीज बिल 2025। इसके अनुसार कोई भी छोटा या मध्यम व्यापारी या दुकानदार बिना रजिस्ट्रेशन के बीज नहीं बेच सकेगा। केवल बड़ी कंपनियों को ही केंद्र और राज्य सरकारों से बीज बेचने का लाइसेंस मिलेगा, जो सारे बीज बाजार पर काबिज हो जाएंगी। बीज पर नियंत्रण का अर्थ है सारी फसल पैदावार पर नियंत्रण। दुनिया की छह बड़ी कंपनियों ने अब दुनिया के 75ः से अधिक बीज, कृषि अनुसंधान और कीटनाशकों पर कब्जा कर लिया है। बड़ी कंपनियाँ ऐसे बीज बनाती हैं जिनमें अधिकतम खाद और अधिकतम स्प्रे की जरूरत पड़े, ताकि वे किसानों का बड़े पैमाने पर शोषण कर सकें और अगर इन कंपनी बीजों के कारण किसानों को नुकसान होता है, तो बीज बिल में मुआवजे या जिम्मेदारी का कोई जिक्र नहीं है।

स्वाभाविक रूप से, बीजों के मुक्त आयात का अर्थ है कि सरकार समय पर अच्छी गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रही है, जिससे खाद्य फसलों की समय पर बुवाई और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। यह किसानों को कॉर्पोरेट नियंत्रित फसल उत्पादन और विपणन की इच्छाओं पर निर्भर कर देगा, जैसा कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अधिनियम के माध्यम से योजनाबद्ध था। इससे भारतीय खेती का चरित्र पूरी तरह बदल जाएगा, आत्मनिर्भर और आजीविका-आधारित खेती से हटकर कॉर्पोरेशनों के लिए वाणिज्यिक फसलों की आपूर्ति करने वाला मॉडल बन जाएगा।

यह विधेयक बीजों और रोपण सामग्री के मुक्त आयात की अनुमति देता है, वह भी बिना पंजीकरण के, तथा इसमें देश की खाद्य सुरक्षा की आवश्यकताओं और संवहनीय खेती की आर्थिक व्यवहार्यता तथा किसानों की वित्तीय स्थिरता के अनुसार गुणवत्तापूर्ण सस्ते बीजों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने का कोई उल्लेख नहीं है। केवल प्रावधान यह है कि आपूर्तिकर्ताओं और व्यापारियों का पंजीकरण किया जाए, बीजों और पौधों की जाँच और प्रमाणन की सुविधा हो, और गंभीर अपराधों के लिए अभियोजन की व्यवस्था हो।

बीज बिल कहता है कि विदेशी कंपनियां बिना पंजीकरण कराये बीज का खुला आयात कर सकती हैं और पर्यावरण की सुरक्षा और बीज की उत्पादकता परीक्षण की गारंटी आत्म-प्रमाणन द्वारा किया जाएगा। विधेयक में सभी विक्रेताओं के पंजीकरण और ‘सीड इंस्पेक्टर’ की व्यवस्था है जो जाहिर बात है जो छोटे विक्रेताओं को कम्पनियों के हित में नियंत्रित करने का काम कराएंगे।

हमें इसका विरोध करना चाहिए और इसे वापस लेने की माँग करनी चाहिए, साथ ही सरकार की जवाबदेही तय करने का आह्वान करना चाहिए। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को पहले भी बीजों के आयात और बिक्री की अनुमति दी गयी थी, हरित क्रांति के समय और बाद में बीटी बीजों के माध्यम से। भारत को भारतीय कृषि-जलवायु स्थितियों तथा भारतीय लोगों की आवश्यकताओं के अनुरूप बीजों के विकास की आवश्यकता है। यह विधेयक उस आवश्यकता को पूरी तरह कमजोर कर देता है।

अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा (ए.आई.के.एम.एस.)

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