चार लेबर कोड मजदूर विरोधी, किसान-विरोधी, मेहतनकश-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी हैं। ये कोड 50 करोड़ मजदूरों को गुलाम बनाने के लिये लाये गये हैं। – कॉम. संतोष कुमार

7 दिसंबर 2025 को चार श्रम संहिताओं को रद्द करने की मांग के लिए AIFAP की मीटिंग में मजदूर एकता कमेटी के कॉम. संतोष कुमार का भाषण

ऑल इंडिया फोरम अगेंस्ट प्राइवेटाईजेशन का मैं बहुत आभारी हूं कि उन्होंने मजदूर एकता कमेटी को बोलने का मौका दिया।

पूर्व वक्ताओं ने बहुत अच्छे से 4 श्रम संहिताओं के बारे में बताया है। यह चार श्रम संहिताएं मजदूरमेहनतकशों के घोरविरोध के बावजूद इसको केंद्र सरकार ने पास किया है। ये चार लेबल कोड मजदूर विरोधी, किसानविरोधी, मेहतनकशविरोधी और राष्ट्रविरोधी हैं। ये कोड, 50 करोड़ मजदूरों को गुलाम बनाने के लिये लाये गये हैं।

केंद्र सरकार ने जिन चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को 21 नवंबर 2025 से लागू करने का आदेश दिया है,उनके नाम हैं:

  1. मज़दूरी संहिता (कोड ऑफ वेजेज) 2019,
  2. औद्योगिक संबंध संहिता (इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड) 2020,
  3. सामाजिक सुरक्षा संहिता (कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी) 2020
  4. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की हालातें संबंधित संहिता (ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड) 2020यह कोड 21 नवंबर 2025 से लागू हो गयी हैं।

सरकारी प्रवक्ता और पूंजीपति व्यवस्था के समर्थक बुद्धिजीवी दावा कर रहे हैं कि ये श्रम संहिताएं, काम पर लगे मज़दूरों की भलाई और सुरक्षा को बढ़ावा देंगीं। वे यह दिखावा कर रहे हैं कि बिना किसी अपवाद के, सभी मज़दूरों को लिखित नौकरी अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) मिलेगा और उन्हें न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा (सोशल सिक्योरिटी), सालाना स्वास्थ्य परीक्षण (हेल्थ चेकअप) और दूसरे फायदे मिलेंगे। ये सरासर झूठ हैं। सच तो यह है कि अभी इस समय, करोड़ों मज़दूरों को इन सब अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, और श्रम संहिताएं (लेबर कोड) लागू होने के बाद और भी अधिक, और बहुत से मज़दूरों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा।

नए कानून, कॉन्ट्रैक्टमज़दूरों के इस्तेमाल का दायरा और भी अधिक बढ़ा देते हैं। जो लेबरकॉन्ट्रैक्टर 50 से कम मज़दूरों को नौकरी पर रखता है, उसे इन श्रम संहिताओं (लेबर कोड) के कई नियमों से छूट मिलती है। यह सीमा, पहले 20 थी अब उसे बढ़ाकर 50 कर दी गई है। अब पूंजीपति कई कॉन्ट्रैक्टर रख सकता है जिनमें से हर एक, 50 या उससे कम मज़दूरों को काम पर रखेगा, और इस तरह मज़दूरों के सभी अधिकारों का उल्लंघन करेगा। पहले ठेके के मजदूरों को ईएसआई, पीएफ, ग्रज्युटी देने का प्रावधान था, अब ठेकेदार को यह सब देने की जरूरत नहीं है। 12 मासी कामों के लिये भी 50-50 करके मजदूरों से काम करवाया जा सकता है।

ये संहिताएं (कोड), निश्चित अवधि के लिए रोजगार के इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं। जबकि कानून यह दावा करता है कि उन्हें नियमित मज़दूरों के जैसे ही सभी सुविधाएं मिलेंगी, यह वह कड़वा सच छिपाता है कि इन मज़दूरों के लिए कोई नौकरी की सुरक्षा (जॉब सिक्योरिटी) नहीं है।

स्थायी आदेश अधिनियम 1946 के तहत ऐसे नियम बनाये गए है जिनका पालन करना, 100 से ज्यादा मज़दूर रखने वाली किसी भी कंपनी के लिए अनिवार्य है जैसे सभी मज़दूरों को, काम के घंटे, छुट्टियां, वेतन किस दिन मिलेगा, मज़दूरी की दर (वेतन), नौकरी से निकालने और शिकायत सुलझाने के तरीकों के बारे में बताना जरूरी होता है। अब नए औद्योगिक संबंध संहिता (इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड) ने इस सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 कर दिया है, जिसके फलस्वरूप, बहुत सारे मज़दूर अब इन स्थायी आदेश अधिनियम (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) कानूनों के दायरे से बाहर कर दिए गए हैं।

करोड़ों मज़दूर, न्यूनतम वेतन के अधिकार से वंचित हैं क्योंकि उन्हें मज़दूर नहीं माना जाता, और उनके मेहनताने को भी मज़दूरी नहीं माना जाता है। जैसे कि आंगनवाड़ी और आशा मज़दूरों को स्वयंसेवक कहा जाता है और उन्हें वेतन नहीं बल्कि मानदेय दिया जाता है।

गिगवर्कर्स को व्यापारिक भागीदार (बिजनेस पार्टनर) कहा जाता है और उन्हें वेतन की जगह, बहुत कम और अनिश्चित मज़दूरी मिलती है। घरेलू काम करने वालों और कई दूसरे लोगों के पास कोई लिखा हुआ कोई नौकरी अनुबंध (जॉब कॉन्ट्रैक्ट) नहीं होता और इसलिए वे कानूनी तौर पर न्यूनतम वेतन के अधिकार का दावा तक नहीं कर सकते। नई मज़दूरीसंहिता (कोड ऑफ वेजेज), मज़दूरों को अपने अधिकारों से वंचित कराने वाली इन छूटों के बारे में कुछ नहीं बताता।

औद्योगिक संबंध संहिता (इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड), मज़दूरों की संख्या की न्यूनतम सीमा (मिनिमम कटऑफ) को 100 से बढ़ाकर 300 मज़दूर करता है, ताकि किसी कंपनी को बंद करने या मज़दूरों को नौकरी से निकालने के लिए सरकार की इजाजत ना लेनी पड़े। यह केंद्र और राज्य सरकारों को भी किसी भी समय एक अधिसूचना के जरिए इस न्यूनतम सीमा को बढ़ाने की भी इजाजत देता है।

औद्योगिक संबंध संहिता (इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड), और ओद्योगिक सुरक्षा संहिता (ऑक्यूपेशनल सेफ्टी कोड) – यह दोनों ही, सरकार को सार्वजनिक हित (“पब्लिक इंटरेस्ट”) और रोजगार पैदा करने (“एम्प्लॉयमेंट क्रिएशन”) के नाम पर किसी भी नई कम्पनी को इन नियमों का पालन करने से छूट देने की भी इजाजत देते हैं।

औद्योगिक सुरक्षा और स्वास्थ्य संहिता (ऑक्यूपेशनल सेफ्टी और हेल्थ कोड) में, खेतीबाड़ी करने वाले मज़दूर, छोटे निर्माण काम (कंस्ट्रक्शन) से जुड़े मज़दूर, घर से काम करने वाले मज़दूर, मछली पकड़ने वाले मज़दूर और घरेलू काम करने वाले मज़दूर शामिल नहीं हैं, जो कुल मिलाकर देश के मज़दूर वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा हैं।

ये श्रम संहिताएं (लेबर कोड) एक बार फिर दिखाती हैं कि पूंजीपति वर्ग, मज़दूरों को ऐसे अधिकार नहीं देना चाहता है जो सर्वव्यापी हों और जिन्हें उनसे छीना नहीँ जा सकते। वे उन्हें ऐसे विशेषाधिकार मानते हैं जो कुछ लोगों को दिए जा सकते हैं और कुछ को नहीं, और जिन्हें वे कभी दे सकते हैं और जब चाहें छीन भी सकते हैं।

यह श्रम संहिताएं 8 घंटे के काम को 12 करती हैं। हमारे देश के इजारेदार पूंजीपति सालोंसालों से श्रम कानून को बदलने के लिये मांग कर रहे थे। हमने देखा कि नारायणमुर्ति कहता है कि हिन्दोस्तान के मजदूरों को 70 से 72 घंटे काम करना चाहिये। सुबह 9 बजे से रात 9 बजे और हफते में 6 दिन काम करना चाहियें।

ये श्रम संहिताएं (लेबर कोड) कई मौजूदा कानूनों की जगह, नए कानूनों को लागू करने के लिए बनाई गयी हैं, जिनमें निर्माणमज़दूर, बीड़ी और नमक मज़दूरों से जुड़े मौजूदा कानून भी शामिल हैं। इन मज़दूरों ने, अब तक अपने जुझारू संघर्षों के द्वारा जो सब अधिकार जीते थे, उन्हें, आसान बनाने और श्रमकानूनों की संख्या कम करने के नाम पर, अब छीना जा रहा है।

ये श्रम संहिताएं, राज्यों के श्रमकानून बनाने के अधिकारों पर भी हमला है। हाल के सालों में, कई राज्यों में मज़दूरों ने अपने कुछ अधिकारों को मान्यता दिलाने के लिए बहुत जुझारू संघर्ष किए हैं। अब इन अधिकारों की जगह, केंद्र के द्वारा बनाये गए श्रमसंहिताएं लागू की जाएंगी, जो पूरी तरह से पूंजीपतियों के पक्ष में हैं। चारों श्रम संहिताओं (लेबर कोड) का मकसद, न सिर्फ मज़दूरों को उनके अधिकारों से वंचित करना है, बल्कि मज़दूरों के लिए हड़ताल करना भी बहुत मुश्किल बनाकर उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने के तरीकों से भी वंचित करना है।

औद्योगिक संबंध संहिता के मुताबिक, हड़ताल के लिए मज़दूरों को 14 दिन का नोटिस देना होता है। जैसे ही हड़ताल का नोटिस दिया जाता है, सुलह की कार्रवाई तुरंत शुरू हो जाती है और इस नोटिस के समय के दौरान हड़ताल नहीं की जा सकती है। अगर सुलह की कार्रवाई असफल होने के बाद मैनेजमेंट, ट्रिब्यूनल में आवेदन पत्र दाखिल करता है, तो हड़ताल को और टालना पड़ता है। पहला हड़ताल नोटिस 60 दिनों के बाद अमान्य (इनवैलिड) हो जाता है, और मज़दूरों को हड़ताल के लिए फिर से नोटिस देना पड़ता है। ये नियम अब तक सिर्फ “जरूरी सेवाओं” के मामले में लागू होते थे। अब ये सभी इंडस्ट्री और सेवाओं पर लागू होंगे।

मजदूरों शिकायत करने की कोई भी तंत्र नहीं, अगर उनको अधिकार नहीं मिलते हैं

पूंजीपतियों के मीडिया का दावा है कि ये श्रम संहिताएं (लेबर कोड) कथित तौर पर महिलाओं को मजबूत बनाने की प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं क्योंकि अब महिलाओं को अगर वे चाहें तो रात की शिफ्ट में काम करने की भी इजाजत होगी। असलियत तो यह है कि काम की जगह और सार्वजनिकस्थानों पर सुरक्षा की इतनी ज्यादा कमी है कि रात की शिफ्ट में काम करना, महिलाओं के लिए एक सज़ा है, न कि उनके सक्षम (मजबूत) होने की निशानी।

पहले एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें लगातार निगरानी रखी जाति थी कि श्रमकानूनों का पालन हो रहा है या नहीं, – उस व्यवस्था को बहुत कमजोर किया जा रहा है।

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की हालातें संबंधित संहिता ने एक ऐसा व्यवस्था शुरू की है जिसमें मज़दूरों की शिकायतों के जवाब की जगह, अब एक कंप्यूटर प्रोग्राम तय करेगा कि किस फैक्ट्री या कंपनी का निरीक्षण किया जाना चाहिए। श्रमकानूनों का उल्लंघन करने वाले पूंजीपतियों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, बल्कि सिर्फ जुर्माना लगाया जाएगा।

पूंजीपतियों के कई प्रतिनिधि यह प्रचार कर रहे हैं कि मज़दूरों को यह सोच छोड़ देनी चाहिए कि उनके हित, पूंजीपतियों के हितों के ख़िलाफ़ हैं। उनका दावा है कि इन नई श्रमसंहिताओं (लेबर कोड) से पूंजीपतियों और मज़दूरों, दोनों को फायदा होगा। जीवन का अनुभव स्पष्ट बताता है कि पूंजीपतियों और मज़दूरों के हितों में कभी भी तालमेल नहीं हो सकता।

कम्युनिस्ट पार्टियां और मज़दूर वर्ग की यूनियनें, इन श्रम संहिताओं (लेबर कोड) की शुरुआत से ही लगातार इनका विरोध करती आ रही हैं। सरकार ने कॉंग्रेस और भाजपा द्वारा राज किए जाने वाले राज्यों सहित, अलगअलग राज्यों में लेबल कोड को लागू किया है।

यह हकीकत है कि इस लगातार विरोध के बावजूद, उन्हें लागू करने के लिए नोटिफाई किया गया है। ऐसा करना दिखाता है कि केंद्र सरकार, केवल पूंजीपति वर्ग की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध है। मौजूदा व्यवस्था में, हर सरकार दावा करती है कि उसे लोगों ने चुना है और वह लोगों की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, जीवन का अनुभव बताता है कि सरकार का काम, पूंजीपतियों के हितों के सेवा करने के लिए, सभी मामलों को अच्छी तरह से पूजीपतियों के लिए मैनेज करना है।

ये श्रम संहिताएं (लेबर कोड), पूंजीपतियों द्वारा बनाई गयी उस योजना का एक हिस्सा हैं, जिसके तहत वे मेहनतकश लोगों का शोषण करके, दुनिया की एक बड़ी ताकत बनने की अपनी कोशिश में आने वाली सभी रुकावटों को हटाना चाहते हैं।

मज़दूर वर्ग के लिए आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता, पूंजीपति वर्ग के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए अपनी एकता को और मजबूत करना है। हमें बिना किसी अपवाद के सभी मजदूरों के लिए काम करने की अच्छी हालातों को सुनिश्चित करने के लिए लड़ना होगा।

हमें पूरी राजनीतिक व्यवस्था को बदलने, और पूंजीपति वर्ग की हुकूमत की जगह पर मज़दूरों व किसानों की हुकूमत स्थापित करने के राजनीतिक उद्देश्य के साथ संघर्ष करना होगा। अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता लेकर, हमें उत्पादन के मुख्य साधनों को पूंजीपति वर्ग के हाथों से लेकर, उन्हें सामाजिक नियंत्रण में लाना होगा। हमें मज़दूरों और किसानों का एक नया राज्य बनाने के मकसद से संघर्ष करना होगा, जो मज़दूरों के सभी अधिकारों की गारंटी देगा और इस पूंजीवादी व्यवस्था से समाजवाद की ओर ले जाने की प्रक्रिया सुनिश्चित करेगा।

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