कलवा कारशेड लोकल प्लेटफॉर्म बनाने और सुरक्षित रेल यात्रा की अन्य मांगों के लिए रेल अभियान तेज किया गया

प्रथमेश, संयोजक, कलवा मुंब्रा रेलवे प्रवासी सुरक्षा संघर्ष समिति के द्वारा

मुंबई लोकल को मुंबई की जीवनरेखा कहा जाता है। आज हर रोज ७५ लाख से भी ज्यादा लोग मुंबई लोकल इस्तेमाल करते है। श्रमजीवी वर्ग के परिवारों से हर कोई रेलवे का इस्तेमाल करता है। काम की जगह पहुँचने के लिए या फिर कॉलेज स्कूल जाने के लिए, हॉस्पिटल में पहुँचने के लिए रेलवे ही सबसे तेज और किफायती है। आज रेलवे से यात्रा करना बहुत कठिन बन गया है। भीड़ इस कदर बढ़ी हैं कि सुबह और शाम लोगों को दरवाज़े के पास लगे हैंडल से लटकना पड़ता है—मवेशियों को ट्रेन में ढोने की सीमा हैं लेकिन इंसानों के लिए ऐसा कोई कायदा लागू नहीं होता।

9 जून 2025 को मुंब्रा में हुए रेलवे हादसे में 5 लोगों की मृत्यु हुई थी और कई घायल हुए थे। उसके तुरंत बाद मुंबई लोकल नेटवर्क के कई स्टेशनों पर कामगार एकता कमिटी की ओर से हस्ताक्षर अभियान तथा सुरक्षित रेलवे यात्रा के लिए मुहिम की गई थी। इसका रिपोर्ट सर्व हिन्द निजीकरण विरोधी फ़ोरम की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जा चूका है (https://hindi.aifap.org.in/14782/)। जब मुहिम जोर पकड़ी तो कई सारे रेलवे यात्रियों ने अभियान में शामिल होने के लिए उत्सुकता दिखाई। अभियान को सुचारु रूप से चलाने के लिए कामगार एकता कमिटी ने पहल लेकर 7 सितंबर 2025 को डोंबिवली-ठाकुर्ली-कोपर रेलवे प्रवासी सुरक्षा संघर्ष समिति और 12 अक्टूबर 2025 को कलवा-मुंब्रा रेलवे प्रवासी सुरक्षा संघर्ष समिति का गठन किया।

दोनों ही समितियाँ नियमित रूप से मिल रही है। समिति की बैठक में काम का मूल्यांकन किया जाता हैं और आगे की योजना बनाई जाती है। पर्चे सभी के सुझावों और स्वीकृति के साथ तैयार किए जाते हैं। समिति के सदस्यों से ही योगदान जुटाकर सभी खर्चे किए जाते है और खर्चों का हिसाब भी सभी के सामने बैठक में रखा जाता है । दोनों समितियों की सक्रियता की बजह से इस दौरान कई कार्यक्रम आयोजित किए गए है।

अखबारों तथा अधिकृत स्त्रोतों के आकड़ों के अनुसार, मुंबई लोकल नेटवर्क में पिछले वर्ष हर रोज औसतन 7 लोगों की मृत्यु हुई है। इनमें अधिकांश लोगों की मृत्यु ठाणे-कल्याण के बीच हुई है, जो मुंबई के उपनगर हैं। ठाणे के पास कलवा स्टेशन पर भीड़ के घंटों में चींटी भी ट्रेन के अंदर कदम नहीं रख सकती।

कलवा स्टेशन के पास एक कारशेड है जहा ट्रेनें रखरखाव के लिए लाई जाती है। सुबह कारशेड से रवाना होने वाली ट्रेनें एक क्रॉसिंग तक पहुँचती हैं और सिग्नल पर रुकती हैं। जब यह ट्रैन सिग्नल पे रुकी होती है, तब कलवा के निवासी पटरी से ही इसमें चढ़ जाते हैं—यहाँ कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं है। वे ऐसा इसलिए करते है क्यूँकि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। पिछले 30-40 सालों से कलवा के लोग मांग कर रहे हैं कि यहाँ प्लेटफॉर्म बनाया जाए ताकि यात्री कारशेड से निकलने वाली ट्रेनों में सुरक्षित रूप से चढ़ सकें। इसका समाधान करना तो दूर रहा, रेल प्रशासन अब वहाँ एक दीवार बनाकर लोगों को कारशेड ट्रेन पकड़ने से रोकना चाहता हैं।

इसीलिए हमने यह मांग की है कि कलवा कारशेड के लोकल के लिए एक होम प्लेटफॉर्म बनाया जाए, और जब तक यह प्लेटफॉर्म नहीं बन जाता तब तक दीवार का काम रोक दिया जाए। हमारी अन्य मांगे है:

• सभी ट्रेन 15 डिब्बों की चलाई जाए।
• आधुनिक सिग्नलिंग प्रणाली से दो ट्रेन के बीच के समय को कम किया जाएं।
• नई लोकल की खरेदी की जाए जिससे ट्रेन की संख्या 50% बढ़ेगी।
• पर्याप्त संख्या में रेलवे मोटरमेन, स्टेशन मास्टर, ट्रेक मेंटेनेर आदि रेलवे कर्मचारियों की भर्ती की जाए।
• हर स्टेशन पर बुनियादी सुविधा – जैसे स्वच्छ पीने का पानी, टॉइलेट की व्यवस्था, स्ट्रेचर हमाल, आपातकालीन मेडिकल रूम आदि की व्यवस्था की जाए।
• हर स्टेशन पर अधिकृत स्टेशन मास्टर नियुक्त किया जाए। पर्याप्त संख्या में टिकट खिड़कियां खोली जाए।

कलवा में जब यह अभियान चलाया गया तब कारशेड लोकल के प्लेटफॉर्म की मांग को लोगों का बहुत समर्थन मिला। कलवा-मुंब्रा समिति के सदस्यों ने स्टेशन पर, कारशेड लोकल में, कई रिहायशी इलाकों में हस्ताक्षर अभियान किया। डोंबिवली की कई रिहायशी इमारतों में घर घर जाकर लोगों से हस्ताक्षर जोड़े। समिति ने 2500 से भी अधिक लोगों के हस्ताक्षरसहित हमारी मांगों का पत्र 12 नवम्बर 2025 को मुंबई मण्डल के DRM ऑफिस में सहायक मंडल रेल प्रबंधक (ADRM) को सौंपा।

पत्र देने के बाद भी रेलवे अभियान को जारी रखा गया। कलवा के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग दिन रैली निकाली गई। आजतक पाँच रैलियां आयोजित की गई है, सभी रैलियों को कलवा के नागरिकों से बहुत उत्साहपूर्ण समर्थन मिला है। कई बार हमने कारशेड लोकल के अंदर तथा स्टेशन के परिसर में पत्रक वितरित किए है। इस अभियान ने लोगों की नब्ज पकड़ी है। कलवा की खाँस मांगों के लिए कलवा के स्टेशन मास्टर (कमर्शियल) को निवेदन दिया गया है तथा उनका कई बार फॉलो-अप किया गया है।

अभियान के दौरान ही महानगरपालिका के चुनाव की भी तैयारियां चल रही थी। समिति ने चुनाव के दौरान कई उमीदवारों को रेलवे के समस्याओं के बारे में अपनी भूमिका प्रकाशित करने तथा DRM और स्टेशन मास्टर को दिए पत्र का फॉलो-अप करने के लिए कहा। उन सभी ने सकारात्मक तरीके से हमारी मांगो का समर्थन किया तथा हमारा पत्र उनके पार्टी के सांसद तक पहुँचाने का वादा किया। लेकिन अनुभव यही रहा है कि चुनाव में वादे तो बहुत किये जाते है लेकिन असली काम होता नहीं। लेकिन यदि अभियान सक्रिय रहे, तो कुछ जीत हासिल की जा सकती हैं।

जब कि हमारे देश को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहां जाता है, लेकिन यहाँ चुनाव पूर्व वादों को न निभाने पर कोई शिक्षा नहीं होती है। चुनाव में जीतने के लिए करोड़ों का खर्च किया जाता है। जब कि उम्मीदवार कितना खर्च करें उन पर पाबंदी है, लेकिन पार्टी कितना भी पैसा खर्च कर सकती है। यह पैसे आखिर आते कहां से है? जिनसे उन्हें पैसे मिलते है चुनाव जीतने के बाद उसी पूंजीपति वर्ग के लिए हरेक चुनके आनेवाली सरकारें काम करती हैं, मजदूर वर्ग के लिए नहीं।

हमारे रेलवे सुरक्षा अभियान के वजह से आज भी रेलवे सुरक्षा का मुद्दा सुर्खियों में रहा है। रेलवे के ढांचागत सुविधाओं को लेकर कई योजनाएं बनाई जा रही है। कई स्टेशनों पर 15 डिब्बों की ट्रेन के लिए प्लेटफॉर्म को बढ़ाया जा रहा है। इसके अलावा, हमारे पत्र सौंपने के बाद, कलवा स्टेशन का वन रूपी क्लिनिक (आपातकालीन मेडिकल रूम) जो पिछले कई महीनों से बंद था उसे फिर से खोला गया है।

अनुभव यही रहा है कि जब तक मजदूर वर्ग संघर्ष करता है, उसे कुछ जीत मिलती है। जैसे ही संघर्ष कमजोर होता है, वैसे ही जीते हुए हक्क वापस भी ले लिए जाते हैं। मंगलयान भेजने वाले देश में लोग सड़कों और रेल में सुरक्षित नहीं हैं । वास्तविक हालात तो यह है कि जानवर से भी बदतर परिस्थितियों में रेल प्रवाशी सफर करने के लिए मजबूर हैं।

मुंबई लोकल और पूरी भारतीय रेलवे लोगों के टैक्स के पैसे से और कर्मचारियों की मेहनत और खून-पसीने से बनी है। इसीलिए हम लोगों की मांगें कोई भीख नहीं बल्कि हमारा अधिकार है। रेलवे को सुचारू रूप से चलाना, उसमे सुविधा उपलब्ध करना यह सरकार की जिम्मेदारी है। उस जिम्मेदारी से कोई भी सरकार पीछा नहीं छुड़ा सकती।

हम सभी मज़दूर चाहे हम रेलवे में काम करते हो या बिजली क्षेत्र में, बैंक में काम करते हो या फिर हॉस्पिटल में, चाहे हम सरकारी कर्मचारी हों या निजी कर्मचारी हर कोई रेलवे से यात्रा करता है। लेकिन रेल्वे कैसी चलाई जानी चाहिए, कितना पैसा और कहा खर्च करना चाहिए इसके निर्णय में हमारी कोई भी भूमिका नहीं होती है। निर्णय लेने की ताक़त जिनके हाथों में है वे कभी भी रेलवे से यात्रा नहीं करते है। इसीलिए हम यात्रियों की सुविधा की तरफ जानबूझकर अनदेखी की जाती है, इनके लिए पैसा खर्च करने के लिए पैसे न होने का बहाना दिया जाता है जबकि दूसरी ओर 2017-18 से 2021-22 इन पांच साल में पूंजीपति वर्ग के लगभग 10 लाख करोड़ के कर्जों को ख़ारिज (write-off) कर दिया गया है।

संघर्ष समितियाँ कतई इसके सामने झुकना स्वीकार नहीं करती हैं । उनका यह प्रेरणादायी अभियान जारी है।

हमारी एकमात्र शक्ति है – हमारी एकता! यदि हम एकजुट होकर अपनी आवाज़ बुलंद करें और जीत हासिल होने तक बुलंद रखें, तो धरती पर कोई भी ताकत हमें हमारे हक से वंचित नहीं कर सकती! पार्टी, यूनियन, भाषा, धर्म और अन्य सभी संबद्धताओं की बाधाओं को पार करके हमें हमारी एकता बनानी होगी और उसे मजबूत करना होगा। हमारी रेलवे संबधित मांगे हासिल करने का यही रास्ता है।

पाठकों से अनुरोध हैं कि वे भी इस अभियान में जुड़ें और इसे मजबूती प्रदान करें ।

अभियान का मीडिया में कवरेज:

विकल्प वाणी: मुंबई लोकल ट्रेन का जानलेवा सफर: https://www.youtube.com/watch?v=hAVzSSqBxjQ


आर्टिकल 14: ‘Hanging by a Handle’: Mumbai Train Safety: https://www.youtube.com/watch?v=_CmBvKNF4Vk


अख़बारों में कवरेज

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