कलवा में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के लिए प्रेरणादायक कार्यक्रम

पुरोगामी महिला संगठन और कामगार एकता कमिटी की मीटिंग की रिपोर्ट

आज महिलाओं के ख़िलाफ़ जारी भेदभाव और दमन के पीछे राज्य और राज्य द्वारा सुरक्षित की गयी सामाजिक व्यवस्था है। पूंजीवादी व्यवस्था के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था लाये बिना महिलाओं की मुक्ति असंभव है, और महिलाओं की मुक्ति के बिना पुरुषों की मुक्ति असंभव है। शासक हमें धार्मिक और राजनीतिक संबद्धताओं, क्षेत्र, राष्ट्रीयता और यहां तक कि लिंग के आधार पर भी बांटने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमें उनकी योजनाओं में नहीं फंसना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि हम मज़दूर और मेहनतकश हैं, जिनका शोषण शासक वर्ग द्वारा किया जाता है। हमें मज़दूर वर्ग को एकजुट करना होगा, उसे उसकी शक्ति के प्रति जागरुक करना होगा और उसे संगठित करना होगा ताकि इस शासन को मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकशों के शासन से बदला जा सके।

8 मार्च 2026 को ठाणे के कलवा में पुरोगामी महिला संगठन (PMS) और कामगार एकता कमेटी (KEC) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस कार्यक्रम में भाग लेने वाले सभी लोगों के मन में “उठा शूर नारिनों” (उठो बहादुर महिलाओं) गीत गूंज उठा। यह गीत महिलाओं से आह्वान करता है कि वे आज दुनिया भर में अपनी उन बहादुर बहनों का अनुकरण करें जो अमरीका और इज़रायल द्वारा शुरू किए गए अन्यायपूर्ण युद्धों के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुई हैं; यह क्रांतिकारी आंदोलनों और स्वतंत्रता संग्राम जैसे न्यायपूर्ण युद्धों में महिलाओं की भागीदारी की भूमिका का भी जश्न मनाता है। आईटी और स्वास्थ्य पेशेवरों, छात्रों, विभिन्न अभियानों में शामिल कार्यकर्ताओं और स्थानीय निवासियों सहित लोगों के एक व्यापक वर्ग – महिलाओं और पुरुषों – ने कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

PMS की संस्थापक सदस्यों में से एक, संजीवनी ने 1980 में स्थापित अपने संगठन के संक्षिप्त इतिहास का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि शुरुआत से ही पीएमएस ने महिलाओं के दमन के स्रोत और आजतक इसे क्या जीवित रखता है इनको समझने पर ध्यान दिया है। उन्होंने समझाया कि आज महिलाओं के ख़िलाफ़ जारी भेदभाव और दमन के पीछे राज्य और राज्य द्वारा सुरक्षित की गयी सामाजिक व्यवस्था है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि पूंजीवादी व्यवस्था के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था लाये बिना महिलाओं की मुक्ति असंभव है, और महिलाओं की मुक्ति के बिना पुरुषों की मुक्ति असंभव है। KEC के संयुक्त सचिव गिरीश ने स्पष्ट किया कि हमारे देश पर पूंजीपति वर्ग का शासन है। शासक हमें धार्मिक और राजनीतिक संबद्धताओं, क्षेत्र, राष्ट्रीयता और यहां तक कि लिंग के आधार पर भी बांटने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमें उनकी योजनाओं में नहीं फंसना चाहिए। हमें अपनी एकमात्र पहचान जिस पर हमें वास्तव में ध्यान केंद्रित करना चाहिए, वह यह है कि हम मज़दूर और मेहनतकश हैं, जिनका शोषण शासक वर्ग द्वारा किया जाता है। हमें मज़दूर वर्ग को एकजुट करना होगा, उसे उसकी शक्ति के प्रति जागरुक करना होगा और उसे संगठित करना होगा ताकि इस शासन को मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकशों के शासन से बदला जा सके।

इसके बाद दोनों संगठनों के लगभग 20 युवा महिला एवं पुरुष कार्यकर्ताओं द्वारा एक जोशीला सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। इस कार्यक्रम में विभिन्न विधाएं शामिल थीं – गीत, नाटक, नृत्य, रैप गीत और भरूद (मराठी शैली के गीत) तथा ऑडियो-विजुअल प्रस्तुतियां। कार्यक्रम ने सरल और प्रभावशाली ढंग से इन मूलभूत सच्चाइयों को उजागर किया :

  • महिलाएं “कमजोर” लिंग नहीं हैं। उनमें अपार क्षमता और शक्ति है। उन्होंने हर महत्वपूर्ण संघर्ष और क्रांतिकारी परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई है।
  • आर्थिक और अन्य रूप से महिलाओं की निम्न स्थिति पूरे मज़दूर वर्ग और आम जनता को बुरी तरह प्रभावित करती है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास प्रस्तुत किया गया और विकल्प वाणी द्वारा इसी विषय पर बनाया गया एक वीडियो दिखाया गया। संदेश स्पष्ट था – अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का अर्थ किसी महिला को गुलाब या चॉकलेट उपहार में देना या उन्हें तरह-तरह के व्यावसायिक ”छूटें“ देना नहीं है। यह महिलाओं द्वारा एक सदी से भी अधिक समय से लड़े जा रहे गौरवशाली संघर्षों का स्मरणोत्सव है – मताधिकार के लिए संघर्ष, बेहतर वेतन और कम घंटे के कार्यदिवसों, रक्षा और कार्यस्थलों पर सुरक्षा के लिए संघर्ष। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हमें विश्व भर के उन पूर्वजों का अनुकरण करने के लिए प्रेरित करता है जिन्होंने समाजवाद की स्थापना करके मानवता को मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष किया।

हिन्दोस्तान और विश्वभर में शोषण और उत्पीड़न के खि़लाफ़ महिलाओं द्वारा लड़े जा रहे अनगिनत संघर्षों पर एक प्रस्तुति दी गई।

इस प्रस्तुति में कई तीखे सवाल उठाए गए, जैसे :

  • आज लोगों को हर चीज के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है?
  • का़नून बनाने से पहले लोगों से सलाह क्यों नहीं ली जाती और करोड़ों लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन करने के बावजूद का़नूनों को निरस्त क्यों नहीं किया जाता?
  • लोगों को प्रभावित करने वाले निर्णयों और नीतियों में उनकी कोई राय क्यों नहीं ली जाती?
  • महिलाओं के खि़लाफ़ हिंसा और दुर्व्यवहार के मामलों में दोषियों को कभी सज़ा क्यों नहीं मिलती?
  • ऐसा कोई तंत्र क्यों नहीं है जिसके माध्यम से लोग चुने हुए प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहरा सकें?

प्रस्तुतियों में विस्तार से बताया गया कि कैसे पूंजीपति वर्ग शासन करता है और कैसे राज्य के विभिन्न अंग, जैसे पुलिस, न्यायपालिका, नौकरशाही और संपूर्ण राजनीतिक ढांचा, उसकी सेवा करते हैं।

क्या ऐसा समाज बनाना संभव है जहां मज़दूर वर्ग शासन कर सके? एक प्रस्तुति ने दिखाया कि सोवियत संघ की महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए समाजवादी राज्य द्वारा किस प्रकार ठोस क़दम उठाए गए थे – कैसे शिशुगृहों, नर्सरियों, बाल देखभाल केंद्रों, सामुदायिक रसोइयों, कपड़े धोने की जगहों, सैनिटोरियम इत्यादि का एक नेटवर्क स्थापित किया गया था। कैसे लिंग भेद किए बिना सभी को शिक्षित करने के लिए क़दम उठाए गए थे; कैसे महिलाओं को उच्च कुशल तकनीकी पदों पर आसीन होने और नाज़ी आक्रमणकारियों से अपने देश की रक्षा के लिए सेना और वायु सेना में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होने के लिए प्रोत्साहित और सक्षम बनाया गया था।

इस उत्साहवर्धक प्रस्तुति के बाद, एक युवा साथी ने दिखाया कि कैसे हमारे अपने देश में लोगों ने – किसान आंदोलन, महाराष्ट्र में वारकरी जुलूस आदि के माध्यम से – महिलाओं की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए संगठित होकर काम किया है।

कई प्रतिभागियों ने बहुत अच्छे से कार्यक्रम का निष्कर्ष दिया। एक 85 वर्षीय महिला ने कहा, “मेरा मानना है कि बदलाव के लिए मानसिकता में बदलाव होना ज़रूरी है, और आज इस हॉल में मैंने देखा कि ऐसा हो रहा है।” एक युवक ने संक्षेप में बताया कि पूरे कार्यक्रम ने बहुत स्पष्ट रूप से दिखाया कि पितृसत्ता और पूंजीवाद कैसे जुड़े हुए हैं, और पूंजीवाद पितृसत्ता को कैसे संरक्षित करता है क्योंकि यह उसके हित में काम करता है।

Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments