कामगार एकता कमेटी (KEC) के संवाददाता की रिपोर्ट

जैसे-जैसे हम मुंबई से दूर जाते हैं, ठाणे एक बड़ा स्टेशन है जो कुछ लोकल ट्रेनों का अंतिम पड़ाव (टर्मिनस) भी है। ठाणे का एक उपनगर, कलवा, अगला स्टेशन है, यहां के यात्रियों को मुंबई जाने के लिए उन लोकल ट्रेनों से सेवा मिलती है जो डोंबिवली, कल्याण आदि जैसे आगे के स्टेशनों से आती हैं। व्यस्त समय (पीक आवर) में यात्रा करने वालों के लिए समस्या यह है कि जब तक लोकल ट्रेन कलवा पहुँचती है, तब तक उसके हर दरवाजे से केवल 2-3 यात्री ही चढ़ पाते हैं।
रोजाना यात्रा करने वाले 5000 से ज़्यादा यात्रियों ने इस समस्या का हल अपने ही तरीके़ से निकाल लिया है। कलवा स्टेशन के पास ही एक ”कार-शेड“ है, जहां रात के समय और मरम्मत के लिए लोकल ट्रेनों को खड़ा किया जाता है। सुबह के व्यस्त समय में, नियमित रूप से चार ट्रेनें इस कार-शेड से निकलती हैं और ठाणे की ओर बढ़ने लगती हैं, वहां से वे ”ठाणे – CSMT (मुंबई) लोकल“ के रूप में चलती हैं। मुंबई की ओर जाने वाली पटरी पर पहंुचने के लिए, हर ट्रेन को पहले CSMT – कलवा (विपरीत दिशा) वाली पटरी को पार करना पड़ता है। इसी वजह से, कार-शेड से निकलने वाली हर ट्रेन को पटरी पार करने से पहले एक सिग्नल पर रुककर इंतज़ार करना पड़ता है।
जब ट्रेन सिग्नल पर रुककर इंतज़ार कर रही होती है, तो हज़ारों यात्री उसी समय उसमें चढ़ जाते हैं। वहां कोई प्लेटफॉर्म नहीं है, इसलिए ट्रेन में चढ़ना इतना आसान नहीं होता, लेकिन ज़्यादातर यात्रियों को दशकों का, या कम से कम कई सालों का, अभ्यास हो चुका है। यात्रियों को कार-शेड से ट्रेन में चढ़ना अच्छा तो नहीं लगता है, लेकिन पर्याप्त ट्रेनों की कमी के कारण उन्हें ऐसा करने पर मजबूर होना पड़ता है। पिछले साल, रेलवे प्रशासन ने अपनी ”समझदारी“ दिखाते हुए, एक दीवार बनाकर इन यात्रियों को रोकने का फ़ैसला किया, इस दीवार के बनने से सिग्नल पर खड़ी कार-शेड वाली लोकल ट्रेनें यात्रियों की पहुंच से बाहर हो जाएंगी। कलवा स्टेशन पर पहले से मौजूद भारी भीड़ की समस्या का कोई हल निकाले बिना, यात्रियों को कार-शेड से ट्रेन में चढ़ने से रोकना, स्थिति को और भी ज़्यादा बदतर बना देगा।
इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए, ”कलवा-मुंब्रा रेलवे प्रवासी सुरक्षा संघर्ष समिति“ तुरंत सक्रिय हो गई। उसने अपनी सहयोगी संस्था – ”डोंबिवली-कोपर-ठाकुरली प्रवासी सुरक्षा संघर्ष समिति“ से मदद की अपील की, उस समिति ने भी कलवा में अपनी पूरी ताक़त झोंकने का फै़सला किया, क्योंकि यह एक बहुत ही ज़्यादा गंभीर समस्या थी।
एक नारा ज़ोर-शोर से उठाया गया: “दीवार बनाने का काम पूरा करने से पहले, कार-शेड वाले यात्रियों के लिए एक ’होम प्लेटफॉर्म’ बनाया जाए!” कार्यकर्ताओं ने अपना अभियान कार-शेड के यात्रियों पर केंद्रित किया और उन्हें जबरदस्त समर्थन मिला। उन्हें सुरक्षा बलों से भी प्रोत्साहन मिला, जो खुद भी रोज़ाना कार-शेड ट्रेन से सफर करते हैं, और साथ ही उन सुरक्षा बलों से भी जो पटरियों पर गश्त करते हैं। रेलवे कर्मचारियों ने भी पूरे उत्साह के साथ समर्थन दिया, क्योंकि न केवल उनके परिवारों को, बल्कि उन्हें खुद भी इन रोज़ाना के सफरों की तकलीफ़ें झेलनी पड़ती हैं!

महीनों तक बड़ी संख्या में रैलियां और पर्चे बांटने के कार्यक्रम आयोजित किए गए। स्थानीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिनिधियों से मुलाक़ातें की गईं। TMC (ठाणे नगर निगम) चुनावों के समय, कार्यकर्ताओं ने विभिन्न बड़ी राजनीतिक पार्टियों के “समर्थकों” को संबोधित किया और वहां से भी उन्हें समर्थन मिला। इस मौके का इस्तेमाल बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों के सामने सार्वजनिक रूप से अपनी मांगें रखने के लिए किया गया। संक्षेप में कहें तो, विभिन्न स्तरों के राजनीतिक नेताओं को इस अभियान और इसे मिल रहे जबरदस्त समर्थन पर ध्यान देना ही पड़ा, आखि़रकार उनके अपने समर्थकों से भी इसे समर्थन मिल रहा था।
कलवा की स्टेशन-विशेष मांगें भी उठाई गईं, और कुछ चीजें पूरी भी हुईं – यात्रियों की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए, विभिन्न कोचों के लिए तय जगहों पर बेंचें एक समान रूप से लगाई गईं, एक क्लिनिक को फिर से खोला गया (हालांकि आपातकालीन सुविधाएं – जिसमें स्ट्रेचर भी शामिल है – अभी भी वहां मौजूद नहीं हैं)। मुफ़्त पीने का पानी उपलब्ध कराने की दिशा में भी क़दम उठाए गए। प्लेटफॉर्म नंबर 1 को बढ़ाकर 15-कोच वाली लोकल ट्रेन के लिए उपयुक्त बनाया गया (हालांकि यह इस बात की गारंटी नहीं देता कि ये लोकल ट्रेनें सचमुच चलना शुरू हो जाएंगी, क्योंकि काम अभी आगे नहीं बढ़ा है, इसके अलावा, इसी तरह प्लेटफॉर्मों को दूसरे स्टेशनों पर भी बढ़ाने की ज़रूरत है!)।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकारी अभी तक वह दीवार नहीं बना पाए हैं। यह एक जीत है, लेकिन अब हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाना और जश्न मनाना बहुत बड़ी बेवकूफी होगी! अगर यह अभियान कमज़ोर पड़ गया, तो वह दीवार रातों-रात पूरी की जा सकती है!
पूंजीवादी व्यवस्था का यही स्वभाव है!
आज हमारे देश में पूंजीवादी व्यवस्था चल रही है, इसलिए “लोकतंत्र” सिर्फ़ पूंजीपति वर्ग के लिए है! पैसा बोलता है! नीतियां पूंजीपति वर्ग ही बनाता है। उन्हें “सत्ताधारी पार्टी” लागू करती है, जिसके नेता इस वर्ग के मैनेजर होते हैं। उन्हें सबसे बड़े पूंजीपति ही पैसा देते हैं, ताकि वे उनकी सेवा कर सकें। इसीलिए, तथाकथित “सत्ताधारी पार्टी” तो बदल जाती है, लेकिन नीतियां नहीं बदलतीं। अर्थव्यवस्था का मक़सद सत्ताधारी पूंजीपति वर्ग का मुनाफ़ा ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ाना होता है – उनकी कभी न मिटने वाली लालच को पूरा करना होता है, न कि लोगों की सबसे बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना। जरा देखिए कि कमेटी को सिर्फ कुछ बेंचें लगवाने के लिए कितनी कड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी!

लोगों ने जो कुछ भी हासिल किया है, न सिर्फ़ हमारे देश में बल्कि जहां भी पूंजीवाद है वहां, वह सब एकजुट और लगातार संघर्षों से ही जीता गया है। पूंजीवादी सरकारें लोगों को तब तक कुछ नहीं देतीं, जब तक उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर न किया जाए। दूसरे देशों में यात्रियों ने सुरक्षित और बेहतर सुविधाओं के लिए संघर्ष किया है और उन्हें जीता भी है।
पूरे हिन्दोस्तान में यात्री यातायात के लिए सालाना सब्सिडी लगभग 30,000 करोड़ रुपये है – यह आंकड़ा उन 6,00,000 करोड़ रुपये की सालाना टैक्स छूट के मुक़ाबले बहुत कम है, जो मुट्ठीभर बड़े उद्योगपतियों को दी जाती है। इसके अलावा, पिछले चार सालों में ही, बड़े पूंजीपतियों के 4,50,000 करोड़ रुपये के “बैड लोन” (डूबे हुए क़र्ज़) माफ़ कर दिए गए हैं! कमेटी यह मांग कर रही है कि लोगों का पैसा, जो सरकार ने वेतन पर लगने वाले प्रत्यक्ष कर और सामान व सेवाओं पर लगने वाले अप्रत्यक्ष कर के ज़रिए इकट्ठा किया है – उसका इस्तेमाल यात्रियों के सफर को सस्ता बनाने और ट्रेनों व स्टेशनों पर बेहतर सुविधाएं देने के लिए किया जाए, न कि बड़े पूंजीपति डिफॉल्टरों को बचाने के लिए।
कमेटी के कार्यकर्ता यह समझते हैं कि उन्हें अपने अभियान को और गहरा और व्यापक बनाना होगा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अधिकारी मुंबई के लोकल यात्रियों की समस्याओं का समाधान जल्द से जल्द करें। यह अभियान मेहनतकश लोगों के संगठनों को मजबूत करने की दिशा में एक क़दम है, ताकि वे अपने अधिकारों की मांग के लिए संघर्ष कर सकें!
