मुंबई उपनगरीय ट्रेन (लोकल) के यात्री सुरक्षा और बेहतर सुविधाओं के लिए संघर्ष करने के लिए एकजुट हुए!

कामगार एकता कमेटी (KEC) के संवाददाता की रिपोर्ट

जून 2025 में, कामगार एकता कमेटी (KEC) ने सुरक्षित और सम्मानजनक लोकल ट्रेन यात्रा के लिए चल रहे अपने अभियान को और तीव्र कर दिया। ऐसा तब हुआ जब एक ही ”दुर्घटना“ में कई यात्रियों की मौत हो गई, जिससे यात्री और संबंधित लोग सदमे में आ गए। केईसी के नेतृत्व में चलाए जा रहे इस अभियान ने सैकड़ों लोकल यात्रियों में नई ऊर्जा भर दी है, जिससे वे यात्रा की बेहतर स्थितियों की मांग करने के इस प्रयास में शामिल हो गए हैं।

मुंबई उपनगरीय ट्रेनों के महत्व और भयानक वास्तविकता पर एक नज़र

MMR (मुंबई महानगर क्षेत्र, जिसमें मुंबई के साथ-साथ सटे हुए ठाणे जिले के दूर-दराज़ के इलाके भी शामिल हैं) में रहने वाले लगभग 75 लाख लोगों के पास काम या पढ़ाई के लिए रोजाना यात्रा करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। इनमें से कई कस्बों और उनके उपनगरों का मुंबई से कोई अच्छा सड़क संपर्क नहीं है, और सार्वजनिक बस सेवाएं भी बेहद अपर्याप्त और कम हैं। उपनगरीय ट्रेनें परिवहन का सबसे तेज़ और सबसे सस्ता साधन हैं।

दिन-ब-दिन लोकल ट्रेन सेवा की हालत बद से बदतर होती जा रही है, और ज़्यादातर स्टेशनों की हालत भी बहुत ख़राब है। रोज़ाना की 3-4 घंटे की यात्रा सचमुच नरक जैसी होती है – यह ज़्यादा से ज़्यादा असुविधाजनक होती है और कई बार तो यह बेहद ख़तरनाक भी हो जाती है। ट्रेनों की संख्या मांग के मुक़ाबले बहुत कम है, जिसके कारण भीड़भाड़ वाले समय (पीक आवर्स) में हर डिब्बे में उसकी क्षमता से 4-5 गुना ज़्यादा यात्री सवार होते हैं। नतीजतन, लोगों को ट्रेन के दरवाज़ों के बाहर ख़तरनाक तरीके से लटककर यात्रा करने पर मजबूर होना पड़ता है। इसके अलावा, कई लोग पटरियां पार करते हैं, क्योंकि प्लेटफॉर्म पर बने पुल इतने कम हैं और वहां इतनी भीड़ होती है कि उनका इस्तेमाल करने से उनकी रोज़ाना की इस कष्टदायक यात्रा में और भी ज़्यादा समय बर्बाद होता है! स्थिति इतनी ख़राब है कि रेलवे के अपने ही आंकड़ों के अनुसार, रोजाना औसतन 7 यात्रियों की मौत हो जाती है!

KEC ने कई स्टेशनों पर हज़ारों पर्चे बांटे, मांग-पत्रों पर हज़ारों लोगों के हस्ताक्षर इकट्ठा किए, और उन्हें रेलवे अधिकारियों को सौंपा। यात्रियों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होने वाली निम्नलिखित मांगें उठाई गईं:

मुंबई लोकल

लोकल ट्रेनों की संख्या (फ्रीक्वेंसी) में कम से कम 5 गुना की वृद्धि की जाए। यह काम एक आधुनिक सिग्नलिंग प्रणाली स्थापित करके किया जा सकता है। यह कोई ”रॉकेट साइंस“ नहीं है – इस तकनीक को पूरी दुनिया में, और यहां तक कि हिन्दोस्तान में भी मेट्रो ट्रेनों के लिए सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है। इस तरह की सिफ़ारिश आधिकारिक एजेंसी, मुंबई रेल विकास निगम (MRVC) ने 2016-17 में ही कर दी थी। जैसा कि अक्सर उन सिफ़ारिशों के साथ होता है जिनसे असल में लोगों को फ़ायदा होता है, इस मामले में भी कोई प्रगति नहीं हुई है।

  • हर ट्रेन की यात्री क्षमता बढ़ाने के लिए, ट्रेनों में कोचों की संख्या मौजूदा 12 से बढ़ाकर कम से कम 15 की जाए। असल में, RDSO (अनुसंधान डिजाइन और मानक संगठन, रेल मंत्रालय के अधीन) ने तो यह संख्या बढ़ाकर 18 करने की सिफ़ारिश की थी!

लोकल ट्रेन स्टेशनों की बेहद ख़राब हालत में सुधार लाने के लिए और भी मांगें उठाई जा रही हैं :

  • हर प्लेटफॉर्म पर पीने का मुफ्त और साफ पानी और शौचालय।
  • हर प्लेटफॉर्म पर बेंच, पंखों की पर्याप्त संख्या और हर प्लेटफॉर्म के ऊपर छत।
  • हर प्लेटफॉर्म पर एस्केलेटर, सीढ़ियों और लिफ्टों की पर्याप्त संख्या।
  • यात्रियों के लिए आनेवाली ट्रेनों के बारे में सही और साफ़ घोषणाएं – कई बार ये देर से होती हैं, गलत होती हैं या गुमराह करने वाली होती हैं।
  • अलग-अलग प्लेटफॉर्मों और निकास द्वारों को जोड़ने वाले चौड़े और अच्छी तरह से रखरखाव किए गए फुट ओवरब्रिजों (पुलों) की पर्याप्त संख्या। (इनमें से कुछ ज़्यादा बोझ पड़ने पर हिलने लगते हैं; जबकि कुछ अन्य जगहों पर अक्सर भगदड़ जैसी स्थिति बन जाती है।)
  • हर स्टेशन पर स्टेशन मास्टर और टिकट बेचने वालों जैसे अन्य ज़रूरी कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या।
  • रेलवे ट्रैक के दोनों तरफ टिकट काउंटरों की पर्याप्त संख्या।
  • यात्रियों के लिए रैंप।
  • सभी स्टेशनों पर स्ट्रेचर, फर्स्ट एड बॉक्स, डॉक्टरों, नर्सों और स्ट्रेचर उठाने वालों से लैस, पूरी तरह तैयार आपातकालीन कक्ष और साथ-साथ एम्बुलेंस। चूंकि ज़्यादातर स्टेशनों पर इन सुविधाओं की कमी है, इसलिए चिकित्सा उपचार में देरी या उसके अभाव के कारण अनगिनत पीड़ित अपनी जान गंवा देते हैं या हमेशा के लिए अपाहिज हो जाते हैं।

इस अभियान को मिले जबरदस्त प्रतिसाद से यह साफ़ हो गया कि ऐसे वॉलंटियर्स की सक्रिय कमेटियां बनाना बहुत ज़रूरी है जो इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हों। इसी मक़सद से, केईसी ने सितंबर 2025 में डोंबिवली-कोपर-ठाकुरली में और अगले महीने कलवा-मुंब्रा में ”रेलवे प्रवासी सुरक्षा संघर्ष समितियां“ बनाईं।

मुंबई लोकल

ये समितियां रेलवे अभियान की योजनाएं और उन्हें संगठित करने के लिए नियमित मीटिंग करती रही हैं। कमेटी की मीटिंगें लोकतांत्रिक तरीके़ से चलाई जाती हैं। यह इसलिए मुमकिन हो पाया है क्योंकि कमेटी के सदस्य खुद ही इस अभियान को ज़िन्दा रखने के लिए पैसे से मदद कर रहे हैं! हर मीटिंग में, एक वित्तीय रिपोर्ट पेश की जाती है। पर्चे, बैनर वगैरह के मसौदों पर कमेटी की मीटिंगों में पूरी तरह से चर्चा की जाती है, सुझावों का स्वागत किया जाता है और ऐसे सुझावों को शामिल किया जाता है जिन से ज़्यादातर लोग सहमत होते हैं।

समितियां बनने के बाद, अभियान की रफ़्तार दोगुनी हो गई – कई रैलियां आयोजित की गईं, अलग-अलग जगहों पर बैनर लगाए गए। रेलवे अधिकारियों के साथ-साथ लोकल प्रतिनिधियों को भी मांग पत्र और रिमाइंडर (याद दिलनेवाले) पत्र दिए गए। इस अभियान का कई अख़बारों में प्रचार हुआ तथा आर्टिकल 14 https://www.youtube.com/watch?v=_CmBvKNF4Vk और विकल्प वाणी https://www.youtube.com/watch?v=hAVzSSqBxjQ  ने एक-एक वीडियो बनाया, जिन्हें हज़ारों लोगों द्वारा देखा गया।

हाल ही में, रेलवे अधिकारियों ने भूमिगत ढांचे में कुछ बदलाव करने की योजना बनाई थी, जिससे कलवा के हज़ारों यात्रियों के लिए बहुत मुश्किल हालात पैदा होती। तभी समिति ने अपने प्रयासों को कलवा पर केंद्रित करने का फ़ैसला किया। कुछ छोटी-मोटी जीतें हासिल हुई हैं, और जैसा कि साथ में दिए गए लेख से पता चलेगा, अब तक हम अधिकारियों को वह क़दम उठाने से रोकने में क़ामयाब रहे हैं जिससे कलवा के यात्रियों के लिए हालत बहुत ज़्यादा ख़राब होगी।

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