राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन 2.0 बिजली क्षेत्र के निजीकरण को गति देगी

श्री अशोक कुमार, संयुक्त सचिव, कामगार एकता कमिटी (KEC) द्वारा

बिजली क्षेत्र का निजीकरण इस समय कई मोर्चों पर किया जा रहा है। बिजली (संशोधन) विधेयक 2025 को अंतिम रूप दिया जा रहा है और इसे मंजूरी के लिए किसी भी समय लोकसभा में पेश किया जा सकता है। राष्ट्रीय बिजली नीति 2026 का एक नया मसौदा जारी किया गया है। इन दोनों का मकसद बिजली वितरण क्षेत्र का निजीकरण करना और किसानों तथा गरीब लोगों को सब्सिडी वाली बिजली की आपूर्ति खत्म करना है। ‘शांति’ (SHANTI) अधिनियम लागू होने से परमाणु ऊर्जा उत्पादन का क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए खुल गया है। उत्तर प्रदेश सरकार अपनी दो सबसे बड़ी वितरण कंपनियों के निजीकरण की दिशा में काम कर रही है। वह अपने छोटे पनबिजली (पानी से बिजली) उत्पादन संयंत्रों का भी निजीकरण करना चाहती है। अन्य राज्यों में भी इसी तरह के प्रयास चल रहे हैं।

पूरे देश में स्मार्ट मीटर लगाने का काम पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है, जिसका मकसद बिजली आपूर्ति को एक ‘प्री-पेड’ सेवा बनाना है। यह कदम भी लगभग 60 राज्य-स्वामित्व वाली वितरण कंपनियों और राज्य बिजली विभागों के बड़े पैमाने पर निजीकरण के लिए ज़मीन तैयार करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

23 फरवरी 2026 को केंद्र सरकार ने एक और मोर्चा खोला, जब उसने ‘राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन’ (NMP) 2.0 की घोषणा की। इसका लक्ष्य 2025-26 से 2029-30 तक, पाँच वर्षों की अवधि में, बिजली क्षेत्र की 2.76 लाख करोड़ रुपये की विभिन्न संपत्तियों का मुद्रीकरण करना है। बिजली क्षेत्र का निजीकरण कितनी तेज़ी से किया जा रहा है, यह इस बात से ज़ाहिर होता है कि NMP 2.0 के तहत बिजली क्षेत्र के लिए निर्धारित लक्ष्य, NMP 1.0 के तहत बनाई गई योजना से तीन गुना अधिक है

मुद्रीकरण भी निजीकरण का ही एक और रूप है। निजीकरण के व्यापक विरोध को देखते हुए, सरकार लोगों से अपने असली इरादों को छिपाने के लिए अलग-अलग नामों का इस्तेमाल करती है।

NMP 2.0 के तहत निजीकरण का एक नया क्षेत्र देश के प्रमुख पनबिजली संयंत्रों का मुद्रीकरण करना है। इसके तहत NHPC Ltd. (पूर्व में नेशनल हाइड्रो-पावर कॉर्पोरेशन) और SJVN Ltd. (पूर्व में सतलुज जल विद्युत निगम) की लगभग 5000 मेगावाट पनबिजली क्षमता का मुद्रीकरण करने की योजना है। इसका मतलब होगा, देश की कुल प्रमुख पनबिजली क्षमता के पाँचवें हिस्से से भी अधिक का निजीकरण।

पनबिजली, बिजली उत्पादन के सबसे सस्ते नवीकरणीय स्रोतों में से एक है। एक बार इसे स्थापित करने में पूंजी खर्च हो जाने के बाद, बिजली बनाने की लागत बहुत कम हो जाती है। पनबिजली (hydropower) के इस्तेमाल से उपभोक्ताओं को दी जाने वाली बिजली का कुल टैरिफ कम करने में मदद मिलती है। एक बार जब पनबिजली क्षेत्र का निजीकरण हो जायेगा, तो बिजली की दरें बढ़ना तय है।

बिजली का सबसे ज्यादा मुद्रीकरण पारेषण क्षेत्र में होने वाला है सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता में तेज़ी से बढ़ोतरी के कारण, अंतर-राज्यीय पारेषण क्षमता को बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है, ताकि बिजली को उत्पादन करने वाले राज्यों से उपभोग करने वाले राज्यों तक पहुँचाया जा सके। गुजरात और राजस्थान में बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता स्थापित की गई है, जिस का पारेषण करने की ज़रूरत है। लगभग 22,000 ckm (सर्किट किलोमीटर) अंतर-राज्यीय पारेषण लाइनें बनाने की योजना है। इन्हें ‘बिल्ड-ओन-ऑपरेट-ट्रांसफर’ (BOOT) मॉडल का इस्तेमाल करके स्थापित करने का प्रस्ताव है।

पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन की मौजूदा पारेषण लाइनों में से लगभग 15,000 ckm का भी मुद्रीकरण करने की योजना है।

NMP 2.0 के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनियों के शेयरों को बेचकर उनके निजीकरण को और आगे बढ़ाया जाएगा।

बिजली क्षेत्र के कर्मचारी, उपभोक्ताओं के साथ मिलकर, बिजली क्षेत्र के निजीकरण के हर कदम का ज़ोरदार विरोध कर रहे हैं। उनके संघर्षों के कारण कुछ मामलों में इसे अस्थायी रूप से रोकने में सफलता मिली है। परंतु, सरकार लगातार बिजली क्षेत्र के निजीकरण को आगे बढ़ा रही है।

देश के सबसे बड़े पूंजीवादी समूह, जैसे टाटा, अडानी, जिंदल, गोयनका, टॉरेंट आदि, तथाकथित बिजली क्षेत्र सुधारों के पूरा होने के बाद बिजली वितरण क्षेत्र में मुनाफे का एक बड़ा अवसर देखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, उन्होंने बिजली उत्पादन में पहले ही एक प्रमुख हिस्सा हासिल कर लिया है। अब वे बिजली क्षेत्र के पारेषण और वितरण, दोनों भागों को नियंत्रित करना चाहते हैं। यह उनका ही एजेंडा है, जिसे केंद्र सरकार और राज्य सरकारें, दोनों ही लागू कर रही हैं। हर वह राजनीतिक दल, जो सरकार की कमान संभाल रहा है – चाहे वह केंद्र में हो या राज्यों में – निजीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है। यह देश के शासक वर्ग – कुछ सौ सबसे बड़े पूंजीवादी इजारेदार घरानों – का एजेंडा है, जिसे लागू किया जा रहा है। निजीकरण के खिलाफ लड़ाई, इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए ही लड़ी जानी चाहिए।

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