श्री अलावंदर वेणु माधव, महासचिव, सिंगरेनी रिटायर्ड एम्प्लोयीज वेल्फेयर एसोसिएशन द्वारा
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और विभिन्न सरकारी विभागों के करोड़ों मज़दूर पुरानी पेंशन योजना की बहाली के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। वहीं, कोयला क्षेत्र के लाखों मज़दूर उस मामूली पेंशन में वृद्धि के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो उन्हें वर्तमान में मिल रही है।
कोई भी समाज काम करने वाले लोगों के बिना एक मिनट भी जीवित नहीं रह सकता—चाहे वे कारखानों, खेतों, निर्माण स्थलों पर काम करते हों या फिर विभिन्न सेवाएँ प्रदान करते हों। प्राकृतिक न्याय की यह माँग है कि उनके बुढ़ापे में भी उनकी भलाई का ध्यान रखा जाए। सभी काम करने वाले लोगों के लिए बुढ़ापे में पर्याप्त पारिश्रमिक सुनिश्चित किया जाना चाहिए—चाहे वह पेंशन के रूप में हो या किसी अन्य रूप में। यह हमारी एकजुट माँग होनी चाहिए!

(अंग्रेजी लेख का अनुवाद)
भारत के आर्थिक विकास में कोयला खनन उद्योग एक अहम भूमिका अदा करता है। इस क्षेत्र में लाखों मज़दूरों ने ऊर्जा उपलब्ध कराने और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है। परंतु, सेवानिवृत्ति के बाद उनका जीवन कितना सुरक्षित है, यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।
पेंशन प्रणाली का विकास
कोयला खान भविष्य निधि की शुरुआत 1948 में मज़दूरों को सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी, किंतु यह सेवाकाल के दौरान की गई बचत तक ही सीमित थी।
1971 में, परिवार पेंशन योजना शुरू की गई थी, लेकिन यह केवल मृत कर्मचारियों के परिवारों पर ही लागू होती थी।
1975 में कोल इंडिया की स्थापना के बाद भी, 1998 तक कोई व्यापक वृद्धावस्था पेंशन प्रणाली उपलब्ध नहीं थी।
1998 पेंशन योजना – आशा की एक किरण
मज़दूरों के लगातार संघर्ष के बाद, 1998 में कोयला खदान पेंशन योजना शुरू की गई।
इस योजना में एक तय मासिक पेंशन व्यवस्था दी गई।
लेकिन, नया निधि बनाने के बजाय, यह मौजूदा पारिवारिक पेंशन निधि, कर्मचारी और नियोक्ता के अंशदान और केन्द्रीय सरकार से से मिलने वाले सहायता पर निर्भर था।
मुख्य कमज़ोरियाँ
इस योजना की मुख्य कमज़ोरी इसमें होने वाला कम योगदान है:
कर्मचारी + नियोक्ता का योगदान: लगभग 2.33%
केंद्र सरकार का योगदान: मात्र 1.16%
इससे इस निधि की वित्तीय स्थिरता कमज़ोर हुई है।
वर्तमान स्थिति
आज, कोल इंडिया और सिंगारेनी कोलियरीज के पेंशनभोगियों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
- मासिक पेंशन: केवल ₹1,000 से ₹3,000
- कोई महंगाई भत्ता (DA) नहीं
- पेंशन में कोई नियमित संशोधन नहीं
- बढ़ते चिकित्सा खर्च
- भुगतान में देरी
वित्तीय घाटा – एक गंभीर चिंता
केंद्र सरकार के 2025–26 के अनुमानों के अनुसार:
- वार्षिक आय: लगभग ₹5,600 करोड़
- वार्षिक व्यय: लगभग ₹6,400–₹6,500 करोड़
इसका अर्थ है कि वार्षिक खर्च आय से अधिक है।
आगे के अनुमानों से पता चलता है:
- वार्षिक घाटा: लगभग ₹240 करोड़
- कुल दीर्घकालिक घाटा: लगभग ₹26,000 करोड़
यह पेंशन भुगतानों की भविष्य की निरंतरता के लिए एक गंभीर जोखिम का संकेत देता है।
तत्काल सुधारों की आवश्यकता है
व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए:
- कोयला कर को ₹20 से बढ़ाकर कम से कम ₹100 करें
- केंद्र सरकार की ओर से एक विशेष वित्तीय पैकेज प्रदान करें
- न्यूनतम पेंशन ₹10,000 निर्धारित करें
- महंगाई भत्ता (DA) लागू करें
- अंशदान दरों में वृद्धि करें
एक सामाजिक ज़िम्मेदारी
कोयला खनिकों ने देश को ऊर्जा दी है।
बुढ़ापे में उन्हें संघर्ष करने के लिए छोड़ देना न सिर्फ़ अन्यायपूर्ण है—बल्कि यह सामाजिक ज़िम्मेदारी की विफलता भी है।
निष्कर्ष
कोयला खदान पेंशन योजना को मज़बूत बनाना एक अत्यंत आवश्यक ज़रूरत है।
यह न केवल सरकार की ज़िम्मेदारी है, बल्कि समाज का नैतिक दायित्व भी है।
“यदि देश को मज़दूरों के पसीने से ऊर्जा मिलती है,
तो उनका बुढ़ापा भी गरिमा के साथ गुज़रना चाहिए।”
“जिन लोगों ने देश को रोशन किया,
उनका जीवन अंधेरे में नहीं रहना चाहिए।”
