स्वास्थ्य क्षेत्र में रोज़ी-रोटी की सुरक्षा के अधिकार पर बैठक

मज़दूर एकता कमेटी के संवाददाता की रिपोर्ट

“अनुबंध पर काम करने वाले डॉक्टरों और नर्सों को हर तरह की आपात स्थिति में सैकड़ों मरीजों की देखभाल करने के लिए बुलाया जाता है – फिर भी उन्हें ईएसआई जैसी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रखा जाता है और यहां तक कि मातृत्व अवकाश भी नहीं दिया जाता!”… ये वे शब्द थे जिनसे जन स्वास्थ्य अभियान की कार्यकर्ता सुश्री स्वाति राणे ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुबंध पर काम कर रहे डॉक्टरों और नर्सों की स्थिति का वर्णन किया। वे 26 अक्तूबर को मज़दूर एकता कमेटी (एमईसी) द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में रोज़ी-रोटी की सुरक्षा के अधिकार पर आयोजित एक बैठक में स्वास्थ्य कर्मियों के विभिन्न तबकों द्वारा उठाई गई चिंताओं पर प्रकाश डाल रही थीं।

बैठक में बड़ी संख्या में सरकारी और निजी अस्पतालों के नियमित और संविदा डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्य मज़दूर, शहरी और ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) मज़दूर, एम्बुलेंस मज़दूर, ईएसआई अस्पताल मज़दूर, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सफाई कर्मचारी, सुरक्षा मज़दूर और साथ ही आईटी मज़दूर, रेलवे मज़दूर, बिजली मज़दूर, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, शिक्षक और छात्र सहित कई अन्य क्षेत्रों के कामकाजी लोगों ने भाग लिया।

मज़दूर एकता कमेटी के श्री संतोष कुमार; एमआरबी नर्सेज यूनियन, तमिलनाडु की सुश्री शशिकला; म्युनिसिपल नर्सिंग एंड पैरामेडिकल स्टाफ यूनियन, महाराष्ट्र की सुश्री त्रिशिला कांबले; छत्तीसगढ़ एनएचएम कर्मचारी संघ के श्री कौशलेश तिवारी; कामगार एकता कमेटी के श्री गिरीश; 108 एम्बुलेंस वर्कर्स यूनियन तमिलनाडु के श्री आनंदन; महाराष्ट्र संयुक्त कामगार कृति समिति के डॉ. कराड; जन स्वास्थ्य अभियान की सुश्री स्वाति राणे, और कई अन्य लोगों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

बैठक की अध्यक्षता एमईसी के श्री बिरजू नायक ने की।

मज़दूर एकता कमेटी के श्री संतोष कुमार ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किफ़ायती दरों पर अच्छी स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करना समाज के प्रत्येक सदस्य का अधिकार है। शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों और देश के दूर-दराज के इलाकों में पर्याप्त संख्या में अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र होने चाहिएं, जहां पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मी, साथ ही आवश्यक चिकित्सा उपकरण, सुविधाएं और दवाइयां उपलब्ध हों। स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं – डॉक्टर, नर्स, पेरामेडिकल मज़दूर और अन्य कर्मियों के पास सुरक्षित आजीविका, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां, सम्मानजनक वेतन, पेंशन आदि होनी चाहिए। हालांकि, वास्तविकता इससे बहुत अलग है।

अपोलो, मैक्स, फोर्टिस आदि जैसी आकर्षक निजी अस्पताल श्रृंखलाएं, जो अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का वादा करती हैं, आम जनता की पहुंच से बाहर हैं। वहीं सरकारी अस्पतालों में न ख़त्म होने वाली लाइनें, बिस्तरों, दवाओं व उपकरणों की कमी, भीड़भाड़ वाले वार्ड और दयनीय स्थितियां, वहां की स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में बहुत कुछ कहती हैं। हम वहां डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों के भयानक कार्यभार और ख़तरनाक कार्य स्थितियों को अच्छी तरह समझ सकते हैं। आशा, आंगनवाड़ी, एनएचएम आदि विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत स्वास्थ्य सेवा कर्मी देश के दूर-दराज के इलाकों में लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं, फिर भी उन्हें मज़दूर के रूप में मान्यता तक नहीं दी जाती है, उन्हें कभी भी बाहर निकाला जा सकता है, वे 6,000-8,000 रुपये प्रति माह के वेतन पर काम करते हैं।

श्री संतोष ने स्पष्ट किया कि इन सभी समस्याओं का स्रोत हमारे देश में मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था है। इजारेदार घरानों के नेतृत्व में पूंजीपति वर्ग हमारे देश पर शासन करता है। हिन्दोस्तानी राज्य पूंजीपति वर्ग के सत्ता का बचाव करता है और हर सरकार, चाहे उसका नेतृत्व कोई भी राजनीतिक दल करे, पूंजीपति वर्ग के एजेंडे को लागू करती है। जबकि यह भ्रम फैलाया जाता है कि समय-समय पर होने वाले चुनावों के माध्यम से लोग अपनी पसंद की सरकार बनाने के लिए वोट देते हैं, वास्तविकता यह है कि लोगों के पास उम्मीदवारों का चयन करने, निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने या उन्हें वापस बुलाने या क़ानून बनाने और संशोधित करने की कोई व्यवस्था नहीं है।

पूंजीपतियों का एकमात्र उद्देश्य अधिकतम मुनाफ़ा कमाना है। उन्हें मेहनतकश जनता की भलाई की कोई चिंता नहीं है। ठेका मज़दूरी का इस्तेमाल मज़दूरों को उनके उन सभी अधिकारों से वंचित करने का तरीक़ा है जो उन्होंने लंबे संघर्ष से हासिल किए हैं। ठेका मज़दूरों की संख्या बढ़ाकर पूंजीपति मज़दूरों की मज़दूरी को न्यूनतम संभव तक कम करके और उन्हें सभी अधिकारों से वंचित करके अपने मुनाफ़े को अधिकतम करना चाहते हैं। 60 और 70 के दशक में मज़दूर वर्ग के व्यापक प्रतिरोध को देखते हुए, केंद्र सरकार को 5 सितंबर 1970 को ठेका मज़दूर (नियमन और उन्मूलन) अधिनियम पारित करना पड़ा। हालांकि, पिछले 20-30 वर्षों में इस कानून को पूंजीपतियों के लिए और अधिक लचीला बनाया गया है। कई अदालती फै़सलों के ज़रिए, केंद्र और राज्य सरकार के संस्थानों सहित, सुरक्षा कार्य, सफ़ाई कार्य और कई अन्य प्रकार के स्थायी प्रकृति के कामों को ठेका मज़दूर अधिनियम के दायरे से बाहर कर दिया गया है। 50 मज़दूरों तक को रोज़गार देने वाले ठेकेदारों को अब इस अधिनियम से बाहर कर दिया गया है। इन मज़दूरों को न केवल न्यूनतम वेतन, बल्कि रोज़गार सुरक्षा, ईएसआई, भविष्य निधि आदि से भी वंचित रखा जाता है।

आज डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारी संविदा रोज़गार की समाप्ति, रोज़गार सुरक्षा, सम्मानजनक वेतन, सुरक्षित और मानवीय कार्य परिस्थितियों, पेंशन और अन्य अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

श्री संतोष ने बताया कि ठेका श्रम व्यवस्था न केवल ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों के लिए हानिकारक है, बल्कि समग्र रूप से समाज के लिए भी हानिकारक है। ठेकेदार अक्सर उच्च प्रशिक्षित और कुशल मज़दूरों की आवश्यकता वाले कार्यों के लिए कम वेतन पर अप्रशिक्षित मज़दूरों को रखते हैं – जैसे कि रेल, सड़क और हवाई परिवहन, महत्वपूर्ण स्वास्थ्य क्षेत्र आदि में – जिससे इन सेवाओं के उपयोगकर्ताओं के लिए ख़तरे बढ़ जाते हैं।

श्री संतोष ने अंत में मज़दूर वर्ग के सभी वर्गों से एक सांझा मंच पर एकजुट होने और अपने बढ़ते शोषण और आजीविका की असुरक्षा के ख़िलाफ़ संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संघर्ष का उद्देश्य मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था को मज़दूर वर्ग और सभी उत्पीड़ितों के शासन में बदलकर शोषण को समाप्त करना होना चाहिए।

सुश्री शशिकला ने कहा कि तमिलनाडु के सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में नर्सें 10 साल से ज़्यादा समय के बाद भी, मात्र 15,000-18,000 रुपये प्रति माह पर, ठेके पर काम कर रही हैं। यह वेतन भी नियमित रूप से नहीं दिया जाता, जिससे उनके परिवारों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उनमें से कई को एक समय में 100 से ज़्यादा मरीजों, जिनमें प्रसूति संबंधी मामले भी शामिल हैं, की देखभाल करने और 24-32 घंटे ड्यूटी करने के लिए कहा जाता है। फिर भी, इन नर्सों को मातृत्व अवकाश देने से मना कर दिया जाता है और उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। उनके पास न तो पेंशन है, न ही कोई बीमा की सुविधा है और उन्हें शारीरिक हमले सहित हर तरह के अपमान का सामना करना पड़ता है। उन्होंने अनुबंधित नर्सों के अपने यूनियन बनाने के संघर्ष और सरकार से उनकी मांगों पर प्रकाश डाला – कि उन्हें नियमित रोज़गार, सभी अधिकार और सुरक्षित कार्य परिस्थितियां प्रदान की जाएं।

श्री आनंदन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुबंध पर काम के बढ़ते चलन और मज़दूरों की दयनीय स्थिति के बारे में बात की। ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में, जिला कलेक्टर अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके स्वास्थ्य कर्मचारियों को नियमित वेतन से भी वंचित रखते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा अनुभव यह दर्शाता है कि हम न्यायालयों से अपने पक्ष में फ़ैसला देने की उम्मीद नहीं कर सकते, तथा उन्होंने सभी स्वास्थ्य कर्मियों को उनके अधिकारों के लिए संघर्ष में एकजुट होने पर ज़ोर दिया।

श्री कौशलेश तिवारी ने छत्तीसगढ़ के लगभग 16,000 एनएचएम मज़दूरों द्वारा हाल ही में नियमित रोज़गार और अन्य अधिकारों की मांग को लेकर की गई लंबी हड़ताल के बारे में बताया। हड़ताली मज़दूरों ने अपने यूनियन के कार्यकर्ताओं की बहाली की मांग की है, जिन्हें संघर्ष का नेतृत्व करने के कारण निलंबित कर दिया गया था। मुख्यमंत्री और अन्य सरकारी अधिकारियों द्वारा आंदोलनकारी एनएचएम मज़दूरों से किए गए विभिन्न वादों का हवाला देते हुए, श्री तिवारी ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य और केंद्र सरकारों को एनएचएम मज़दूरों की स्थिति या लोगों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं की कोई चिंता नहीं है। उन्होंने मांग की कि सरकार जन स्वास्थ्य पर ख़र्च बढ़ाए, ताकि जन स्वास्थ्य कर्मचारियों की नौकरियों को नियमित किया जा सके और जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा सकें। श्री तिवारी ने सरकार के वादों पर निर्भर न रहकर, स्वास्थ्य कर्मचारियों को बड़ी संख्या में संगठित करने और संघर्ष को आगे बढ़ाने पर ज़ोर दिया।

सुश्री त्रिशिला कांबले ने मुंबई नगर निगम के अस्पतालों में संविदा डॉक्टरों और नर्सों के कम वेतन, लंबे काम के घंटे, मरीजों की भारी भीड़, मातृत्व अवकाश और बीमारी की छुट्टी न मिलने आदि का जीवंत वर्णन किया। मरीज स्वाभाविक रूप से लंबे इंतजार के घंटों और ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं से नाराज़ और निराश हैं। उन्होंने कहा कि उनका गुस्सा व्यवस्था के ख़िलाफ़ होना चाहिए, न कि डॉक्टरों और नर्सों के ख़िलाफ़, जो स्वयं इसी व्यवस्था के शिकार हैं।

सुश्री स्वाति राणे ने सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों की ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं और उनके काम करने के बुरे हालातों के ख़िलाफ़ मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों की एकता बनाने का आह्वान किया।
श्री गिरीश ने पूरे महाराष्ट्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य निधि में भारी कटौती की बात कही। उन्होंने सवाल किया कि अगर डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्यकर्मी खुद अपनी नौकरी जाने के डर में रहेंगे, तो वे उचित स्वास्थ्य सेवा कैसे प्रदान कर पाएंगे। उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों की नौकरियों को नियमित करने और सरकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट में बढ़ोतरी करने का आह्वान किया, ताकि सभी मेहनतकश लोगों को अच्छी गुणवत्ता वाली और किफ़ायती स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो सके।

डॉ. कराड ने बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि स्वास्थ्य सेवा को बड़े कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफ़े का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता।

ब्रिटेन के वर्कर्स यूनिटी मूवमेंट से श्री सलविंदर ने ब्रिटेन और हिन्दोस्तान में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बिगड़ती स्थिति के बीच समानताओं की ओर इशारा किया, जो मेहनतकश जनता के स्वास्थ्य की क़ीमत पर अधिकतम मुनाफ़े के लिए पूंजीवादी लालच का परिणाम हैं।

लोक राज संगठन के उपाध्यक्ष श्री हनुमान प्रसाद शर्मा; टीयूसीसी के श्री हरिशंकर शर्मा; एआईयूटीयूसी के श्री सतीश पवार; सेंचुरीज मिल सत्याग्रह आंदोलन के श्री सुखेंद्र मड़ैया; ट्रेड यूनियन नेता श्री जेपी दूबे और कई अन्य लोगों ने भी चर्चा में योगदान दिया।

प्रतिभागियों के विचारों का सारांश प्रस्तुत करते हुए, श्री बिरजू नायक ने स्वास्थ्य क्षेत्र और अन्य सभी क्षेत्रों के मज़दूरों से एकजुट होकर पूंजीवादी शोषण और गुलामी को ख़त्म करने के संघर्ष में आगे आने का आह्वान किया। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इसके लिए हमें पूंजीपति वर्ग के शासन को मज़दूरों, किसानों और सभी उत्पीड़ित लोगों के शासन से बदलना होगा और मेहनतकश जनता के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए एक नए समाज का निर्माण करना होगा।

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