वी.के. सिंह, अध्यक्ष, एटक, उत्तर प्रदेश द्वारा

सरकार इन्हें सुधार कहती है। कॉरपोरेट घराने इन्हें प्रगति बताते हैं। परन्तु भारत के मेहनतकश वर्ग के लिए ये चार श्रम संहिताएँ सुधार नहीं – क्षरण हैं। दशकों की लड़ाई से अर्जित श्रमिक अधिकारों को मज़दूरों के हाथों से छीना जा रहा है। श्रम कानून, जिन्हें संघर्ष और बलिदान ने जन्म दिया था, उन्हें आज “Ease of Doing Business” के नाम पर कमजोर किया जा रहा है। असल में लागू की जा रही है Ease of Exploitation — शोषण की सुविधा।
देशभर की ट्रेड यूनियनें सड़कों पर इसलिए हैं क्योंकि वे इस चमकदार पैकेजिंग के पीछे छिपा असली चेहरा देख रही हैं — एक ऐसा कानूनी ढाँचा जो सामूहिक शक्ति को कमजोर करता है, पूँजी के मनमानेपन को बढ़ाता है तथा मजदूरों को सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में भी दिहाड़ी पर निर्भर, असुरक्षित और प्रतिस्थापनीय बनाता है। ये संहिताएँ तकनीकी खामियाँ भर नहीं हैं — ये श्रमिक विरोधी विचारधारा का विधान हैं।
I. श्रमिक-विरोधी और यूनियन-विरोधी प्रावधान — शक्ति छीनने की सुनियोजित कोशिश
- हड़ताल के अधिकार पर शिकंजा
औद्योगिक संबंध संहिता में हड़ताल को लगभग असम्भव बनाने वाली शर्तें जोड़ी गई हैं। 14 दिन का पूर्व-नोटिस अनिवार्य, सुलह प्रक्रिया शुरू होने पर भी हड़ताल पर रोक, अचानक संघर्ष की गुंजाइश ख़त्म — यह सब हड़ताल के अधिकार को रस्मी औपचारिकता बना देने के लिए।
यह विनियमन नहीं — यह मजदूर प्रतिरोध का बधियाकरण है। - ‘Hire and Fire’ को आसान बनाना
अब 300 तक मजदूरों वाली इकाइयाँ बिना सरकारी इजाज़त छँटनी कर सकती हैं — पहले यह सीमा 100 थी। इस एक प्रावधान ने नियोक्ताओं के पक्ष में शक्ति संतुलन पूरी तरह पलट दिया। स्थायी नौकरी मिथक बन गई। रोजी-रोटी की सुरक्षा, जो कभी श्रम अधिकारों की रीढ़ थी, अब ध्वस्त हो रही है।
जो मजदूर कल के डर में जीता है, वह आज आवाज़ नहीं उठा सकता — अनिश्चितता को कानून का दर्जा दिया जा रहा है। - फिक्स्ड-टर्म रोजगार: स्थायित्व की जगह समाप्तिता
फिक्स्ड-टर्म अनुबंध को सामान्य बनाकर श्रमिकों को परियोजना-निर्भर, उपभोग्य और समाप्त होने योग्य संसाधन में बदल दिया गया है। काम खत्म — मजदूर खत्म। न मुआवजा, न जिम्मेदारी, न भविष्य।
पूँजी की लचक — इंसान के जीवन से ऊपर। - यूनियन मान्यता को कठिन बनाना
यूनियन मान्यता हेतु सदस्य संख्या की शर्तें बढ़ाई गईं, प्रक्रियाएँ जटिल की गईं। नतीज़ा — एक मजबूत एकीकृत यूनियन की बजाय कई कमजोर, विभाजित संगठन।
यह Divide and Rule की स्वीकृत सरकारी नीति है। - सामाजिक सुरक्षा का पतला होता ढाँचा
समावेशन का दायरा कागज पर बढ़ा, पर अधिकार वास्तविकता में सिकुड़े। गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों का नाम दर्ज है, पर उनकी सुरक्षा अनिश्चित। पीएफ, मातृत्व लाभ, पेंशन — सब कुछ शर्तों, विवेक और ‘योजनाओं’ पर आधारित। अधिकारों को कृपया-दान में बदला जा रहा है।
कल्याण हक नहीं, वैकल्पिक सुविधा बना दिया गया है।
II. क्रियान्वयन में ढील: दण्ड प्रावधान नरम, उल्लंघन आसान
यदि प्रावधान श्रमिक-विरोधी हैं, तो ढीला क्रियान्वयन उन्हें और घातक बना देता है।
- श्रम उल्लंघनों पर दण्ड में कमी
पहले उल्लंघन के गंभीर परिणाम होते थे। अब समझौते, कम्पाउंडिंग, जुर्माने — यानी अपराध खरीदने योग्य। शोषण लाभदायक बन सकता है।
जब कानून के दाँत गिर जाएँ, तो पूँजी बेकाबू हो जाती है। - Self-Declaration आधारित अनुपालन
निरीक्षण को वेबसाइट आधारित Self-Compliance से बदला जा रहा है। यानी मालिक खुद ही प्रमाणपत्र दे कि सब ठीक है। यह नियमन नहीं — उत्तरदायित्व से पलायन है।
लोमड़ी को मुर्गियों की सुरक्षा सौंप दी गई है। - ‘Inspector Raj’ का बहाना बनाकर निरीक्षण का अंत
यूनियनें हमेशा निष्पक्ष निरीक्षण का समर्थन करती रही हैं — समाप्ति का नहीं। जब निरीक्षण लॉटरी बन जाए, तो उल्लंघन न रोके जाते हैं, न दिखते हैं।
अनदेखा अन्याय, दोगुना अन्याय है। - अपराधों का सेटलमेंट और कम्पाउंडिंग
अब अनेक उल्लंघनों का निपटारा अदालत के बाहर धनराशि से हो सकता है। मजदूर की चोट, मजदूरी का अवकाश — क्या इसे रुपये से बराबर किया जा सकता है? यह न्याय नहीं — विशेषाधिकार है।
III. संघर्ष अभी — क्योंकि कल बहुत देर हो जाएगी
यह लड़ाई सिर्फ धाराओं की नहीं — मजदूर के भविष्य की है। क्या श्रमिक लोकतंत्र में भागीदार होगा या केवल बाज़ार की मशीनरी में पुर्जा? ये संहिताएँ संगठित अधिकार से व्यक्तिगत असुरक्षा की ओर छलांग हैं।
ट्रेड यूनियनें अतीत नहीं बचा रहीं — वे मानवता वाले भविष्य की रक्षा कर रही हैं। जहाँ मजदूर संसाधन नहीं, इंसान माना जाए। जहाँ अधिकार भी हों और सम्मान भी।
निष्कर्ष: लोकतंत्र कारखाने के मुख्यद्वार पर खत्म नहीं होता
यूनियन बनाना, सौदेबाजी करना, हड़ताल करना — ये विकास के अवरोध नहीं, न्यायपूर्ण समाज का बुनियाद हैं। नई श्रम संहिताएँ इस बुनियाद को ईंट-दर-ईंट ढहा रही हैं।
इसलिए संघर्ष अनिवार्य है। स्पष्टता और संकल्प के साथ। मज़दूरों और यूनियनों को न सिर्फ विरोध, बल्कि वैकल्पिक नीतिगत दृष्टि भी रखनी होगी — श्रमिक के हक़ की पुनर्स्थापना, संहिताओं की समीक्षा, और वास्तविक सामाजिक सुरक्षा की मांग के साथ।
यह संघर्ष आर्थिक भी है, राजनीतिक भी, नैतिक भी — और अभी शुरू ही हुआ है।
