सर्व हिन्द निजीकरण विरोधी फोरम (AIFAP) के प्रतिनिधि सुश्री सुचरिता का जन स्वास्थ्य अभियान (JSA) के 10-11 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में हुए अधिवेशन में भाषण
सुश्री सुचरिता की प्रस्तुति में उन्होंने सरकारी अस्पतालों व चिकित्सालयों तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदतर हालत पर रोशनी डालीI स्वास्थ्य कर्मियों, दवाइयों, डायग्नोस्टिक चेकिंग इत्यादि की भयानक कमी के कारण आम मेहेनतकश जनता को बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ता हैI इनमें काम करने वाले डॉक्टर, नर्स व अन्य कर्मी अक्सर अकेले ही सैकड़ों मरीजों की देखभाल करने व लम्बे घंटों तक लगातार काम करने को मजबूर होते हैं क्योंकि डॉक्टर, नर्स व स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या ज़रूरत से बहुत कम है। तो दूसरी तरफ, देश दुनिया की बड़ी बड़ी निजी कम्पनियाँ बेहद मुनाफे कमाने के सुस्पष्ट इरादे से, नए नए मेहेंगे अस्पताल खोल रहे हैंI
उनकी प्रस्तुति में उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य सेवा का अधिक से अधिक निजीकरण हमारे देश के हुक्मरान पूंजीपतियों द्वारा 1980-90 के दशक से शुरू होकर, अपनाये गए उदारीकरण और निजीकरण के जरिये वैश्वीकरण के कार्यक्रम का अनिवार्य परिणाम है।
उनकी प्रस्तुति में उन्होंने समझाया कि जन स्वास्थ्य सेवा के मूलभूत अधिकार का हनन — यह मौजूदा पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है। इसे ख़त्म करने के लिए पूंजीवादी शोषण को ही ख़त्म करना होगा। सभी क्षेत्रों के मज़दूरों को जन सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ़, स्वास्थ्य सेवा के अधिकार के लिए, सुरक्षित रोजीरोटी और अन्य सभी अधिकारों के लिए अपने संघर्ष को इस लक्ष्य के साथ आगे बढ़ाना होगा, कि वर्तमान पूंजीपतियों की हुकूमत की जगह पर मेहनतकशों की हुकूमत स्थापित करें।

प्रस्तुति
सर्व हिन्द निजीकरण विरोधी फोरम (AIFAP) की तरफ से इस मंच को संबोधित करते हुए मुझे बहुत खुशी और गर्व है। जैसा कि आप जानते हैं, AIFAP कई अलग–अलग उद्योगों व जनसेवाओं के चलते निजीकरण के खिलाफ़ संघर्ष करता आ रहा है – और हम इन क्षेत्रों में काम करने वाले मज़दूरों तथा उन्भोक्ताओं – दोनों को एक मंच पर लाकर इस संघर्ष को आगे ले जा रहे हैं। आज हमें जन स्वास्थ्य अभियान से आमंत्रित किया गया है स्वास्थ्य क्षेत्र में निजीकरण पर बात रखने के लिए ।
स्वास्थय सेवा (health care) मानव समाज के लिए एक बहुत ही बुनियादी सेवा है। समाज के हर सदस्य को यह अधिकार होना चाहिए कि उसे समय पर उचित, अच्छी गुणवत्ता की और आधुनिकतम स्वास्थ्य सेवा मिले, चाहे शहरों में हो, या गाँव में, पर्वतों में या आदिवासी–वनवासी इलाकों में, या दूर–दराज क्षेत्रों में – और ऐसे मुनासिब/किफ़ायती दामों पर मिले, जो उसके लिए देना मुमकिन हो। इसके लिए आसान पहुँच के अन्दर, अस्पताल और चिकित्सालय हो। उनमें पर्याप्त मात्रा में डॉक्टर, नर्स व स्वास्थ्य कर्मी हों। इनके काम करने की सही हालतें हों, रोजीरोटी की सुरक्षा हो, जान की सुरक्षा हो, इज्ज़त से जीने लायक वेतन हो, सामाजिक सुरक्षा व पेंशन आदि मिले।
परन्तु हमारे देश की हकीकत इससे बहुत दूर है।
सरकारी अस्पतालों व चिकित्सालयों तथा उनमें मिलने वाली सेवाओं की भारी कमी है।
गाँवों व दूर–दराज के इलाकों में छोटी से बड़ी मेडिकल इमरजेंसी के लिए लम्बी, कठिन सफ़र करनी पड़ती है। ग्रामीण चिकित्सालयों में सेवाओं व डॉक्टर – नर्स – स्वास्थय कर्मी के अभाव व काम की भयानक हालतों की बहुत सी खबरें आती रहती हैं। आंगनवाडी, आशा, नेशनल हेल्थ मिशन इत्यादि तमाम स्कीम के तहत स्वास्थ्य कर्मी 6000-8000 रु प्रति माह पर, दूर–दूर जाकर आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं, महिला व बाल स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं, जब कि उन्हें स्वस्थ्य कर्मी या मज़दूर की मान्यता भी नहीं दी जाती है, उनकी नौकरियां सुरक्षित नहीं हैं। सरकारें मन–मर्जी से स्कीम बंद कर देती हैं तो उनकी नौकरी ख़त्म हो जाती है और लोगों को मिलने वाली स्वास्थय सेवाएं भी।
राजधानी दिल्ली में एम्स, सफदरजंग, एलएनजेपी, हिन्दू राव जैसे सरकारी अस्पतालों, या ईएसआई अस्पतालों में मरीजों की लम्बी लाइनें खुद ही अपनी कहानी बताती हैं। इनमें काम करने वाले डॉक्टर, नर्स व अन्य कर्मी अक्सर अकेले ही सैकड़ों मरीजों की देखभाल करने व लम्बे घंटों तक लगातार काम करने को मजबूर होते हैं क्योंकि डॉक्टर, नर्स व स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या ज़रूरत से बहुत कम है।
बड़े–छोटे शहरों में निजी अस्पताल चेन – मैक्स, फोर्टिस, अपोलो, आदि – की कई शानदार अस्पतालें हैं, जिनमें मामूली सेवाएं भी अधिकतम मेहनतकश जनता की पहुँच से बाहर हैं।
स्वास्थ्य सेवा का अधिक से अधिक निजीकरण हमारे देश के हुक्मरान पूंजीपतियों द्वारा 1980-90 के दशक से शुरू होकर, अपनाये गए उदारीकरण और निजीकरण के जरिये वैश्वीकरण के कार्यक्रम का अनिवार्य परिणाम है। अगर इससे पहले अपनाये गए समाजवादी नमूने के समाज में सरकारी अस्पतालों व डिस्पेंसरियों में नि:शुल्क या मुनासिब दामों पर स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने पर, गांव–गांव में सरकारी अस्पतालों व डिस्पेंसरियों की स्थापना पर ज़ोर दिया जाता था, तो अब हिन्दोस्तानी पूंजीपति इजारेदार पूंजीपति बन गए हैं, वे दुनिया के बड़े–बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों के साथ स्पर्धा करने और दुनिया में अपना विस्तार करने में लगे हुए हैं। समाजवादी नमूने के समाज का सारा दिखावा त्याग दिया गया और कई दूसरे उद्योगों व सेवाओं की तरह, स्वास्थ्य सेवा के निजीकरण का दौर शुरू हुआ।
लेकिन निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा पाना मेहनतकश जनसमुदाय की पहुंच से बाहर है। सरकारी स्वास्थ्य सेवा को क्रमश: बर्बाद कर दिया गया, सरकार का स्वास्थ्य पर खर्च कम कर दिया गया, सरकारी अस्पतालों में इलाज पाना बहुत ही मुश्किल बना दिया गया। इन हालतों में मेहनतकश जनता के गुस्से और विरोध को ठंडा करने के लिए हुक्मरानों ने पीपीपी (public private partnership) का निजीकरण का मॉडल शुरू किया, जिसमें निजी अस्पतालों व निजी मेडिकल सेवाओं के लिए लोगों को सरकारी अस्पतालों से भेजा जायेगा, सरकार अस्पतालों को स्थापित करने पर ज़मीन दिलायेगी और निवेश करेगी, फिर उनका मैनेजमेंट निजी हाथों में दे दिया जायेगा।
इसके साथ–साथ, सरकारी अस्पतालों में कई सेवाएं निजी कंपनियों को सौंप दी गयी – डाईगनोस्टिक्स, एम्बुलेंस, ब्लड बैंकस, टेलीमेडिसिन सर्विसेज, स्वास्थ्य व कल्याण केंद्रों को चलाना, इ.. (diagnostics, ambulance, blood banks, telemedicine services, in the running of the health and wellness centres (HWCs)। विभिन्न सरकारी स्कीमों के तहत – CGHS, ESI, Ayushman Bharat – मेहनतकश लोगों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों में भेजा जाता है। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र के निजी इजारेदार पूंजीपतियों – मैक्स, फोर्टिस, एस्कॉर्ट्स, आदि – के मुनाफों में खूब बढ़ोतरी हो रही है, और मेहनतकशों को यह बताया जाता है कि सरकार आपको सस्ते में टॉप–क्लास स्वास्थ्य सेवा दिला रही है। जब कि सरकार मेहनतकश जनता को पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की अपनी नाकामयाबी को छिपाने के लिए, मेहनतकश लोगों के स्वास्थ्य स्कीमों में अंशदान व लोगों के टैक्स के पैसों से निजी इजारेदार पूंजीपतियों की तिजौरियों को भर रही है। दुनिया भर की बड़ी–बड़ी इजारेदार पूंजीवादी कम्पनियां अब मेडिकल इंश्युरेंस — स्वास्थ्य बीमा – के बिज़नेस में लगी हुयी हैं और निजी अस्पतालों की सांठ–गांठ में लोगों की बेतहाशा लूट चल रही है।
अच्छी गुणवत्ता की तथा मुनासिब दामों पर स्वास्थ्य सेवा पाने के मेहनतकशों के अधिकार के इस क्रूर हनन की जड़ हमारे देश में मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में है। हमारा हुक्मरान वर्ग पूंजीपति वर्ग है, जिसकी अगुवाई कुछ गिने चुने इजारेदार पूंजीवादी घराने करते हैं, जैसे कि टाटा, बिड़ला, अम्बानी, अदानी तथा अन्य। हिन्दोस्तानी राज्य इस हुक्मरान पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा करता है, इसकी सेवा में काम करता है और अपने सुरक्षा बलों, कानूनों तथा न्याय व्यवस्था के जरिये इसे मेहनतकश जनता के गुस्से से बचाता है।
यह भ्रम फैलाया जाता कि चुनावों में वोट डालकर लोग अपनी सरकार चुनते हैं, कि यह लोकतंत्र हैं – जब कि लोगों के पास न तो अपने उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार है, न चुने गए प्रतिनिधि को जवाबदेह ठहराने का, न उसे वापस बुलाने का, और न ही जनहित में क़ानून व नीतियां बनाने का। वही पार्टियाँ सरकारें बना पाती हैं जो वफ़ादारी से पूंजीपतियों के एजेंडे को लागू करती हैं। इसलिए, चाहे सरकार चलाने वाली पार्टी बदल भी जाये, लेकिन लोगों की समस्याएं हल नहीं होती हैं, बल्कि और गंभीर होती रहती हैं। जनसेवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण अनवरत चलता जा रहा है।
पूंजीपति हुक्मरानों का उद्देश्य अपने मुनाफों की अनवरत वृद्धि करना है। उन्हें न तो मेहनतकश जनता की खुशहाली की चिंता है, न डॉक्टरों, नर्सों, या किसी भी क्षेत्र के मज़दूरों की।
हमें एक सर्व–व्यापक, यूनिवर्सल, स्वास्थ्य सेवा के लिए संघर्ष करना होगा, जिसके तहत सभी को, बिना किसी अपवाद के, अच्छी गुणवत्ता की, सस्ते दामों पर, बिना घंटों–महीनों–सालों तक इंतज़ार किये, समय पर इलाज मिले। यह मांग निजीकरण कार्यक्रम के खिलाफ़ हमारे संघर्ष का एक अहम हिस्सा है । सर्व हिन्द निजीकरण विरोधी फोरम (AIFAP) ऐसा मानता है और इस संघर्ष का पूरी ताकत लगाकर समर्थन करता है।
स्वास्थय सेवा और इसके साथ–साथ तमाम उद्योगों व जन सेवाओं – रेलवे, बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, आदि — का निजीकरण हमारे हुक्मरान पूंजीपति वर्ग का कार्यक्रम है, जिसके जरिये वे मेहनतकशों का ज़ोरदार शोषण करके तथा हमारे प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा लूट करके, खुद को अमीर बनाना चाहते हैं और दुनिया के बड़े–बड़े इजारेदार पूंजीपतियों में गिने जाना चाहते हैं।
जन स्वास्थ्य सेवा के मूलभूत अधिकार का हनन — यह मौजूदा पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है। इसे ख़त्म करने के लिए पूंजीवादी शोषण को ही ख़त्म करना होगा। सभी क्षेत्रों के मज़दूरों को जन सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ़, स्वास्थ्य सेवा के अधिकार के लिए, सुरक्षित रोजीरोटी और अन्य सभी अधिकारों के लिए अपने संघर्ष को इस लक्ष्य के साथ आगे बढ़ाना होगा, कि वर्तमान पूंजीपतियों की हुकूमत की जगह पर मेहनतकशों की हुकूमत स्थापित की जाये, जिसमें लोग अपने भविष्य पर असर डालने वाले सभी फैसले लेने और नीतियां बनाने में सक्षम होंगे, न कि फैसले लेने और नीतियां बनाने का काम कुछ सांसदों के हाथों में छोड़ दिया जाये – जैसे कि अब होता है – जो हमारे हितों के खिलाफ और पूंजीपतियों के हितों के पक्ष में ही हमेश काम करते हैं।
हमें इस नज़रिए के साथ संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा कि एक ऐसे नए समाज की रचना की जाये जिसमें सभी लोगों की खुशहाली को सुनिश्चित करना राज्य का फ़र्ज़ होगा, अर्थव्यवस्था की प्रमुख दिशा होगी, न कि पूंजीवादी शोषकों की अमीरी को बढ़ाना।
