न्यूयॉर्क शहर के तीन सबसे बड़े निजी अस्पताल में लगभग 15,000 नर्सों ने अपनी मांगों को लेकर हड़ताल की ।
कामगार एकता कमिटी संवाददाता की रिपोर्ट
पूंजीवादी व्यवस्था में स्वास्थ्य जैसी हर आवश्यक सेवा को भी लाभ के साधन के रूप में देखा जाता है। नतीजतन मरीज और स्वास्थ्यकर्मी दोनों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। सभी पूंजीवादी देशों में स्वास्थ्यकर्मी अपने और मरीज के हितों की रक्षा करने के लिए मजबूर हैं। सभी को अच्छी स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित कराना राज्य की जिम्मेदारी है। जो राज्य यह नहीं करता उसे बदल कर मेहनतकशों का राज्य स्थापित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

12 जनवरी की सुबह माउंट सिनाई, मोंटेफियोर और न्यूयॉर्क प्रेस्बिटेरियन अस्पतालों में विरोध प्रदर्शन कर रही नर्सों ने एकजुट होकर काम बंद कर दिया। उन्होंने अपनी मांगों को उजागर करते हुए नारे लगाए और सर्द सर्दियों की सुबह 6 बजे मार्च किया। यह हड़ताल शहर के इतिहास में नर्सों की सबसे बड़ी हड़तालों में से एक थी।
नर्सें अधिकारियों के साथ चल रही अनुबंध वार्ता की विफलता के विरोध में प्रदर्शन कर रही थीं, जो कई महीनों से जारी थी। अस्पतालों के प्रबंधन ने उन मुख्य मुद्दों पर ध्यान देने से इनकार कर दिया, जिनके लिए न्यूयॉर्क स्टेट नर्सिंग एसोसिएशन संघर्ष कर रहा है: मरीजों के लिए सुरक्षित स्टाफिंग, नर्सों के लिए स्वास्थ्य देखभाल लाभ और कार्यस्थल पर हिंसक हमलों से नर्सों की सुरक्षा। नर्स एसोसिएशन ने बताया कि ये अस्पताल भारी मुनाफा कमा रहे हैं, फिर भी वे नर्सों के स्वास्थ्य लाभों को बंद करने या उनमें भारी कटौती करने और स्टाफिंग मानकों को वापस लेने की धमकी दे रहे हैं।

2021 में, न्यूयॉर्क राज्य ने एक कानून पारित किया जिसके तहत प्रत्येक अस्पताल में विभागवार स्टाफिंग योजनाओं को तैयार करने हेतु समितियाँ गठित करना अनिवार्य हो गया, जिसमें क्रिटिकल केयर यूनिटों में प्रत्येक दो मरीजों के लिए कम से कम एक नर्स का होना शामिल है। यह कोविड-19 महामारी के दौरान नर्सों की भारी कमी के अनुभव का परिणाम था। इस कानून के बावजूद, अस्पतालों में अभी भी स्टाफ की कमी बनी हुई है। इन मानकों को सभी अस्पताल इकाइयों में लागू करवाने के लिए नर्सों ने 2023 में हड़ताल की थी।
नर्सें अब फिर से हड़ताल पर हैं क्योंकि अस्पताल प्रबंधन उन मानकों से पीछे हट रहे हैं। इसके अलावा, कार्यस्थल पर स्वास्थ्यकर्मियों पर हिंसक हमलों में वृद्धि के बावजूद, अस्पताल प्रबंधन ने उनकी सुरक्षा को मजबूत करने की मांगों पर ध्यान नहीं दिया है। नवंबर में माउंट सिनाई अस्पताल में हुई गोलीबारी की घटना और पिछले सप्ताह ब्रुकलिन के न्यूयॉर्क प्रेस्बिटेरियन अस्पताल में हुई घातक गोलीबारी के बाद उनकी चिंताएं और बढ़ गई हैं।
अमेरिका की ही भांति हिन्दोस्तान में भी नर्से अपनी मांगो को लेकर संघर्ष कर रही हैंI पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश इत्यादि राज्यों के कई शहरों में नर्सों ने अपनी मांगो को लेकर हड़ताल की हैI महाराष्ट्र राज्य नर्सिंग एसोसिएशन (MSNA) की 47 शाखाओं द्वारा सरकारी अस्पतालों में कार्यरत लगभग 30,000 नर्सों ने अस्थायी अनुबंधों पर नर्सों की भर्ती बंद करने और उनके भत्तों में वृद्धि की मांग, रिक्त पदों को तत्काल भरने और उनका कार्यभार कम हो सके इसलिए अनिश्चितकालीन हड़ताल की थीI
राजस्थान में सभी सरकारी अस्पतालों और औषधालयों में कार्यरत लगभग 55,000 नर्सों ने अपनी 11 सूत्री मांगों के समर्थन में आंदोलन किया था। परन्तु, सरकार ने नर्सों की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया था, जिसके चलते उनके पास हड़ताल पर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।आंदोलनकारी नर्सों की मुख्य मांगें थीं कि नर्सिंग शिक्षा और उन्नत विभागीय नर्सिंग प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाए; नर्सिंग शिक्षकों के रिक्त पदों को तुरंत भरा जाए; वेतन और भत्ते केंद्रीय सरकारी संस्थानों के बराबर किए जाएं; संविदा नर्सों को नियमित किया जाए और प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से भर्ती पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए; नर्सिंग अधिकारी, नर्सिंग ट्यूटर और प्रिंसिपल के सभी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए; समयबद्ध पदोन्नति नीति लागू की जाए; रियायती दरों पर आवासीय भूखंड आवंटित करके नर्सिंग कॉलोनियों की स्थापना की जाए; अस्पताल के अतिरिक्त कार्यों के लिए नर्सों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाए; एक अलग नर्सिंग निदेशालय की स्थापना की जाए, आदि।
मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों और खंडवा, मंदसौर, सतना, बुरहानपुर, छतरपुर, विदिशा, खरगोन के जिला अस्पतालों में काम करने वाली हजारों नर्सें हड़ताल पर चली गयी थी। नर्सिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन का कहना था कि वेतन में असमानता, पदोन्नति और नए पदों पर भर्ती जैसी मांगें लंबे समय से लंबित हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति 1000 व्यक्तियों पर केवल 1.7 नर्सें हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सुझाई गई न्यूनतम 3 नर्सों की संख्या से कम है। बुनियादी सुवधाओं, अपर्याप्त वेतन के अभाव में कई भारतीय नर्सों ने देश के बाहर नौकरियां करना ज्यादा बेहतर समझा। इसके परिणामस्वरूप वर्तमान में 64 लाख से अधिक भारतीय नर्सें विदेशों में काम कर रही हैं, जिनमें ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और खाड़ी देश शामिल हैं।
भारत का पूंजीवादी राज्य नर्सों की मूल्यवान सेवा की कोई क़द्र नहीं करता इसके विपरीत उन्हें हर बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखता है और उनकी मांगो के प्रति उदासीनता दिखाता है, संघर्ष के दौरान उन्हें डराता है, धमकाता है। मजदूर किसानों द्वारा बसाये गए राज्य में ही नर्सो की मांगो को संपूर्ण न्याय दिया जायेगा।
