महाराष्ट्र के ठाणे से श्री राकेश का AIFAP की वेबसाइट के संपादक को पत्र

प्रति संपादक,
मैंने आपकी वेबसाइट पर प्रकाशित NCCOEE (बिजली कर्मचारियों और इंजनीयरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति) की घोषणा (https://hindi.aifap.org.in/16497/) पढ़ी। मैं उनकी तथ्यों पर आधारित घोषणा के लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहता हूँ। उन्होंने बिजली क्षेत्र के बारे में कई ऐसे तथ्य बताए हैं, जिनसे मौजूदा हालात की सच्चाई सामने आती है।
पहला सवाल यह है कि अगर यह देश लोकतांत्रिक है, तो फिर लोगों द्वारा चुनी गई सरकार अपने ही लोगों की इच्छा के खिलाफ काम क्यों कर रही है? जैसा कि हम देख सकते हैं, बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों सहित अनगिनत लोग—मज़दूर, किसान और युवा—इस ‘जन-विरोधी’ बिल का इसके शुरू होने के समय से ही विरोध कर रहे हैं; लेकिन केंद्र और राज्य की सभी सरकारें इसके निजीकरण पर ही ज़ोर दे रही हैं। अगर लोगों को नीति-निर्माण में अपनी बात रखने का अधिकार ही नहीं है, तो फिर यह किस तरह का लोकतंत्र है?
दूसरा सवाल यह है कि अगर यह बिजली क्षेत्र घाटे में चल रहा है, तो फिर इसे खरीदने के लिए इतने सारे पूँजीपति कतार में क्यों लगे हुए हैं? क्या वे इतने दरियादिल हैं कि वे लोगों की सेवा करने के लिए अपनी पूँजी (पैसे) को दाँव पर लगाने को तैयार हैं? मैं घोषणा से एक अंश उद्धृत करना चाहूँगा:
“उत्तर प्रदेश में, जहाँ सरकार PVVNL और DVVNL का निजीकरण करने की कोशिश कर रही है। इन DISCOMs (बिजली वितरण कंपनियों) को घाटा कम करने के उद्देश्य से ‘संशोधित वितरण क्षेत्र योजना‘ (RDSS) के तहत भारी निवेश प्राप्त हुआ है। अभी भी इन पर लगभग ₹66,000 करोड़ के ऐसे बिल बकाया हैं, जिनकी वसूली की जा सकती है। इसके बावजूद, प्रस्तावित ‘आरक्षित बोली मूल्य‘ (reserve bid price) कथित तौर पर केवल ₹6,500 करोड़ के आसपास है, जबकि इनका अनुमानित मूल्य ₹1 लाख करोड़ से भी अधिक है।”
प्रस्तावित आरक्षित बोली का मूल्य, वसूली योग्य बिलों के मूल्य से 10 गुना कम है, और इनके अनुमानित मूल्य से 15 गुना कम है। तो अगर यह लोगों द्वारा चुनी गई सरकार है, तो फिर यह पूँजीपति बोलीदाताओं (bidders) के लिए काम क्यों कर रही है?
तीसरा सवाल जो यहाँ उठता है, वह यह है कि क्या यह मुद्दा केवल किसी एक पार्टी का है, या फिर सभी पार्टियों का? घोषणा से एक और अंश:
“1980 के दशक में, SEBs (राज्य बिजली बोर्डों) पर लेखांकन सुधारों (accounting reforms) के माध्यम से वित्तीय अधिशेष (surplus) अर्जित करने का दबाव डाला गया। 1991 में, बिजली उत्पादन के क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोल दिया गया, और 1990 के दशक के मध्य तक, राज्यों ने बिजली वितरण के क्षेत्र में भी निजी कंपनियों को आमंत्रित करना शुरू कर दिया। ओडिशा, हरियाणा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने इस प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए सुधार संबंधी कानून भी पारित किए।”
यदि हम इस घटनाक्रम की समय-रेखा पर नज़र डालें, तो हम पाते हैं कि लगभग सभी पार्टियों ने — चाहे अकेले दम पर या फिर गठबंधन के माध्यम से — सरकार बनाई है; लेकिन उनकी नीति एक ही रही है, और वह है — निजीकरण की नीति।
अब चौथा सवाल यह है कि यदि किसी शासन व्यवस्था में सभी राजनीतिक दल जनता या मतदाताओं की इच्छा के विरुद्ध कार्य कर रहे हों, तो क्या ऐसी व्यवस्था को श्रमिकों, किसानों, महिलाओं और युवाओं की राजनीतिक व्यवस्था कहा जा सकता है?
राकेश, मुंबई
