श्री उग्रसेन, AIFAP के पाठक द्वारा
हाल ही में दिल्ली के जंतर मंतर पर भारतीय रेल के लोको पायलटों का विशाल प्रदर्शन हुआ। “विकल्प वाणी” यु ट्यूब चैनेल पर उस प्रदर्शन का वीडियो प्रदर्शित हुआ। लोको पायलटों के एक नेता ने अपने साक्षात्कार में कहा कि “सतर्क लोको पायलट ही सबसे बेहतर सुरक्षा यंत्र है। लोको पायलटों पर ड्यूटी की बेहद वहशी ज्यादती से सवाल उठाता है कि अगर यह सरकार ‘लोगों की‘ और ‘लोगों के लिए‘ है, तो फिर रेलवे कर्मचारियों और आम जनता की बात, उनके कई सामूहिक विरोध प्रदर्शनों के बावजूद, क्यों नहीं सुनी जाती? सुरक्षित रेल यात्रा के मामले में इतनी लापरवाही जिस व्यवस्था में हो, क्या उसे हम लोकतंत्र कह सकते है?

यह सुनकर बहुत हैरानी होती है जब भारत सरकार सोने वाले लोको पायलटों पर नज़र रखने के लिए आधुनिक तकनीक लगाने की बात करती है। यह तो बस बेहद भद्दा मजाक ही है, क्योंकि पहले तो सरकार इन लोको पायलटों को लगातार 12 घंटे या उससे भी ज़्यादा काम करने के लिए मजबूर करती है, जिससे उन्हें थकान होती है और फिर उन्हें पकड़ने के लिए उनकी रेटिना पर नज़र रखने वाली तकनीक लगाती है। अगर उन्हें ठीक से आराम मिलता, तो क्या ऐसी तकनीक की ज़रूरत पड़ती?
ऊपर कही गई बातों से एक गंभीर सवाल उठता है: क्या यह आधुनिक तकनीक इस समस्या को जड़ से खत्म करने में मदद कर पाएगी? चलिए, मान लेते हैं कि यह आधुनिक तकनीक किसी थके-हारे लोको पायलट (LP) या सहायक लोको पायलट (ALP) को ‘माइक्रो-स्लीपिंग’ (कुछ पल के लिए सो जाने) करते हुए पकड़ लेती है। ऐसे में भारतीय रेलवे अधिकारियों के पास क्या विकल्प होंगे? क्या वे ट्रेन का चलना रोक देंगे, और जब तक कोई नया लोको पायलट नहीं मिल जाता, तब तक ट्रेन को आगे बढ़ने से रोककर रखेंगे?
बेहद ज्यादा मात्रा में जो रिक्तियाँ है उनपर नए लोको पायलटों को नियुक्त करना, क्या यह भारतीय रेलवे के लोको पायलटों की बहुत पुरानी माँग नहीं है? क्या वे इस माँग को लेकर बार-बार संघर्ष नहीं करते रहे हैं? क्या रेलवे अधिकारियों ने उन्हें निलंबित करने या उनका तबादला करने के अलावा, उनकी इस मुश्किल हालत पर कभी कोई ध्यान दिया है?
कई सुरक्षा समितियों की सिफ़ारिशों के अनुसार, LPs से लगातार दो से ज़्यादा रात की ड्यूटी करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए; लेकिन रेलवे अधिकारी इन सिफ़ारिशों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करते हैं और LPs तथा ALPs को लगातार दो से ज़्यादा रात की ड्यूटी करने के लिए मजबूर करते हैं। इससे उन्हें ज़रूरी आराम नहीं मिल पाता और जैसा कि पहले भी हो चुका है, इसके कारण दुर्घटनाएँ भी हो सकती हैं।
लोको-पायलटों के प्रति उनके अमानवीय बर्ताव के कुछ ऐसे बेहद गंभीर उदाहरण हैं जिनके परिणामस्वरूप लोगों की जान चली गई।
कंचनजंगा दुर्घटना में शामिल मालगाड़ी के LP ने पहले ही लगातार तीन रात की ड्यूटी कर ली थी और जब वह चौथी रात आराम कर रहा था, तो उसे रात 2 बजे अचानक जगाया गया और मालगाड़ी की कमान संभालने के लिए कहा गया। उसने इसका विरोध किया, लेकिन आखिरकार सुबह 6:30 बजे वह ट्रेन चलाने के लिए आ गया।
3 जून 2024 को पंजाब के अंबाला में, एक मालगाड़ी के LP और ALP दोनों को नींद का हल्का झोंका (‘माइक्रोस्लीप’) आ गया, जिसके कारण उनकी ट्रेन दूसरी मालगाड़ी से टकरा गई। यह LP अपनी लगातार चौथी रात की ड्यूटी कर रहा था। उसे उस महीने में पहले ही ज़बरदस्ती 12 रात की ड्यूटी करने के लिए मजबूर किया गया था।
एक मामले में, लखनऊ में एक LP को मेडिकल छुट्टी देने से मना कर दिया गया। उसने तो अधिकारियों को अपनी पैंट उतारकर अपनी अभी तक ठीक न हुई बवासीर की सर्जरी भी दिखाई, साथ ही दवाएँ और पट्टियाँ भी दिखाईं। छुट्टी देने के बजाय, LP को इस मामले को मीडिया में लाने के लिए ड्यूटी से सस्पेंड कर दिया गया। अधिकारी अपना फ़ैसला पलटने को मजबूर हुए, जब उसके साथियों ने मिलकर ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन किया।
ऊपर बताई गई सभी बातें सरकार और भारतीय रेलवे के प्रसाशन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
ऐसा ही एक सवाल यह है, कि अगर सरकार को अपने सभी नागरिकों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीकों से टैक्स वसूलने का अधिकार है, तो क्या उसका यह फ़र्ज़ नहीं बनता कि वह सुरक्षित और आरामदायक रेल यात्रा की सुविधा भी दे?
दूसरा, अगर यह सरकार ‘लोगों की‘ और ‘लोगों के लिए‘ है, तो फिर रेलवे कर्मचारियों और आम जनता की बात, उनके कई सामूहिक विरोध प्रदर्शनों के बावजूद, क्यों नहीं सुनी जाती? यह किस तरह का लोकतंत्र है?
तीसरा, जब रेलवे के निजीकरण की बात आती है, तो सरकार बिजली की तेज़ी से काम करती है; लेकिन जब बात रेलवे कर्मचारियों और आम जनता की आती है, तो वह बहरी क्यों हो जाती है? आख़िर सरकार असल में किसके हितों की सेवा कर रही है?
लोको पायलटों का संघर्ष सभी मेहनतकश लोगों और रेल कर्मचारियों का संघर्ष है। हम सभी को अपनी एकता को मज़बूत करना होगा और मिलकर संघर्ष करना होगा। बार-बार यह साबित हुआ है कि केवल सामूहिक संघर्ष से ही लोगों को राहत मिली है; इसलिए हम सभी को हर तरह के मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुट होना चाहिए।
