कामगार एकता कमेटी के संवाददाता की रिपोर्ट
कार्यस्थल पर श्रमिकों की सुरक्षा और कल्याण के प्रति सरकार का घोर लापरवाही भरा रवैया निंदनीय है। सभी कार्यस्थलों पर सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराना सरकार का दायित्व है। नए श्रम कानूनों के अनुसार, इसे पूंजीपति मालिकों के “स्व-प्रमाणन” पर नहीं छोड़ा जा सकता। अपने प्रतिष्ठानों में सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाले पूंजीपतियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

मार्च 2026 के महीने में, महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों से कई फैक्ट्रियों में हुई दुर्घटनाओं की ख़बरें आईं।
2 मार्च को मुंबई के पास पालघर जिले में भगेरिया इंडस्ट्रीज लिमिटेड में, एक स्टोरेज टैंक से जहरीली ओलियम गैस लीक हो गई, जिससे एक घना सफेद बादल बन गया जो आस-पास के इलाकों में फैल गया। 2,600 से ज़्यादा लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया, जिनमें आस-पास के स्कूलों के लगभग 1,600 छात्र-छात्रायें भी शामिल थे।
पालघर जिले में एक और घटना में, अमूल दूध प्रोसेसिंग प्लांट में रेफ्रिजरेशन सिस्टम के रखरखाव के दौरान अमोनिया गैस लीक होने से पांच मज़दूरों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
9 मार्च 2026 को मुंबई के पास अंबरनाथ औद्योगिक इलाके में स्थित गणेश केमिकल कंपनी नाम की एक केमिकल फैक्ट्री में भीषण आग लग गई। आग की वजह से कई धमाके हुए क्योंकि प्लांट के अंदर बड़ी मात्रा में केमिकल जमा थे।
इनमें सबसे बड़ी दुर्घटना 1 मार्च 2026 को हुई, जब नागपुर जिले के राऊलगांव में एसबीएल एनर्जी लिमिटेड की विस्फोटक बनाने वाली यूनिट में एक बड़ा धमाका हुआ। यह धमाका डेटोनेटर (विस्फोटक) पैकिंग यूनिट में हुआ था। जब तक आखिरी रिपोर्टें आईं, तब तक इस दुर्घटना में 22 मज़दूरों की मौत हो चुकी थी और 14 से ज़्यादा मज़दूर गंभीर रूप से जलने के कारण इलाज करवा रहे थे। इनमें से ज़्यादातर महिला मज़दूर थीं। इस हक़ीक़त पर ध्यान देना ज़रूरी है कि इनमें से ज़्यादातर मज़दूरों को ठेकेदारों के जरिए अनुबंध या अस्थायी मज़दूरों के तौर पर काम पर रखा गया था।
ऊपर बताई गई दुर्घटना के चार हफ्ते बाद भी, महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी की जाने वाली अंतिम जांच रिपोर्ट का इंतजार है। इस रिपोर्ट में सुरक्षा में हुई चूक के ख़ास कारणों के बारे में और ज़्यादा जानकारी मिलेगी। एसबीएल एनर्जी लिमिटेड के कुछ निदेशक गिरफ़्तारी से बचने के लिए फ़रार बताये जा रहे हैं।
एसबीएल एनर्जी लिमिटेड एक निजी हिन्दोस्तानी कंपनी है जो मुख्य रूप से खनन, विनिर्माण और रक्षा क्षेत्रों के लिए औद्योगिक विस्फोटक, डेटोनेटर और ब्लास्टिंग से जुड़ी चीजें बनाती है। हिन्दोस्तान के औद्योगिक विस्फोटक बाज़ार में इसकी अनुमानित हिस्सेदारी 10 प्रतिषत है। इसके ग्राहकों में खनन कंपनियां, विनिर्माण ठेकेदार और सरकारी एजेंसियां शामिल हैं; साथ ही यह अपने उत्पाद 20 से ज़्यादा देशों को निर्यात भी करती है। इस बात को भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि अप्रैल 2025 में, डेटोनेटर क्रिम्पिंग प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर एक धमाका हुआ था, जिसमें दो महिला मज़दूरों के हाथों में जलने से चोटें आईं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बताया जा रहा है कि इस फैक्टरी में पहले भी कई दुर्घटनाएं हो चुकी हैं।
एसबीएल एनर्जी फैक्टरी में, हाल ही में हुए धमाके के बाद कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे पता चलता है कि सरकारी एजेंसियों और सिर्फ़ मुनाफे़ के पीछे भागने वाले पूंजीपति मालिकों ने, सुरक्षा के मामले में घोर लापरवाही बरती है। बताया गया है कि PESO (पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन) और DISH (औद्योगिक सुरक्षा और स्वास्थ्य निदेशालय) जैसी सुरक्षा एजेंसियों की जांच में एसबीएल एनर्जी की विस्फोटक फैक्टरी में सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर उल्लंघन पाए गए हैं। सुरक्षा से जुड़ी जो मुख्य समस्याएं पाई गईं, वे इस प्रकार हैं :
- विस्फोटकों का अनुचित भंडारण
- रसायनों और सामग्रियों के भंडारण के ख़राब तरीके़
- प्रशिक्षित मज़दूरों की कमी
- विस्फोटकों को संभालने जैसे उच्च-जोखिम वाले काम में लगे कई मज़दूरों को ठीक से प्रशिक्षित नहीं किया गया था।
- कुछ मज़दूरों को काम शुरू करने से पहले सुरक्षा का कोई बुनियादी प्रशिक्षण नहीं दिया गया था।
- फैक्ट्री अधिनियम का उल्लंघन करते हुए, योग्य सुरक्षा अधिकारियों को नियुक्त न करना।
- फैक्ट्री के स्वीकृत नक्शे से विचलन और उसका उल्लंघन
- खबरों के अनुसार, फैक्ट्री के कुछ हिस्से स्वीकृत सुरक्षा नक्शा योजना से मेल नहीं खाते थे, जो कि विस्फोटक निर्माण इकाइयों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- आपातकालीन तैयारियों का अभाव, आपातकालीन निकास दरवाज़ों की अपर्याप्त व्यवस्था, और कर्मचारियों के लिए उचित सुरक्षा अभ्यास (ड्रिल) का न होना
- सरकार की उचित अनुमति के बिना, अनधिकृत रूप से बॉयलर स्थापित करना
PESO, DISH, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) और स्थानीय जिला प्रशासन (फायर ब्रिगेड, स्थानीय पुलिस आदि) ऐसी सभी फैक्ट्रियों के सालाना जांच और अचानक किए जाने वाले जाचं के लिए ज़िम्मेदार हैं।
एक जाहिर सा सवाल जो पूछा जाना चाहिए, वह यह है कि ये सरकारी एजेंसियां, जिन्हें विस्फोटक बनाने वाली यूनिटों में सुरक्षा से जुड़े मामलों पर नज़र रखनी चाहिए थी, वे क्या कर रही थीं? दुर्घटना होने से पहले उन्होंने इन समस्याओं पर ध्यान क्यों नहीं दिया? क्या उन्होंने सचमुच तय समय के मुताबिक जांच किए थे और उन जांचों में क्या पाया गया था? धमाके के 4 हफ्ते बाद भी, महाराष्ट्र सरकार इस सीधे-सादे सवाल का जवाब नहीं दे रही है।
इस हक़ीक़त पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है कि औद्योगिक और विस्फोटक सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार कई सरकारी एजेंसियों में निरीक्षकों की कमी की बात सभी को अच्छी तरह से पता है। इस कमी का असर, उन सभी निरीक्षण-प्रक्रियाओं पर पड़ता है जो फैक्टरीज एक्ट, 1948 और विस्फोटक एक्ट, 1884 जैसे क़ानूनों के तहत ज़रूरी हैं। बताया गया है कि 2.7 लाख से ज़्यादा फैक्टरियों के लिए लगभग 1,400 निरीक्षक नियुक्त किये गए थे, जिसका मतलब है कि हर निरीक्षक को लगभग 200 फैक्टरियों की सुरक्षा-जांच करनी होती है – जो कि एक बिल्कुल नामुमकिन काम है। इसका नतीजा यह होता है कि असली मौके पर जाकर जांच के बजाय “कागजी जांच” ही होते हैं।
रिर्पोटों के मुताबिक, महाराष्ट्र में भी मंजूर की गई 105 पदों पर नियुक्ति होने की ज़रूरत में से सिर्फ 30 फैक्टरी निरीक्षकों की ही नियुक्ति हुई हैं! विशेषज्ञों का कहना है कि यह कमी उन मुख्य वजहों में से एक है जिनकी वजह से विस्फोटक बनाने वाले उद्योगों सहित ख़तरनाक उद्योगों में लगातार औद्योगिक दुर्घटनाएं होती रहती हैं। परन्तु, यह बात पूंजीपति मालिकों को पूरी तरह से रास आती है; वे उत्पादन और मुनाफ़ा बढ़ाने के अपने लालच में, सुरक्षा के न्यूनतम इंतजामों के साथ ही, मज़दूरों पर काम का बहुत ज़्यादा बोझ डाल देते हैं। डेटोनेटर (विस्फोटक) की पैकिंग जैसे काम में, काम के बोझ से दबा हुआ मज़दूर, जिसकी काम करने की क्षमता कम हो गई हो और जिसका मन और शरीर थका हुआ हो – ऐसा मज़दूर किसी बड़ी दुर्घटना को न्योता देने जैसा ही है। अनुबंध पर काम कराने का चलन बढ़ने के साथ-साथ, डेटोनेटर की पैकिंग जैसे ख़तरनाक कामों के लिए भी बिना प्रशिक्षण वाले मज़दूरों को ही काम पर रखा जाता है। इसलिए यह बात बिल्कुल साफ़ है कि अलग-अलग सरकारी एजेंसियां – चाहे सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की क्यों न हो – मज़दूरों की सुरक्षा को नज़रंदाज़ करने के पूंजीपतियों के इस आपराधिक रवैये में उनके साथ पूरी तरह से मिली हुई हैं। यही वजह है कि हर साल पूरे देश में सैकड़ों औद्योगिक दुर्घटनाओं में हजारों-लाखों मज़दूर अपनी जानें गंवा देते हैं और हज़ारों गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद, किसी भी दुर्घटना में पूंजीपति मालिकों को दोषी नहीं ठहराया जाता और न ही उन्हें कोई कड़ी सज़ा दी जाती है।
लेकिन पूंजीपति हमेशा ज़्यादा मुनाफ़े के लालची होते हैं, और इसलिए वे सब सुरक्षा नियमों में और भी ज़्यादा ढील चाहते हैं। यही वजह है कि उनके हुक्म के मुताबिक, केंद्र सरकार ने हाल ही में ”व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की हालातों की संहिता, 2020“ लागू की है। इस संहिता के अनुसार, पूंजीपति फैक्टरी मालिकों को एक ”स्व-घोषणा“ देनी होगी कि सभी सुरक्षा नियमों का पालन किया जा रहा है, और ”सरकारी एजेंसियों द्वारा अनिवार्य नियमित निरीक्षणों की जगह अब ’जोखिम-आधारित निरीक्षण’ किए जाएंगे“। जब सरकार और उसके समर्थक ”व्यापार (बिजनेस) करने में आसानी“ की बात करते हैं, तो उनका मतलब ठीक यही होता है। इस तरह, ये चारों श्रम संहिताएं न केवल ”व्यापार करने में आसानी“ सुनिश्चित करती हैं, बल्कि हमारे देश के मज़दूरों की सुरक्षा और हिफ़ाज़त को भी गंभीर ख़तरे में डालती हैं।
कामगार एकता कमेटी, कार्यस्थल पर, मज़दूरों की सुरक्षा और भलाई के प्रति सरकार के पूरी तरह से संवेदनहीन रवैये की कड़ी निंदा करती है। यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि सभी कार्यस्थलों पर सुरक्षा मानदंडों का सख़्ती से पालन किया जाए। इसे पूंजीपति मालिकों के ’स्व-प्रमाणन’ पर नहीं छोड़ा जा सकता। जो पूंजीपति अपने प्रतिष्ठानों में सुरक्षा मानदंडों का उल्लंघन करते हैं, उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए।
