कामगार एकता कमेटी के संवाददाता की रिपोर्ट
सभी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कर्मचारी, चाहे वे केंद्र सरकार की हों या राज्य सरकारों की, बहुत ज़्यादा रिक्तियों की वजह से बड़ी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। यह समस्या भारतीय रेल, कोयला और दूसरी खदानों, बिजली क्षेत्र, टेलीकॉम, राज्य परिवहन कंपनियों, बैंकों, स्कूलों और कॉलेजों, स्वास्थ्य और साफ़-सफ़ाई सेवाओं के साथ-साथ दवाइयों की परख के लिए जिम्मेदार विभाग और यहां तक कि विनिर्माण कंपनियों के सुरक्षा जांच पक्का करने के लिए जिम्मेदार विभागों में भी है। इतनी ज़्यादा रिक्तियों की वजह से मौजूदा कर्मचारियों पर बहुत ज़्यादा काम का बोझ पड़ रहा है। इसके द्वारा दी जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे कर्मचारियों और संबंधित सार्वजनिक सेवा के उपयोगर्ताओं की सुरक्षा भी ख़तरे में पड़ रही है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इस सच्चाई को छिपाती हैं और सेवा की गुणवत्ता में गिरावट के लिए कर्मचारियों को ही दोषी ठहराती हैं।
चूंकि भारतीय रेल देश के ज़्यादातर लोगों को प्रभावित करती है, इसलिए कामगार एकता कमेटी (केईसी) ने कर्मचारी यूनियनों की मदद से भारतीय रेल के कुछ डिपार्टमेंटों में रिक्तियों की असली संख्या का पता लगाने का फ़ैसला किया। इकट्ठा की गई जानकारी से पता चलता है कि स्थिति बहुत गंभीर है।
क्योंकि इसका असर कर्मचारियों और यात्रियों दोनों पर पड़ता है, इसलिए यह ज़रूरी है कि उन्हें इस ख़तरनाक स्थिति के बारे में बताया जाए। केईसी ने मुंबई और उसके आस-पास के इलाकों में यात्रियों और रेल कर्मियों के बीच इस समस्या के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए एक अभियान शुरू किया है। इसके लिए उन्होंने उनके बीच एक पर्चा बांटा है।
पर्चे को बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला है। कई यात्रियों और बड़ी संख्या में रेल कर्मियों ने इस समस्या को रेलवे कर्मियों और यात्रियों दोनों के ध्यान में लाने के लिए केईसी को धन्यवाद दिया। कई रेल कर्मचारियों ने अपने विभाग के बारे में और जानकारी इकट्ठा करने की पेशकश की है। उन्होंने पार्टी और यूनियन से ऊपर उठकर केईसी की इस अपील का दिल से समर्थन किया कि वे लगातार बढ़ते काम के बोझ के हिसाब से मंजूर पदों की संख्या बढ़ाई जाए और सभी खाली पद तुरंत भरे जाएं।
रेल कर्मचारियों की रिक्तियों का दर्द सभी को है!
एकजुट संघर्ष ही एक रास्ता!!
कामगार एकता कमेटी का आह्वान 10 अप्रैल 2026
भाइयों और बहनों,
भारतीय रेल के किसी भी डिपार्टमेंट में हम काम कर रहे हो, सभी की सबसे बड़ी समस्या है काम का बेहद ज्यादा बोझ, और उस वजह से जबरदस्त मानसिक तनाव। न तो हम ठीक से रेस्ट ले पाते हैं और न ही हमें हर हफ़्ते सुनिश्चित दिन पर ड्यूटी से छुट्टी मिलती है। इस वजह से हमारा पारिवारिक जीवन भी तनावपूर्ण हो जाता है। इस समस्या की एक मुख्य जड़ है बड़े पैमाने पर रिक्त पद। कामगार एकता कमेटी ने आपके कई संगठनों की मदद से कई कैटेगिरी के रिक्तियों के बारे में मालूमात इकट्ठा की है, उसे ध्यान से पढ़िए :
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कैटेगरी |
स्वीकृत पदसंख्या |
मौजूदा नियुक्तियां |
रिक्त पद |
रिक्तियां प्रतिशत में |
आवश्यक पद संख्या |
असली रिक्तियां |
असली रिक्तियां प्रतिशत में |
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ट्रेन कंट्रोलर |
3,136 |
2450 |
686 |
21.9 |
4,763 |
2,313 |
48.6 |
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लोको पायलट |
1.38,896 |
1,12,388 |
26,508 |
19.1 |
1,59,730 |
47,342 |
29.6 |
|
ट्रेन मैनेजर |
53,229 |
38,709 |
14,520 |
27.3 |
61,213 |
22,504 |
36.7 |
|
स्टेशन मैनेजर |
38,640 |
36,500 |
2,104 |
5.5 |
45,720 |
9,220 |
20.2 |
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सिग्नल टेलीकोम |
64,525 |
45,000 |
19,525 |
30.2 |
1,56,525 |
1,11,525 |
71.2 |
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पॉइंट्समेन |
70,158 |
65,000 |
5,158 |
7.3 |
85,000 |
20,000 |
23.5 |
|
ट्रेक मेंटेनर |
4,00,000 |
2,75,000 |
1,25,000 |
31.2 |
4,30,000 |
1,55,000 |
36.0 |
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कुल |
7,68,854 |
5,75,047 |
1,93,537 |
25.2 |
9,42,951 |
3.67,904 |
39.0 |
इसका मतलब इन 7 कैटेगरियों में स्वीकृत पदसंख्या में 25 प्रतिशत से ज्यादा रिक्तियाँ हैं। यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि स्वीकृत पदसंख्या कई वर्षों पहले रेलवे बोर्ड ने निर्धारित की थी। तबसे लेकर आज तक ट्रेनों की संख्या बहुत बढ़ी है, ट्रेन की रफ़्तार बढ़ी है, रेल यात्रियों तथा मालगाड़ी से ढोये माल के मात्रा में बहुत बढ़ोतरी हुई है। यह सब ध्यान में लें और सभी को निर्धारित ड्यूटी से ज्यादा ड्यूटी न देना, सभी को साप्ताहिक अवकाश देना, सभी को रेलवे के ही नियमों के अनुसार रेस्ट देना, आदि बातें ध्यान में लें तो अनुमानित आवश्यक पदसंख्या स्वीकृत पदसंख्या से कहीं ज्यादा है और उसके मुकाबले रिक्तियां और भी ज्यादा, यानि कि 39 प्रतिशत हैं।
इन कैटेगिरियों के अलावा, अन्य में भी बेहद बड़ी मात्रा में रिक्तियां हैं। इसका मतलब है कि रेलवे के सभी मज़दूर इस एक समस्या से बेहद परेशान हैं। जैसे-जैसे हमारे साथी रिटायर होते हैं वैसे-वैसे रिक्तियां बढ़ती ही जाती हैं।
भाइयों और बहनों,
अभी तक का अनुभव यही रहा है कि बहुत चीखने-चिल्लाने एवं कुछ आंदोलन के बाद ही रेल प्रशासन कुछ मामूली कदम उठाता है। यह भी अनुभव है की परमानेंट भर्ती के बजाय ठेका मजदूरों को नियुक्त करने का दौर बढ़ रहा है। उन ठेका मजदूरों का बेहद शोषण तो होता ही है मगर उन्हें ठीक तरह से ट्रेनिंग के बगैर ही काम सौपा जाता है जिसकी वजह हमारे परमानेंट साथियों पर काम का बोझ और भी बढ़ता है। रेल मज़दूरों एवं यात्रियों की सुरक्षा को भी इससे ख़तरा बढ़ता है।
यह भी सच्चाई है कि रेल कर्मचारी किसी न किसी कारण से अलग-अलग यूनियनों के सदस्य हैं। मगर क्या अलग-अलग यूनियन की सदस्यता हमारे बीच विभाजन का कारण होना चाहिए? या, हमारी सभी की समान समस्याओं को सुलझाना, हमारी एकता की वजह होनी चाहिए?
भाइयों और बहनों,
कामगार एकता कमेटी आह्वान करती है कि सभी रेल कर्मचारी, संगठनात्मक अलगाव को परे रखकर, सभी समस्याओं के खि़लाफ़ संघर्ष के लिए फौलादी एकता से आवाज उठाएं। रेल मज़दूरों के सभी संगठन अगर एक आवाज़ में “रिक्तियों पर फौरी तौर पर परमानेंट भर्ती” यह मांग उठाते हैं, तो रेल प्रशासन को झुकना ही पड़ेगा।
