स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था के निजीकरण के बुरे असर

सुश्री सुचरिता द्वारा

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बहुत कम अनुदान मिलना और निजी अस्पतालों तथा निजी स्वास्थ्य बीमा पालिसी का तेज़ी से बढ़ना, बीमार लोगों से ज़्यादा से ज़्यादा निजीमुनाफ़ा कमाने की वजह बन रहा है।

केंद्र सरकार के प्रवक्ता दावा करते हैं कि उनकी कई स्वास्थ्य बीमा योजनाओं ने – जैसे आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई), राष्ट्रीय स्वास्थ्य-सुरक्षा योजना (एनएचपीएस), प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीवाई) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) ने – ग़रीब मेहनतकश लोगों के स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले ख़र्च को काफ़ी कम कर दिया हैं। हालांकि, 2025 में स्वास्थ्य पर परिवारों के ख़र्च को लेकर किए गए सबसे हाल के एक बड़े स्तर के सर्वे से पता चलता है कि सबसे ग़रीब 60 प्रतिशत परिवार, परिवार के किसी सदस्य के अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 25,000 से 35,000 रुपये ख़र्च करते हैं। यह देखते हुए कि ऐसे बहुत से परिवारों की प्रति महीने की कमाई 20,000 रुपये से भी कम है, यह उन पर एक बहुत बड़ा आर्थिक बोझ है।

1978 में, हिन्दोस्तान की सरकार ने अल्मा-अता के अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र को मान्यता दी थी, जिसमें कहा गया है कि देश की आबादी के सभी हिस्सों को व्यापक स्वास्थ्य सेवाएं देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। 1983 में अपनाई गई पहली राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में “सन् 2000 तक सभी के लिए स्वास्थ्य” सेवा देने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि, आज 2026 में, देश में जो स्वास्थ्य व्यवस्था मौजूद है, वह अस्पतालों, क्लीनिकों और बीमा कंपनियों के अधिकतम मुनाफ़ा कमाने की सोच पर चलती है, न कि सभी को सस्ती दरों पर अच्छी गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के मक़सद से।

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की अनदेखी

हिन्दोस्तान की आज़ादी के शुरुआती दशकों में, पूरे देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) बनाए गए थे। इनका मक़सद था, लोगों के लिए एक ऐसी पहली और सबसे नज़दीकी जगह बनाना जहां कोई भी परिवार, किसी योग्य-डॉक्टर से सलाह ले सके। हर चार प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए, एक सामुदायिक-स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) भी बनाने का मक़सद था कि लोगों के लिए, कम से कम 30 बिस्तरों वाली अस्पताल जैसी सुविधा उपलब्ध हो। लोगों को पहले इन केंद्रों पर जाना पड़ता था, और उसके बाद, गंभीर हालातों में, उनको नज़दीकी बड़े अस्पताल में भेजा जाता था। हालांकि, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को भारी उपेक्षा और कम अनुदान का सामना करना पड़ा है।

आज देश में 26,000 से ज़्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) हैं, लेकिन उनमें से एक-चौथाई में कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं है। सामुदायिक-स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स के 65 प्रतिशत से ज़्यादा पद खाली हैं(1)। प्राइमरी हेल्थ केयर के लिए कम फंड और अनदेखी के कारण, देश के ज़्यादातर हिस्सों में, लोग इन सुविधाओं पर भरोसा नहीं करते हैं। ग्रामीण इलाकों में ज़्यादातर लोग डॉक्टर से सलाह लेने के लिए जिले या शहर के अस्पताल में सबसे पास के कस्बे तक जाते हैं। इससे सरकारी अस्पतालों में भीड़ बढ़ गई है।

एक अंतर्राष्ट्रीय टीम की एक हाल की जांच में पाया गया है कि “कम आमदनी वाले परिवारों में, बीमारियां लंबे समय तक बिना पता चले, रह जाती हैं और उनका पता तब चलता है जब समस्याएं गंभीर हो जाती हैं, जिससे स्वास्थ्य-देखभाल का ख़र्च भी बढ़ जाता है और इलाज का नतीजा भी ख़राब होता है।”(2)

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की अनदेखी, उसके मज़दूरों के साथ किए जाने वाले लापरवाह व्यवहार से भी साफ़ पता चलती है। उनमें से ज़्यादातर लोगों पर काम का बोझ बहुत ज़्यादा है और उन्हें कम वेतन मिलता है। लगभग 2 लाख सहायक-नर्स-दाइयों (ऑक्सिलरी नर्स मिडवाइव्स- एएनएम) में से 35 प्रतिशत, जिनकी बच्चों की डिलीवरी कराने सहित कई और भी ज़िम्मेदारियां होती हैं, उन्हें अस्थायी-ठेके पर रखा जाता है और उन्हें क़ानूनी न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन दिया जाता है। 13.5 लाख आंगनवाड़ी मज़दूर, 10.2 लाख आंगनवाड़ी सहायक (हेल्पर) और 10.3 लाख मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा मजदूर), जो गांवों में लोगों के लिए संपर्क करने का पहला ज़रिया होते हैं, उन्हें मज़दूरों के तौर पर मान्यता तक भी नहीं दी जाती है। उन्हें “स्वयंसेवक” (वॉलंटियर) कहा जाता है और उनको मासिक “मानदेय” के तौर पर बहुत ही कम रकम दी जाती है, जो क़ानूनी न्यूनतम वेतन से भी बहुत कम है।

शहरी औद्योगिक मज़दूरों में, केवल नियमित नौकरी वाले और 21,000 रुपये प्रति माह से कम कमाने वाले ही कर्मचारी-राज्य-बीमा (ईएसआई) योजना के दायरे में आते हैं। मालिकों और मज़दूरों से इकट्ठा किया गया पैसा, सेवाओं को बेहतर बनाने पर, पूरी तरह ख़र्च नहीं किया जाता है। उदाहरण के लिए, 2023-24 में, ईएसआई कॉर्पोरेशन के ऑडिट किए गए आंकडों से पता चलता है कि ईएसआई की कुल आमदनी 37,000 करोड़ रुपये थी, जबकि ख़र्च केवल 22,000 करोड़ रुपये का था, जो आय का 60 प्रतिशत से भी कम है। ईएसआई सुविधाओं में भीषण भीड़ के कारण, लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ता है, जिससे बहुत से मज़दूर, निजी डॉक्टरों और क्लीनिकों में जाने को मजबूर होते हैं।

निजी स्वास्थ्य सेवा का अनियंत्रित विस्तार

सार्वजनिक स्वास्थ्य की अनदेखी और कम अनुदान की वजह से पूरे देश में निजी अस्पताल और क्लीनिक बढ़े हैं। ताजा सरकारी सर्वे के अनुसार, सलाह लेने के लिए प्राइवेट डॉक्टर, क्लीनिक या प्राइवेट अस्पताल जाने वाले लोगों का अनुपात ग्रामीण इलाकों में 65 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 71 प्रतिशत है (चित्र-1)(3)। अस्पताल में इनपेशेंट के तौर पर भर्ती होने वालों में, प्राइवेट हॉस्पिटल का हिस्सा ग्रामीण इलाकों में 58 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 65 प्रतिशत है (चित्र-2)(4)।

ज़्यादातर योग्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता, जिनमें 65 प्रतिषत एमबीबीएस डॉक्टर और 51 प्रतिषत नर्सें शामिल हैं, सभी निजी संस्थानों में काम कर रहे हैं(5)।

जब निजी संस्थान, स्वास्थ्य-सेवा देते हैं, तो उसके पीछे मुनाफ़ा कमाने की सोच, सेवा की गुणवत्ता पर बुरा असर डालती है। मरीज को जिसकी ज़रूरत है, वह बताने या लिखने की बजाय, डॉक्टरों पर ऐसे टेस्ट, कार्यवाइयों और दवाइयों की सिफारिश करने का दबाव होता है जिनसे उस निजी संस्थान को अधिकतम मुनाफ़ा हो। उदाहरण के लिए, यह देखा गया है कि प्राइवेट अस्पतालों और क्लीनिकों में सिजेरियन-ऑपरेशन (सी-सेक्शन) से बच्चे के जन्म का अनुपात बहुत ज़्यादा है, जो सरकारी सुविधाओं की तुलना में कहीं अधिक है (चित्र 3)(6)।

निजी अस्पतालों के कामकाज या उनके द्वारा लिए जाने वाले शुल्क को नियंत्रित करने वाली कोई आधिकारिक संस्था तक नहीं है। निजी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टरों पर टेस्ट की संख्या, भर्ती किए जाने वाले मरीजों की संख्या और महंगे इलाज की सलाह देने के लक्ष्य पूरे करने का दबाव होता है। उदाहरण के लिए, सिर की चोट के लिए सी टी स्कैन में लगभग एक मिनट का समय लगता है और इसका खर्च लगभग 1,000 रुपये आता है, जबकि एम आर आई में लगभग 30 मिनट लगते हैं और इसका खर्च 30,000 रुपये तक हो सकता है। हालांकि सिर की चोट वाले ज़्यादातर लोगों के लिए सी टी स्कैन पहला सही टेस्ट है, लेकिन निजी अस्पतालों में डॉक्टर अक्सर इसके बजाय एम आर आई की सलाह देते हैं।

देश में हाल ही में स्वास्थ्य-बीमा के बढ़ने से, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में और अधिक तेज़ी आई है। निजी अस्पताल उन मरीजों को ज़्यादा महंगा इलाज देते हैं जिनके पास बीमा-पोलिसी होती है।

स्वास्थ्य बीमा

2018 और 2025 के बीच, कम से कम एक सरकारी स्वास्थ्य बीमा स्कीम के तहत आने वाले लोगों का अनुपात, ग्रामीण इलाकों में 13 प्रतिशत से बढ़कर 45 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 9 प्रतिशत से बढ़कर 32 प्रतिशत हो गया है(7)। इसी दौरान, निजी स्वास्थ्य बीमा पालिसी के तहत आने वाले लोगों का अनुपात, ग्रामीण इलाकों में 1 प्रतिशत से बढ़कर 2 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 10 प्रतिशत से बढ़कर 14 प्रतिशत हो गया है। हालांकि बीमा-कवरेज बढ़ा है, लेकिन इससे आबादी के सभी वर्गों के लिए सस्ती स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित नहीं हो पाई है।

आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई), जो 36 करोड़ से ज़्यादा पंजीकृत लाभार्थियों वाली सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है, हर परिवार को हर साल 5 लाख रुपये तक के अस्पताल में भर्ती होने का ख़र्च कवर करती है। हालांकि, इसमें आउटपेशेंट डिपार्टमेंट (ओपीडी) में डॉक्टरों द्वारा ली जाने वाली कंसल्टेशन फीस या दवाओं का ख़र्च शामिल नहीं है।

नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक, लगभग 40 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्हें इस योजना की पात्रता के लिए “ज़्यादा अमीर” माना जाता है, लेकिन वे इस स्तर की अच्छी निजी स्वास्थ्य बीमा पालिसी खरीदने के लिए “ज्यादा ग़रीब” हैं। नतीजतन, उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत ज़्यादा पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं, जो वे जुटा नहीं सकते।

निजी बीमा कंपनियां ज़्यादा सालाना प्रीमियम लेती हैं, जो देश के ज़्यादातर परिवारों के सामर्थ्य से बाहर है। ऐसी पॉलिसी में निवेश करने वालों को पॉलिसी के तहत मिलने वाले फ़ायदों का दावा करते समय, कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। मुनाफ़े कमाने पर आधारित कंपनियां, दावों को खारिज़ करने और भुगतान की जाने वाली राशि को कम करने के लिए तरह-तरह के तरीके़ अपनाती हैं।

साल 2023-24 में स्वास्थ्य बीमा से जुड़ी निजी कंपनियों का टैक्स के बाद का मुनाफ़ा 100 प्रतिशत बढ़कर, 917 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल यह 457 करोड़ रुपये था। बड़े अस्पताल श्रंखलाओं से जुड़े अस्पतालों के आंकड़े दिखाते हैं कि 2024-25 में अपोलो हॉस्पिटल्स का मुनाफा 1,426 करोड़ रुपये, नारायण हृदयालय का 790 करोड़ रुपये और मैक्स हेल्थकेयर का 757 करोड़ रुपये था।

निष्कर्ष

स्वास्थ्य सेवा का अधिकार एक बुनियादी मानवाधिकार है। राज्य की यह ज़िम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि समाज के सभी लोगों को अच्छी गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। हिन्दोस्तानी-राज्य, स्वास्थ्य सेवाओं और स्वास्थ्य बीमा के बढ़ते निजीकरण को बढ़ावा देकर इस ज़िम्मेदारी से पीछे हट रहा है।

हम, लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को तुरंत रोकने की मांग करनी चाहिए और इसके लिए संघर्ष करना चाहिए। हमें इस उसूल के लिए मांग और संघर्ष करना चाहिए कि हिन्दोस्तानी राज्य, सार्वजनिक धन से अच्छी गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं और स्वास्थ्य बीमा मुफ़्त या किफ़ायती दरों पर लोगों को उपलब्ध कराना सुनिश्चित करे।

(1) टी. के. राजलक्ष्मी, “पे टू हील (इलाज के लिए भुगतान), फ्रंटलाइन, 30 अप्रैल, 2026

(2) हिन्दोस्तान के लिए नागरिककेंद्रित स्वास्थ्य प्रणाली पर लैंसेट आयोग की रिपोर्ट, जनवरी 2026

(3) एनएसएस का 80वां राउंड, जनवरी और दिसंबर 2025 के बीच आयोजित

(4) एनएसएस का 80वां राउंड, जनवरी और दिसंबर 2025 के बीच आयोजित

(5) हिन्दोस्तान के लिए नागरिक-केंद्रित स्वास्थ्य प्रणाली पर लैंसेट आयोग की रिपोर्ट, जनवरी 2026

(6) राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2019-21 (एनएफएचएस5), भारत फैक्ट शीट

(7) एनएसएस का 80वां राउंड

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