विशाखापत्तनम में गूगल राइडेन अडानी डेटा सेंटर्स से बड़े पैमाने पर पर्यावरण को नुकसान और मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हो रहा है।

श्री ई.ए.एस. सरमा, भारत सरकार के पूर्व सचिव द्वारा

(countercurrents.org से पुनःप्रकाशित)

(अंग्रेजी लेख का अनुवाद)

गूगल-राइडेन-अडानी समूह विशाखापत्तनम (वाईज़ैग) और उसके आसपास लगभग 2.5–3.0 गीगावाट की कुल क्षमता वाले तीन उच्चस्तरीय डेटा सेंटर (प्रत्येक लगभग 1 गीगावाट) स्थापित कर रहा है, जिससे व्यापक पर्यावरणीय क्षति और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन हो रहे हैं।

जल-संकटग्रस्त क्षेत्र में स्थित होने के कारण, ये स्थानीय समुदाय के लिए पहले से ही गंभीर जल-संकट को और बढ़ा देंगे।

वाईज़ैग ही क्यों ?

1 गीगावाट क्षमता उच्च-स्तर वाले डेटा सेंटर में रोज़ाना 2 करोड़ किलोवाट-घंटे से ज़्यादा बिजली और 3 करोड़ लीटर पानी की खपत होती है। ये ‘हीट आइलैंड’ की तरह होते हैं जो अपने आस-पास के तापमान पर असर डालते हैं। इनसे ध्वनि प्रदूषण भी होता है (https://unu.edu/inweh/news/environmental-cost-of-AIs-Enrgy-use-carbon-water-and-land-footprints)। जहाँ भी इन्हें बनाने का प्रस्ताव होता है, खासकर अमेरिका में, वहाँ के स्थानीय लोग इनका ज़ोरदार विरोध करते हैं।

अमेरिका में ऐसे स्थानीय विरोध का सामना करते हुए, गूगल ने अपने परिचालन के लिए भारत को चुना है, क्योंकि भारत में स्थानीय डेटा संप्रभुता से जुड़े कानून और नियम कमजोर हैं, पर्यावरणीय विनियमन नाज़ुक है और भाई-भतीजावादी पूंजीवाद व्यापक रूप से फैला हुआ है।

जहाँ अमेरिका में स्थानीय प्राधिकरण डेटा सेंटरों द्वारा बिजली और पानी की अत्यधिक माँग को देखते हुए उन पर अतिरिक्त शुल्क लगा रहे हैं, वहीं भारत में राजनेता उन्हें भारी सब्सिडी वाली दरों पर बिजली और पानी उपलब्ध कराने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। वे उन डेटा सेंटरों द्वारा किए जा रहे पर्यावरणीय विनाश को नज़रअंदाज़ करने के लिए नियमों को दरकिनार करने तक के लिए तैयार हैं।

डेटा केंद्रों के लिए रियायतेंलोगों को बहुत कम लाभ:

गूगल हर वर्ष मुनाफ़े के रूप में खरबों डॉलर कमाता है। फिर भी, आंध्र प्रदेश सरकार और केंद्र, दोनों ही दुखद रूप से उसके संचालन को सब्सिडी दे रहे हैं।

आंध्र प्रदेश ने कर रियायतें, पूंजीगत सब्सिडी, रियायती बिजली और पानी की दरें तथा रियायती कीमतों पर भूमि देने की घोषणा की है, जिन रियायतों का कुल मूल्य 1 गीगावाट (GW) डेटा सेंटर के लिए 25,000 करोड़ रुपये से अधिक है। केंद्र ने भी गूगल और अन्य “विदेशी” डेटा सेंटरों के लिए 2047 तक कर अवकाश (टैक्स हॉलिडे) की घोषणा की है, जिससे अनुमानतः 1 गीगावाट डेटा सेंटर के लिए सरकारी ख़ज़ाने पर लगभग 95,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।

विशाखापत्तनम (विजाग) और उसके आसपास स्थित गूगल के तीन डेटा सेंटरों के लिए कुल सब्सिडी इस प्रकार 3,00,000–3,60,000 करोड़ रुपये तक पहुँचती है! इसका बोझ करदाताओं पर पड़ता है। जहाँ निजी भूमि को सीमांत किसानों से मामूली मुआवज़े पर जबरन अधिग्रहित किया जाता है, वहाँ वास्तव में वही भूमिहीन बने लोग इन डेटा सेंटरों को सब्सिडी दे रहे होते हैं।

इतनी सारी रियायतों के बदले स्थानीय लोगों को डेटा सेंटरों से क्या लाभ मिलता है?

राज्य के राजनीतिक नेता जानबूझकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं और यह दावा कर रहे हैं कि गूगल के डेटा सेंटर “लाखों” नौकरियाँ देंगे, जबकि 1 गीगावाट का एक डेटा सेंटर शायद 1000 से भी कम नौकरियाँ प्रदान करे। उनमें से भी स्थानीय युवाओं को कम वेतन वाले साधारण कामों के अलावा शायद ही कुछ मिले।

आंध्र प्रदेश ने आँध्रप्रदेश एम्प्लॉयमेंट ऑफ़ लोकल कैंडिडेट्स इनइंडस्ट्रीज़ /फैक्ट्रीज एक्ट , 2019 नामक कानून बनाया है, जिसके अनुसार राज्य के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में स्थानीय लोगों के लिए 75% तक नौकरियाँ आरक्षित की जानी चाहिए तथा उन्हें रोजगार के योग्य बनाने के लिए प्रशिक्षण सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। लेकिन जिस राज्य में भाई-भतीजावादी पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज़्म) हावी है, वहाँ के राजनेता, जो गूगल को खुश करने में अधिक रुचि रखते हैं, इस कानून को लागू करने में अनिच्छुक हैं। उन्होंने गूगल से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की संख्या और गुणवत्ता के बारे में कोई लिखित प्रतिबद्धता भी प्राप्त नहीं की है।

विजाग और उसके आसपास स्थित लगभग 2.5–3.0 गीगावाट की कुल क्षमता वाले गूगल डेटा सेंटर परिसर को चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध कराने के लिए समान क्षमता का बिजली उत्पादन और उसे पहुँचाने के लिए समर्पित पारेषण प्रणाली की आवश्यकता होगी, जिसकी कुल लागत 40,000 करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। चूँकि आंध्र प्रदेश सरकार डेटा सेंटरों के लिए बिजली पर भारी सब्सिडी दे रही है, इसलिए अतिरिक्त उत्पादन और पारेषण सुविधाओं की स्थापना की लागत अंततः राज्य के अन्य बिजली उपभोक्ताओं और करदाताओं से वसूली जाएगी।

विडंबना यह है कि आंध्र प्रदेश में सबसे निम्न आय वर्ग का एक घरेलू उपभोक्ता 1.90 रुपये प्रति किलोवाट-घंटा (kWh) भुगतान करता है, जबकि गूगल के तीनों डेटा सेंटर केवल 1 रुपये प्रति kWh देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आंध्र प्रदेश के राजनीतिक नेताओं की प्राथमिकताएँ कितनी विकृत हैं!

मानवाधिकारों का उल्लंघन:

गूगल ने गर्व से अपना दृष्टिकोण घोषित किया है: हम यथासंभव अधिक से अधिक लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण सुधार लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं (https://about.google/company-info/commitments/)। लेकिन जहाँ तक विजाग के लोगों का प्रश्न है, इसका उनसे कोई संबंध दिखाई नहीं देता।

वाईज़ैग के निकट तारुलावाडा गाँव में गूगल के डेटा सेंटर परिसर के लिए 267 एकड़ भूमि आवंटित की गई है, जिसमें से 111 एकड़ भूमि पहले भूमिहीन परिवारों, मुख्यतः दलितों, को आवंटित की गई थी। सत्तर के दशक में तत्कालीन सरकार ने इन भूमियों को भूमिहीन परिवारों को आजीविका का स्थायी स्रोत प्रदान कर उन्हें सशक्त बनाने के उद्देश्य से दिया था।

राज्य के वर्तमान नेताओं ने उन भूमि-पट्टाधारकों से उनकी भूमि जबरन छीन ली और बदले में उन्हें इतना कम नकद मुआवज़ा दिया जो उस भूमि के बाज़ार मूल्य के आसपास भी नहीं पहुँचता। जिस भूमि से उनका जीवनयापन चलता था उसे छीनकर मामूली नकद मुआवज़ा देना, उनके एकमात्र आजीविका-स्रोत और संपत्ति से उन्हें वंचित करना तथा उन्हें असशक्त बनाना है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित उनके “जीवन के अधिकार” का गंभीर उल्लंघन है।

एक अन्य स्थान, आदिविवरम में, जो वाईज़ैग के मध्य स्थित है, सिम्हाचलम पहाड़ी की ढलान पर स्थित 160 एकड़ हरे-भरे वन क्षेत्र को गूगल समूह को आवंटित किया गया है। वहाँ निर्माण कार्य पहाड़ी से नीचे स्थित मुदासरलोवा जलाशय की ओर आने वाले जल प्रवाह को बाधित करता है, जो वाईज़ैग के लोगों को पेयजल उपलब्ध कराता है। गूगल समूह ने पहले ही पेड़ों की कटाई शुरू कर दी है, जो अन्यथा जलाशय में गाद जमने से रोकते। जब डेटा सेंटर चालू होगा, तो उससे निकलने वाले प्रदूषक जलाशय को दूषित करेंगे। इसके अलावा, स्वयं डेटा सेंटर को भी जलाशय से भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होगी, जिससे आने वाले वर्षों में लोगों के लिए गंभीर जल संकट पैदा होगा। राज्य के शासक गूगल को खुश करने की इतनी जल्दी में हैं कि उन्हें लोगों के कल्याण की चिंता ही नहीं है।

भारत में उच्चस्तरीय डेटा सेंटर सैकड़ों एकड़ भूमि पर कब्ज़ा करते हैं, जो अक्सर छोटे और सीमांत किसानों, मुख्यतः दलितों, द्वारा खेती की जाती है। भारत में प्रति व्यक्ति औसत कृषि योग्य भूमि उपलब्धता मुश्किल से 0.5 एकड़ है। ऐसे में लगभग 300 एकड़ भूमि घेरने वाला 1 GW क्षमता का हाइपरस्केल डेटा सेंटर लगभग 600 सीमांत किसानों को विस्थापित कर देता है और उनकी एकमात्र आजीविका छीन लेता है।

पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन:

तारुलावाडा में गूगल को आवंटित लगभग 90% भूमि तथा आदिविवरम में 100% भूमि (नीचे चित्र देखें) देश के संबंधित वन कानूनों के अंतर्गत अधिसूचित वन भूमि के भीतर आती है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रसिद्ध *गोडावर्मन* मामले में अपने ऐतिहासिक निर्णय में वन भूमि को गैर-वन प्रयोजनों के लिए परिवर्तित करने पर रोक लगाई थी। यदि असाधारण परिस्थितियों में वन भूमि का उपयोग आवश्यक हो भी, तो न्यायालय ने उसके दोगुने क्षेत्रफल की वैकल्पिक भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण का आदेश दिया था। न तो तारुलावाडा और न ही आदिविवरम के मामले में राज्य ने वन कानूनों का पालन किया है और न ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का सम्मान किया है।

(https://www.sakshi.com/telugu-news/andhra-pradesh/ uncontrolled-excavations-simhachalam-hill-name-data-center-2787134)

इसके अतिरिक्त, आदिविवरम संघीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा कंबालकोंडा वन्यजीव अभयारण्य के आसपास अधिसूचित इको-सेंसिटिव ज़ोन के भीतर स्थित है, जहाँ निर्माण गतिविधियाँ प्रतिबंधित हैं। राज्य के राजनीतिक नेतृत्व ने इस वैधानिक अधिसूचना का भी पालन नहीं किया।

गूगल और विशेष रूप से उसके साझेदार अडानी समूह को खुश करने की जल्दबाज़ी में राज्य के नेताओं ने राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण पर नियमों को मोड़ने, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करने, डेटा सेंटरों को केवल “भवन” के रूप में गलत वर्गीकृत करने, पानी के उपयोग से संबंधित कम करके बताए गए विवरणों को नज़रअंदाज़ करने तथा अनिवार्य जन-सुनवाई कराए बिना अभूतपूर्व गति से तीनों डेटा सेंटरों को पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ देने के लिए दबाव डाला। यदि राज्य संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत पर्यावरण की रक्षा करने के अपने दायित्व के प्रति संवेदनशील होता और वैधानिक आवश्यकताओं का कड़ाई से पालन करता, तो वह परियोजना पर खुली सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करता और तीनों डेटा सेंटरों को सम्मिलित करते हुए एक ही प्रस्ताव को व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के लिए संघीय पर्यावरण मंत्रालय को भेजता। वाईज़ैग में गूगल के प्रति राज्य के नेताओं का व्यवहार इस बात का प्रमाण है कि वे कानून के प्रति कितने असंवेदनशील हैं और भारत के संविधान के मूल में निहित लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का कितना अनादर करते हैं।

यदि आंध्र प्रदेश के नेता यह स्वीकार करते कि ये डेटा सेंटर भारी मात्रा में पानी की खपत करेंगे और वाईज़ैग तथा उसके आसपास गंभीर जल संकट उत्पन्न करेंगे, तो वे गूगल से यह आग्रह करते कि वह अपनी जल आवश्यकताओं की पूर्ति शहर की जलापूर्ति प्रणाली के बजाय विलवणीकरण (डिसैलिनेशन) संयंत्रों से करे। लेकिन तीनों डेटा सेंटर स्थलों को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृतियों में किसी भी विलवणीकरण संयंत्र का उल्लेख नहीं है।

कॉरपोरेट प्रभाव में आने वाले लोकतंत्र अक्सर “कॉरपोरेटोक्रेसी” बन जाते हैं, जो लोगों की तुलना में निजी कॉरपोरेट कुलीनतंत्रों के लिए अधिक काम करते हैं।

कार्बन पदचिह्न:

गूगल के तीनों डेटा सेंटरों को चौबीसों घंटे कम से कम 2.5–3.0 गीगावाट बिजली की आवश्यकता होगी। यह लगभग 3 GW क्षमता वाले एक बड़े बिजली उत्पादन परिसर के बराबर है, जो पूरी तरह इन्हीं के लिए समर्पित होगा। उत्पादन क्षमता की दृष्टि से यह एनटीपीसी के सिम्हाद्री बिजलीघर और उसके समीप स्थित हिंदुजा बिजली संयंत्र, जो दोनों कोयले से बिजली उत्पन्न करते हैं, से भी बड़ा है। चूँकि भारत में 75–79% बिजली उत्पादन कोयला आधारित है, इसलिए इसका अर्थ है कि इनसे प्रतिवर्ष 20 अरब टन से अधिक का संचयी कार्बन पदचिह्न उत्पन्न होगा।

डेटा संप्रभुता संबंधी चिंताएँ

भारत विश्व के लगभग 20% डिजिटल डेटा का उत्पादन करता है, जहाँ प्रति उपयोगकर्ता मासिक मोबाइल डेटा खपत 24 GB से अधिक है। फिर भी देश वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता का केवल लगभग 3% ही अपने यहाँ रखता है, जिसका अर्थ है कि अधिकांश डेटा विदेशी सर्वरों पर संग्रहित और संसाधित होता है। इससे उसकी सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। इस समय देश को सबसे अधिक आवश्यकता है कि वह डेटा प्रोसेसिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में स्वदेशी विशेषज्ञता को संगठित कर शीघ्र आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़े।

केंद्र सरकार ने 2020 में “डेटा सेंटर नीति” प्रकाशित की थी, लेकिन उसे लागू नहीं किया। आज की स्थिति में, डेटा सेंटरों के संबंध में न तो केंद्र और न ही राज्यों के पास कोई सुविचारित नीति है।

गूगल जैसी आईटी कंपनियाँ, जो दुनिया भर में डेटा सेंटर स्थापित कर रही हैं, अधिकांशतः अमेरिका आधारित हैं। 2018 में अमेरिकी कांग्रेस ने क्लैरिफयिंग लॉफुल ओवरसीज यूज़ ऑफ़ डाटा (क्लाउड) एक्ट पारित किया, जिसके अनुसार सभी अमेरिकी कंपनियों को अपने डेटा सेंटरों में संग्रहित डेटा तक अमेरिकी सरकार को पहुँच प्रदान करनी होगी, चाहे वे डेटा सेंटर अमेरिका में हों या विदेशों में। इससे भारत में अमेरिकी कंपनियों द्वारा संचालित डेटा सेंटरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।

क्लाउड अधिनियम के प्रभावों को समझते हुए कई यूरोपीय देश अपने डेटा संप्रभुता कानूनों और शिष्टाचार को मजबूत कर रहे हैं तथा राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए स्वदेशी क्षमताएँ विकसित कर रहे हैं।

ऐसी स्थिति में यह समझ से परे है कि केंद्र और राज्य अमेरिकी आईटी कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए आमंत्रित करने में जल्दबाज़ी करें और “विदेशी डेटा सेंटरों” के लिए कर अवकाश की घोषणा भी करें।

वैश्विक डेटा सेंटर उछाल या बुलबुला?

कुछ अनुमानों के अनुसार, अगले दस वर्षों में वैश्विक डेटा सेंटरों की कुल क्षमता 200 गीगावाट तक पहुँच जाएगी, जिसमें से 50% अमेरिका में, 30% एशिया-प्रशांत क्षेत्र में और शेष भारत सहित अन्य क्षेत्रों में स्थापित होगी। अकेले भारत में जल्द ही 17 गीगावाट डेटा सेंटर क्षमता हो सकती है।

इन डेटा सेंटरों की स्थापना में खरबों डॉलर का निवेश किया जा रहा है, जबकि इस बात की कोई निश्चितता नहीं है कि इन निवेशों से अपेक्षित प्रतिफल मिलेगा। इस स्थिति को “अतार्किक उत्साह” (इर्रेशनल एकजुबरेन्स) कहा जा सकता है, जो संकेत देता है कि यह एक ऐसा बुलबुला हो सकता है जो जल्द ही फूट जाएगा।

इसके अलावा, वर्तमान अत्यधिक केंद्रीकृत 1 गीगावाट या उससे अधिक क्षमता वाले “उच्चस्तरीय” डेटा सेंटर मॉडल की स्थिरता को लेकर भी गंभीर चिंताएँ हैं, क्योंकि वे भूमि, बिजली और पानी पर अत्यधिक दबाव डालते हैं। वर्तमान शोध बिजली और पानी की खपत को कम करने के लिए एज कंप्यूटिंग, माइक्रो-मॉड्यूलर डेटा प्रोसेसिंग, उन्नत शीतलन तकनीकों आदि पर आधारित विकेंद्रीकृत संकर (हाइब्रिड) मॉडलों के विकास पर केंद्रित है। संभव है कि बिजली और पानी की खपत में 70% या उससे अधिक की कमी लाने वाले ऐसे मॉडल जल्द ही वर्तमान उच्चस्तरीय नमूना का स्थान ले लें। जब ऐसा होगा, जो शायद बहुत जल्द हो, तब वर्तमान उच्चस्तरीय डेटा सेंटर संग्रहालय की वस्तुएँ बनकर रह जाएँगे।

अमेरिका में, जैसा कि पहले बताया गया, स्थानीय समुदाय अपने क्षेत्रों में उच्चस्तरीय डेटा सेंटरों की स्थापना का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि वे न केवल सीमित जल संसाधनों पर दबाव डालते हैं बल्कि तापीय और ध्वनि प्रदूषण भी उत्पन्न करते हैं। कम-से-कम एक राज्य, मेन, ने 20 मेगावाट या उससे अधिक क्षमता वाले डेटा सेंटरों पर अस्थायी रोक लगा दी है और 13 अन्य राज्य भी इसी प्रकार के कदमों पर विचार कर रहे हैं। न्यूयॉर्क विधानमंडल ने रेस्पोंसिबल डाटा सेण्टर डेवलपमेंट एक्ट पारित किया है, जिसमें 20 मेगावाट से अधिक क्षमता वाले नए बड़े डेटा सेंटरों के परमिट पर एक वर्ष की रोक का प्रस्ताव है।

क्या भारत डेटा प्रोसेसिंग और AI में बढ़ते अमेरिकी प्रभुत्व का शिकार बन रहा है?

केंद्र और राज्यों द्वारा विदेशी आईटी कंपनियों, जिनमें अधिकांश अमेरिकी हैं, को दिए जा रहे कर प्रोत्साहन और अन्य रियायतें इस संभावना की ओर संकेत करती हैं कि भारत तेजी से डेटा प्रोसेसिंग और AI के क्षेत्र में बढ़ते अमेरिकी प्रभुत्व का शिकार बन सकता है।

भले ही देर हो चुकी हो, भारत को अपनी भूमि पर अमेरिकी आईटी कंपनियों द्वारा डेटा सेंटर स्थापित करने का विरोध करना चाहिए। इसके बजाय उसे डेटा भंडारण, प्रोसेसिंग और AI के अनुप्रयोगों में चल रहे स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास प्रयासों को संगठित करना चाहिए और युद्धस्तर पर आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी चाहिए। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले वर्षों में डेटा प्रणालियों का परिसंपत्ति के रूप में मूल्य बढ़ेगा और AI आर्थिक गतिविधियों के हर क्षेत्र पर प्रभुत्व स्थापित करेगा। विशेष रूप से रक्षा क्षेत्र में AI की भूमिका निर्णायक होने वाली है।

अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे चीन ने AI और डेटा प्रोसेसिंग के क्षेत्र में अपने सार्वजनिक क्षेत्र को मुख्य वास्तुकार, वित्तपोषक और नियामक बनाने की रणनीति अपनाई है। चीन में डेटा भंडारण, प्रोसेसिंग और AI का वित्तपोषण मुख्यतः राज्य करता है।

इस पृष्ठभूमि में, दीर्घकाल में भारत के लिए यह विवेकपूर्ण होगा कि वह सार्वजनिक क्षेत्र में डेटा प्रोसेसिंग और AI की क्षमताओं का विकास करे और इस क्षेत्र में भारतीय स्टार्ट-अप्स के साथ घनिष्ठ सहयोग करे। हमें राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के अनुरूप एक सशक्त डेटा प्रोसेसिंग और AI नियामक ढाँचा विकसित करना होगा। चूँकि आने वाले वर्षों में राष्ट्र निर्माण में AI की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी, इसलिए भारत विदेशी प्रभुत्व के जाल में फँसकर AI के क्षेत्र में अपनी आत्मनिर्भरता से समझौता करने का जोखिम नहीं उठा सकता।

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