भारत सरकार के पूर्व सचिव श्री ई. ए. एस. सर्मा का केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र

सेवा में,
श्रीमती निर्मला सीतारमण
केंद्रीय वित्त मंत्री
प्रिय श्रीमती सीतारमण,
4 अगस्त 2026 के अपने पत्र में, मैंने IDBI में सरकार और LIC की इक्विटी हिस्सेदारी के विनिवेश को लेकर कई चिंताएं जताई थीं, जो कि बेहद अपारदर्शी और गैर-प्रतिस्पर्धी माहौल में किया गया था।
मेरे द्वारा जताई गई चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने IDBI के विनिवेश के लिए ”एम/एस 10955230 कनाडा इंक.’ (जिसकी मूल कंपनी ‘एम/एस फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स लिमिटेड’ है) को रणनीतिक खरीदार के रूप में चुन लिया है। सरकार की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, IDBI बैंक लिमिटेड में 60.72% हिस्सेदारी के अधिग्रहण के लिए खरीद मूल्य ₹52,878 करोड़ तय किया गया है। इसमें सरकार की 30.48% इक्विटी हिस्सेदारी और LIC की 30.24% हिस्सेदारी शामिल है।.
1. IDBI में 60.72% की सार्वजनिक इक्विटी हिस्सेदारी बहुत ही कम कीमत पर बेची गई
ऊपर दिए गए प्रेस नोट में, विनिवेश की अंतिम राशि तय करने के आधार को बहुत ही उलझे हुए तरीके से समझाया गया है:
इस तरह के लेन-देन में, बोली लगाने के लिए पहले से कोई तय मानक नहीं होता है। बोली लगाने वाले खुद ही मूल्यांकन करते हैं और गोपनीय तरीके से सीलबंद लिफाफों में अपनी बोलियां जमा करते हैं। साथ ही, कंपनी का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए स्वतंत्र एजेंसियों को काम पर रखा जाता है; इस मूल्यांकन का उपयोग एक तुलनात्मक आधार के रूप में किया जाता है, ताकि यह जांचा जा सके कि जमा की गई बोलियां उचित हैं या नहीं।
जैसा कि मैंने 4 अगस्त, 2026 के अपने पत्र में बताया था, हैदराबाद और अन्य शहरों में IDBI की शहरी संपत्तियां बहुत मूल्यवान हैं।
उदाहरण के लिए, हैदराबाद के एक काफी विकसित इलाके में IDBI के पास 50 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन है। तेलंगाना राज्य सरकार द्वारा हाल ही में की गई एक नीलामी से पता चला कि यहाँ ज़मीन की बाज़ार कीमत ₹269 करोड़ प्रति एकड़ है। इस हिसाब से, सिर्फ हैदराबाद में IDBI की ज़मीन की कीमत ₹13,450 करोड़ होनी चाहिए। अगर IDBI की अन्य शहरी संपत्तियों का भी इसी तरह मूल्यांकन किया जाए, तो उसकी ज़मीन-जायदाद की कुल कीमत बहुत ज़्यादा होगी—जो कि ₹52,878 करोड़ की मंज़ूर की गई बोली की रकम से कहीं अधिक होगी।
जहाँ तक LIC की बात है, तो इसकी इक्विटी होल्डिंग इसके लाखों पॉलिसीधारकों के पैसों से बनी है। उनके प्रति निष्पक्षता बरतते हुए, सरकार और LIC को 60.72% इक्विटी हिस्सेदारी इतनी कम कीमत पर बेचने से पहले कहीं अधिक समझदारी दिखानी चाहिए थी। इस सौदे के कारण सरकार और LIC दोनों ही अब केवल ‘अल्पसंख्यक शेयरधारक ‘ बनकर रह गए हैं, और IDBI की भविष्य की नीतिगत बातों में अब उनकी कोई राय नहीं चलेगी।
मंजूर की गई बोली की कीमत की जांच IDBI की लाभप्रदता के संदर्भ में भी की जानी चाहिए। भारतीय रिज़र्व बैंक के ‘प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन’ (PCA) फ्रेमवर्क से बाहर आने के बाद के पहले वर्ष, यानी 2021-22 से लेकर अगले पांच वर्षों में, IDBI ने कुल 48,151 करोड़ रुपये का परिचालन लाभ (ऑपरेटिंग प्रॉफिट) अर्जित किया है।
IDBI के विनिवेश के लिए ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EoI) आमंत्रित करने वाला ‘प्रिलिमिनरी इंफॉर्मेशन मेमोरेंडम’ (PIM) 7 अक्टूबर, 2022 को जारी किया गया था। दूसरे शब्दों में कहें तो, जहाँ एक तरफ DIPAM पाँच सालों तक विनिवेश प्रक्रिया को टालता रहा, वहीं दूसरी तरफ IDBI ने इतना मुनाफा कमा लिया जो विनिवेश से मिलने वाली रकम के 90% से भी अधिक था।
अगर सरकार ने एक साल और इंतज़ार किया होता, तो IDBI को विनिवेश से मिलने वाली रकम के मुकाबले कहीं ज़्यादा मुनाफ़ा हो सकता था। इससे पता चलता है कि IDBI का वास्तविक मूल्य, विनिवेश से मिलने वाली रकम से कहीं ज़्यादा है। वित्त मंत्रालय और DIPAM को संसद में इस बारे में काफ़ी स्पष्टीकरण देना होगा।
2. कानूनी आपत्तियां: क्या CCEA को पूरी जानकारी दी गई थी?
अपने पिछले पत्र में, मैंने निम्नलिखित कानूनी आपत्तियां उठाई थीं:
- सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित भूमि: IDBI के पास देश भर में कई बेहद कीमती ज़मीनें हैं। इनमें से कई ज़मीनें 1894 के ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम’ के तहत इस आधार पर अधिग्रहित की गई थीं कि यह अधिग्रहण एक “सार्वजनिक उद्देश्य” के लिए है। अधिनियम की धारा 3(f)(iv) के अनुसार, “सार्वजनिक उद्देश्य” का मतलब ऐसी कंपनी से है, जो पूरी तरह से सरकार के स्वामित्व में हो या सरकार के नियंत्रण में हो। दूसरे शब्दों में, अगर IDBI किसी निजी कंपनी के हाथों में चली जाती है, तो ये ज़मीनें वापस सरकार के पास आ जानी चाहिए; वरना, ऐसा हस्तांतरण उस कानूनी प्रावधान का सीधा उल्लंघन माना जाएगा। बोली से जुड़े दस्तावेज़ों में इस मुद्दे का कोई ज़िक्र नहीं है।
- कर्मचारियों की सेवा शर्तों का संरक्षण: औद्योगिक विकास बैंक (उपक्रम का हस्तांतरण और निरसन) अधिनियम, 2003 की धारा 5(1) परोक्ष रूप से यह आश्वासन देती है कि IDBI के कर्मचारियों की सेवा शर्तों में किसी भी परिस्थिति में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। DIPAM द्वारा बताई गई IDBI के विनिवेश की शर्तें, इस प्रावधान का उल्लंघन करती हैं।
ऐसा लगता है कि बिक्री पूरी करने की जल्दबाजी में, DIPAM ने शायद CCEA को इन कानूनी नतीजों के बारे में नहीं बताया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या 14 अक्टूबर, 2026 को CCEA का फैसला पूरी जानकारी के आधार पर लिया गया था।
3. समाज के वंचित वर्गों के प्रति अन्याय
इस विनिवेश के परिणामस्वरूप, सरकार ने समाज के वंचित वर्गों के प्रति भी काफी अन्याय किया है। विनिवेश से पहले, IDBI की 90% से अधिक इक्विटी केंद्र सरकार और LIC के पास थी। एक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई होने के नाते, IDBI पर संविधान द्वारा अनिवार्य SC/ST/OBC आरक्षण और ‘राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों’ में निहित कल्याणकारी सिद्धांत लागू होते थे।
अपनी 60.72% इक्विटी के निजीकरण के साथ, सरकार IDBI में आरक्षण के इन लाभों को प्रभावी रूप से समाप्त कर देगी, जिससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग वर्गों के लिए रोजगार के अवसर बंद हो जाएंगे। साथ ही, इससे वंचित वर्गों के लगभग 9,500 मौजूदा कर्मचारियों के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता पैदा हो जाएगी।
आरक्षण वंचित समुदायों को सशक्त बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार इस बात को नजरअंदाज कर रही है और निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ रही है।
इस संदर्भ में, IDBI के अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग कर्मचारियों ने सही मांग की है कि सरकार उनके अधिकारों की रक्षा करे। ‘द हिंदू बिजनेसलाइन’ ने उनकी इस मांग के बारे में रिपोर्ट दी है। सरकार ने उनकी मांग को नजरअंदाज कर दिया है और उनके हितों को दरकिनार कर दिया है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि IDBI ने महिलाओं को सशक्त बनाने और दिव्यांग व्यक्तियों को आरक्षण देने की सरकारी नीतियों का समर्थन किया है। IDBI के कार्यबल में 6,911 महिला कर्मचारी और 884 दिव्यांग कर्मचारी शामिल हैं। निजीकरण से इन संस्थागत प्रतिबद्धताओं पर खतरा पैदा होता है, साथ ही मौजूदा कर्मचारियों के लिए अनिश्चितता भी उत्पन्न होती है।
4. सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में भागीदार के रूप में IDBI की भूमिका का अंत
CCEA का कनाडाई कंपनी को बहुतांश इक्विटी सौंपने का फैसला न केवल IDBI की एक ‘ विकास वित्त संस्थान ‘ के रूप में भूमिका का एक अध्याय समाप्त करता है, बल्कि कई महत्वपूर्ण कल्याणकारी कार्यक्रमों में एक साझेदार के रूप में उसकी भूमिका पर भी संकट खड़ा करता है।
IDBI का वर्तमान में पूरे देश में 2,122 शाखाओं का नेटवर्क है, जो कई दूर-दराज के इलाकों में बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराता है। सरकारी योजनाओं में इसकी भागीदारी में शामिल हैं:
- प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) के तहत 18.72 लाख से अधिक खाते।
- प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) के तहत 10.86 लाख से अधिक बैंक खाताधारक।
- प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY) के तहत 3.81 लाख से अधिक बैंक खाताधारक।
- अटल पेंशन योजना (APY) के तहत 5.48 लाख से अधिक बैंक खाताधारक।
- 191 आधार नामांकन केंद्र।
- सतारा जिले में एक ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (IDBI-RSETI) है, जिसने 7,165 उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया है, जिनमें से 5,241 को रोजगार मिल गया है।
भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा IDBI बैंक को निजी क्षेत्र के बैंक के रूप में पुनर्वर्गीकृत किए जाने के बाद, मार्च 2019 में इसके महानगरीय और शहरी शाखाओं ने किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) ऋणों पर ब्याज सब्सिडी देना बंद कर दिया।
एक बार जब बैंक कनाडाई कंपनी के हाथों में चला जाएगा, तो इसकी अर्ध-शहरी और ग्रामीण शाखाएं भी किसानों को कर्ज देना बंद कर सकती हैं। IDBI बैंक मुद्रा , पीएम स्वनिधि और स्टैंड अप इंडिया जैसी योजनाओं के तहत दिए जाने वाले छोटे लोन, और साथ ही छात्रों को दिए जाने वाले एजुकेशन लोन (जो आमतौर पर बिना किसी गिरवी/कोलेटरल के दिए जाते हैं) को भी बंद कर सकता है।
5. संसद को दिए गए आश्वासन का उल्लंघन
13वीं लोकसभा के दौरान, वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने IDBI (उपक्रम का हस्तांतरण और निरसन) विधेयक, 2002 की विस्तार से जांच की। जून 2003 में जारी अपनी 46वीं रिपोर्ट के अनुच्छेद 33 में, समिति ने यह टिप्पणी की:
समिति को जानकारी मिली है कि आम जनता ने IDBI में 10,000 करोड़ रुपये का भारी निवेश किया है, जो सुरक्षित नहीं है। उनका मानना है कि यह व्यवस्था तब तक ठीक है जब तक IDBI एक सरकारी बैंकिंग कंपनी बनी रहती है, लेकिन जिस दिन IDBI में सरकार की हिस्सेदारी 51% से कम हो जाएगी, उस दिन देश में अफरा-तफरी जैसी स्थिति पैदा हो जाएगी और निवेशक घबरा जाएंगे। इसलिए, वे सुझाव देते हैं कि सरकार को ऐसे प्रावधान करने चाहिए जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि IDBI में सरकार की हिस्सेदारी 51% से नीचे न जाए।
तत्कालीन वित्त मंत्री ने 8 दिसंबर 2003 को लोकसभा में और 15 दिसंबर 2003 को राज्यसभा में यह आश्वासन दिया था कि सरकार एक बैंकिंग कंपनी के रूप में IDBI में हमेशा कम से कम 51% इक्विटी हिस्सेदारी बनाए रखेगी। इस आश्वासन को सरकारी ‘आश्वासन समिति’ के रिकॉर्ड में दर्ज किया गया था।
इसलिए, IDBI में विनिवेश करने का मौजूदा सरकार का फैसला संसद में दिए गए उस आश्वासन का उल्लंघन है।
6. IDBI के खुदरा जमाकर्ताओं को अंधेरे में रखा गया
31 मार्च 2026 तक, IDBI में पब्लिक डिपॉजिट ₹3,47,163 करोड़ थे, जबकि बैंक का कुल कारोबार ₹6,00,789 करोड़ था।
कई छोटे निवेशकों ने अपनी मेहनत की कमाई IDBI में जमा की है, यह मानकर कि बैंक को सरकार का समर्थन प्राप्त है। उनकी सहमति के बिना IDBI का निजीकरण करना उन्हें निराश करने जैसा होगा।
14 जुलाई, 2026 को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को दी गई IDBI की जानकारी के अनुसार, न तो बैंक और न ही इसके शेयरधारकों को DIPAM के प्रस्ताव के बारे में पता था। क्या IDBI के छोटे शेयरधारकों को भरोसे में नहीं लिया जाना चाहिए था?
7. LIC पॉलिसीधारकों के हितों की अनदेखी
LIC के 26 करोड़ 20 लाख पॉलिसीधारक हैं, जिनके फंड का इस्तेमाल LIC ने IDBI में 49.24% इक्विटी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए किया था।
अपनी 30.24% हिस्सेदारी का विनिवेश करते समय, LIC ने अपने पॉलिसीधारकों को विश्वास में नहीं लिया है।
8. फेयरफैक्स का हितों का टकराव
फेयरफैक्स को हितों के टकराव की संभावना का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि उसने पहले ही कैथोलिक सीरियन बैंक में बहुमत हिस्सेदारी हासिल कर ली है। फेयरफैक्स इंडिया द्वारा अधिग्रहण की घोषणा से उसकी संलिप्तता की पुष्टि होती है।
नीति के तौर पर, भारतीय रिज़र्व बैंक एक ही प्रमोटर को एक साथ दो बैंकों पर नियंत्रण रखने की अनुमति नहीं देता है। इसलिए, मेरी राय में, फेयरफैक्स के पक्ष में IDBI में विनिवेश करने का सरकार का यह फैसला, हितों के टकराव के कारण शुरू से ही त्रुटिपूर्ण है।
फेयरफैक्स की IIFL कैपिटल सर्विसेज, IIFL फाइनेंस, 5पैसा कैपिटल और वैल्यूएटिक्स री में भी बड़ी हिस्सेदारी है, जो वित्तीय सेवाओं और बीमा के क्षेत्रों से जुड़ी हैं। इन निवेशों के कारण हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) की अतिरिक्त स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
निष्कर्ष: स्वतंत्र जांच होने तक विनिवेश को निलंबित रखें
उपर्युक्त को देखते हुए, मेरी राय में 14 अक्टूबर, 2026 का CCEA का निर्णय अनुचित है। इसके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं, इसमें IDBI की संपत्तियों का बहुत कम मूल्यांकन किया गया है, और ऐसा लगता है कि सरकार ने संसद को जो आश्वासन दिया था, उसका भी उल्लंघन हुआ है।
इसलिए मेरी मांग है कि एक स्वतंत्र जांच होने तक इस फैसले को रोक कर रखा जाए। उस जांच के नतीजे संसद के सामने पेश किए जाने चाहिए।
सादर,
ई.ए.एस. सर्मा
भारत सरकार के पूर्व सचिव
विशाखापत्तनम
