एआईएफएपी ने “मई 1974 की ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल और उसके सबक” पर एक सफल बैठक आयोजित करी

कामगार एकता कमिटी (केईसी) संवाददाता की रिपोर्ट

एआईएफएपी (सर्व हिंद निजीकरण विरोधी फोरम) ने 1974 की ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल को मनाने के लिए और बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि आज भी प्रासंगिक सबक लेने के लिए एक इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित करी।

आमंत्रित वक्ता थे श्री शिव गोपाल मिश्रा, महासचिव, ऑल इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन (एआईआरएफ), कॉमरेड के. सी. जेम्स, महासचिव, ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (एआईएलआरएसए), कॉम. आर. एलंगोवन, पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष, दक्षिण रेलवे कर्मचारी संघ (डीआरईयू) और अध्यक्ष, दक्षिण रेलवे पेंशनर्स यूनियन (डीआरपीयू) और श्री डी. एन. एस. एस. राव, अध्यक्ष, अखिल भारतीय रेलवे कर्मचारी परिसंघ (एआईआरईसी)।

एआईएफएपी के संयोजक और कामगार एकता कमिटी (केईसी) के सचिव डॉ. ए मैथ्यू ने सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों का स्वागत किया और अपना उद्घाटन भाषण दिया। हम सभी वक्ताओं द्वारा बताए गए महत्वपूर्ण बिंदुओं को पेश कर रहे हैं।

डॉ. मैथ्यू ने घोषणा की कि यद्यपि 1974 में आईआर (भारतीय रेल) में हड़ताल दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक कार्रवाई थी, लेकिन इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, क्योंकि शासक वर्ग ने अपने हित में इसे मीडिया से दूर कर दिया है जिसे यह नियंत्रित करता है। हम उन बहादुर कर्मचारियों को सलाम करते हैं, जो राज्य के अत्याचार के खिलाफ अपने अधिकारों के लिए खड़े हुए। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पुलिस और अर्धसैनिक बलों सहित सभी राज्य एजेंसियों का इस्तेमाल किया था, जिन्होंने डराने-धमकाने, 30,000 से अधिक श्रमिकों की गिरफ्तारी, यातना, आंसू गैस छोड़ने और यहां तक कि श्रमिकों और उनके परिवारों के खिलाफ गोलीबारी का सहारा लिया था।

हड़ताल का नेतृत्व एनसीसीआरएस (नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी फॉर रेलवेमेन्स स्ट्रगल) ने किया था, जिसका गठन फरवरी 1974 में आईआर श्रमिकों की 125 यूनियनों को एकजुट करने, समन्वय करने और नेतृत्व करने के लिए किया गया था। महत्वपूर्ण बात यह थी कि एनसीसीआरएस के भीतर छोटी-बड़ी सभी यूनियनों को समान अधिकार प्राप्त थे।

यह हड़ताल कम वेतन, अत्यधिक कठिन कामकाजी परिस्थितियों और अत्यधिक लंबे कार्य दिवसों के खिलाफ थी। उनकी मुख्य मांगें थीं कि रेलवे कर्मचारियों को औद्योगिक श्रमिक माना जाए, 8 घंटे कार्य दिवस, बड़े उद्योगों के अनुरूप वेतन और डीए दिया जाए, कैजुअल लेबर बंद की जाए और सभी को समान काम के लिए समान वेतन दिया जाए। यह हड़ताल पिछले साल एआईएलआरएसए (औल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसीओसेशन) के तहत लोको पायलटों की हड़ताल और एआईजीसी (ऑल इंडिया गार्ड्स काउंसिल) के तहत आयोजित गार्डों के संघर्ष के बाद हुई थी।

एक बार हड़ताल का नोटिस दिए जाने के बाद, सरकार ने उद्योग के पहियों को चालू रखने की कोशिश करने के लिए (और इस प्रकार पूंजीपतियों के हितों की रक्षा के लिए) कदम उठाए। यात्री गाड़ियों की कीमत पर अधिक मालगाड़ियाँ चलाई गईं। सरकार ने अपने वादे के अनुसार नेताओं के साथ बातचीत जारी रखने के बजाय उन सभी को गिरफ्तार कर लिया।

अधिकांश नेताओं के जेल में होने के बावजूद, रेल कर्मचारियों ने पूरे देश में एकजुट होकर भाग लिया, जिससे संपूर्ण रेल परिचालन ठप हो गया। हड़ताल को कुचलने के लिए कर्मचारियों का वेतन और राशन बंद कर दिया गया। रेलवे कॉलोनियां रणक्षेत्र में तब्दील हो गईं। कई स्थानों पर महिलाएं और बच्चे बड़ी संख्या में अपना समर्थन प्रदर्शित करने के लिए सामने आए, लेकिन उन पर बेरहमी से हमला किया गया, पीटा गया और कुछ के साथ बलात्कार भी किया गया। उनके घर नष्ट किए गए। कॉलोनियों पर कर्फ्यू लगा दिया गया।

रेलवे कर्मचारियों को पूरे भारत में बड़ी संख्या में श्रमिकों का समर्थन मिला, जिन्होंने प्रदर्शन किया और हड़ताल की। आख़िरकार 28 मई को हड़ताल वापस ले ली गई। फिर भी कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रहा।

डॉ. मैथ्यू ने हड़ताल के उन सबकों पर प्रकाश डाला जो आज मजदूर वर्ग के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालाँकि कर्मचारी बहुत ही बुनियादी और उचित मांगों के लिए लड़ रहे थे, लेकिन राज्य द्वारा उनके साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार किया गया। इससे पता चलता है कि हमारे देश में लोकतंत्र केवल पूंजीपतियों के शासक वर्ग के लिए है। याद रखें कि सरकार ने हड़ताल से पहले उनके हितों की रक्षा के लिए कैसे कदम उठाए थे!

हालाँकि सरकार ने बातचीत करने के अपने वादे को धोखा दिया, लेकिन ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे उसे जवाबदेह ठहराया जा सके। हमने देखा कि 2021-2022 के किसान आंदोलन में भी, जिसमें 700 से अधिक शहीद हुए, सरकार ने अपनी एक भी प्रतिबद्धता लागू नहीं की है, और वह अपने वादे पूरे करे, यह करवाने के लिए कोई तंत्र नहीं है।

आज भी आईआर के कर्मचारी ऐसी ही समस्याओं और विभिन्न वर्गों में घिरे हुए हैं, लोको पायलट, ट्रैक मेंटेनर, सिग्नल और दूरसंचार कर्मचारी, गार्ड आदि उनके लिए लड़ रहे हैं, अधिकारी उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।

1974 की हड़ताल ने दिखाया कि शासक वर्ग मजदूर वर्ग की एकजुट कार्रवाइयों से कितना भयभीत है। 2020 में एनसीसीसीआरएस का पुनर्गठन करना एक महत्वपूर्ण कदम था। कर्मचारियों के नेतृत्व के लिए हर स्तर पर कमिटियों का निर्माण समय की मांग है। श्रमिक वर्ग के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संचार के चैनल स्थापित करने की भी आवश्यकता है ताकि हम अपने नारे, “एक पर हमला सभी पर हमला है!” को सही मायने में लागू कर सकें।

श्री शिव गोपाल मिश्रा ने बैठक के आयोजकों और सभी प्रतिभागियों को इस ऐतिहासिक हड़ताल को याद रखने के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि नए कर्मचारियों को इसके बारे में शिक्षित करने के लिए उन्होंने हड़ताल का दस्तावेजीकरण किया है। एआईआरएफ के शताब्दी समारोह में उन्होंने 1974 की हड़ताल में भाग लेने वाले 13 कर्मचारियों को सम्मानित किया था और ऐसा करना एआईआरएफ के लिए सम्मान की बात थी। उन्होंने संघर्ष में शहीद हुए कर्मचारियों को श्रद्धांजलि दी। 1974 में आईआर कर्मचारियों का वेतन बहुत कम था और एनसीसीआरएस ने सभी को एकजुट किया।

महिलाओं ने हड़ताली कर्मचारियों को पूरा समर्थन दिया और जो हड़ताल पर नहीं थे, उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई। सेना भी हड़ताली कर्मचारियों का मनोबल नहीं तोड़ सकी।
1974 की हड़ताल के कारण आपातकाल की घोषणा हुई। उन्होंने घोषणा की कि एनसीसीआरएस के पुनर्गठन में उन्होंने उन सभी यूनियनों को शामिल किया है जो इसमें शामिल होना चाहते थे। उन्होंने सभी से पिछली गलतियों को भूलकर एकजुट होने का आग्रह किया। अगर सरकार हमारी मांगें नहीं मानती है तो हमें अपना संघर्ष तेज करना होगा। जब सब कुछ विफल हो जाए तो हड़ताल ही अंतिम उपाय है। हालाँकि हमने कुछ माँगें जीत ली हैं, लेकिन लड़ाई जारी है। युवा कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर आगे आना चाहिए।

कॉम. के. सी. जेम्स ने बताया कि आज भी अनेक संघर्ष हो रहे हैं। हालाँकि विभिन्न संगठनों के बीच गंभीर मतभेद हैं, फिर भी वे लड़ने के लिए एक साथ आते हैं।

1974 में केरल में अन्य क्षेत्रों के श्रमिकों ने हड़तालियों के समर्थन में धरना आयोजित किया था। एनसीसीआरएस ने सभी को एकजुट किया और कुछ मांगें पूरी हो गईं, जैसे कैजुअल श्रम बंद कर दिया गया और एलपी (लोको पायलट) के काम के घंटे कम कर दिए गए, कम से कम कागज पर।

1974 में 20 लाख श्रमिक थे, जबकि अब आधे से कुछ अधिक रह गये हैं। तब से रेलवे यातायात कई गुना बढ़ गया है, रेलगाड़ियाँ लंबी हो गई हैं, अधिक अश्वशक्ति के इंजनों का प्रयोग किया जाने लगा है। आईआर के सभी कर्मचारी अत्यधिक काम के बोझ तले दबे हुए हैं। बहुत सारे ट्रैक मेंटेनर मारे जा रहे हैं। सिस्टम के उन्नयन का गंभीर अभाव है। छोटी सी गलती पर कर्मियों को नौकरी से हटा दिया जाता है।

रेलवे के निजीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। अब निजी ठेकेदार 8 लाख ठेका श्रमिकों को काम पर रखते हैं, जिनका वेतन बहुत कम है। रेलवे की संपत्ति निजी निगमों को दी जा रही है। उनके किसी भी निवेश के बिना, आईआर की संपत्ति निजी कंपनियों को पट्टे पर सौंपी जा रही है। आईआर बुनियादी ढांचे का निर्माण करके उन्हें सौंप रहा है। अब वे पूरा अनुभाग सौंपना चाहते हैं। नए निगम बन रहे हैं। उदाहरण के लिए, फ्रेट ट्रांसपोर्ट निगम के श्रमिकों को आईआर का श्रमिक नहीं माना जाता है और उनका वेतन कम होता है।
कॉमरेड जेम्स ने आज के सबकों की रूपरेखा प्रस्तुत की। एकता बनानी होगी। जोनल और डिविजन स्तर पर एनसीसीआरएस का निर्माण किया जाना है। एनसीसीआरएस के सभी संगठनों को समान दर्जा दिया जाना चाहिए। इसके बिना अखिल भारतीय रेलवे हड़ताल संभव नहीं है। संगठनों और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के लिए दृढ़ प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि एआईएलआरएसए एकता बनाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करेगा।

कॉम. इलांगोवन ने हड़ताल के सबक पर बैठक आयोजित करने के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने घोषणा की कि आईआर और केंद्र सरकार में स्थिति समान है और एक और हड़ताल की आवश्यकता है।

एनसीसीआरएस को जो मुख्य मुद्दे उठाने चाहिए वे सबसे पहले निजीकरण के खिलाफ हैं। आज आईआर में 8 लाख संविदा कर्मी हैं, जिन्हें नियमित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय रेलवे योजना के अनुसार, सभी मालगाड़ियों का निजीकरण किया जाएगा, साथ ही लाभदायक यात्री ट्रेनों का भी।
दूसरे, 12 लाख आईआर कर्मचारियों में से 8 लाख नई पेंशन योजना (एनपीएस) के अंतर्गत आते हैं, जब कि 26 लाख केंद्र सरकार के कर्मचारी इसके अंतर्गत हैं। एनपीएस के तहत पेंशन अत्यधिक अपर्याप्त है, पेंशन की कोई गारंटीकृत राशि नहीं है, और कोई डीए नहीं है। पुरानी पेंशन योजना की बहाली के लिए संयुक्त मंच (जेएफआरओपीएस) का गठन किया गया और हड़ताल का आह्वान किया गया। एक मजबूत एकता की जरूरत है।

उन्होंने 1974 की हड़ताल और आपातकाल के दौरान उत्पीड़न का विवरण दिया। उन्होंने घोषणा की कि एनसीसीआरएस को सक्रिय रहना चाहिए था। रेल यूनियनें नेतृत्व विहीन हो गईं। सभी मान्यता प्राप्त और गैर-मान्यता प्राप्त यूनियनें पहले एनसीसीआरएस का हिस्सा थीं और उन्हें समान दर्जा प्राप्त था। अब इसकी पुनः जरूरत है। इसी प्रकार जेएफआरओपीएस में गैर मान्यता प्राप्त यूनियनों को शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने एकता की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि एनसीसीआरएस और जेएफआरओपीएस दोनों के लिए जोनल, मंडल और शाखा स्तर पर कमिटियाँ बनाई जानी चाहिए।

श्री डी. एन. एस. एस. राव को इंटरनेट की समस्या थी, इसलिए उनके संगठन के श्री नजमुल इस्लाम को अपने विचार व्यक्त करने के लिए कहा गया। हर कोई बहुत खुश था कि उन्होंने 1974 की हड़ताल में हिस्सा लिया था। श्री इस्लाम ने पिछले अनुभव से सीखने की जरूरत पर जोर दिया। सरकार का क्रूर व्यवहार उस समय कई प्रतिभागियों के लिए एक झटका था।

उन्होंने कहा कि अब कार्य संस्कृति बदल रही है। हमें हमलों से हतोत्साहित नहीं होना चाहिए, बल्कि सीखना चाहिए और भविष्य की कार्रवाइयों के लिए तैयार रहना चाहिए।

बाद में, जब श्री डी. एन. एस. एस. राव का इंटरनेट बहाल हुआ, तो उन्होंने 1974 की हड़ताल के कुछ बहुत महत्वपूर्ण सबक बताए। निचले स्तर के नेतृत्व को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और मुख्य नेतृत्व की गिरफ्तारी होने पर कार्यभार संभालने के लिए तैयार रहना चाहिए। साथ ही, भविष्य की हड़तालों को ताकत देने के लिए जोनल, डिविजनल, शाखा/विभाग स्तर पर भी एनसीसीआरएस संगठनों को तैयार करने की जरूरत है।

सभी वक्ताओं के बाद मंच को हस्तक्षेप के लिए खोल दिया गया। अनेक वक्ताओं ने अपने बहुमूल्य विचार दिये। जो प्रतिभागी आईआर कर्मचारी नहीं थे, उन्होंने यात्रियों को शिक्षित करने और श्रमिकों का समर्थन करने के लिए उन्हें संगठित करने के बारे में बात की। इसे हर स्तर पर करने की जरूरत है ताकि मजदूर वर्ग एकजुट हो सके और भविष्य में निर्णायक भूमिका निभा सके।

एक हस्तक्षेप में यह दृढ़ता से बताया गया कि जब हम अपनी तात्कालिक मांगों के लिए लड़ते हैं, तो हमें पूंजीपति वर्ग के शासन को श्रमिक वर्ग और अन्य मेहनतकशों के शासन से बदलने के परिप्रेक्ष्य से भी लड़ना चाहिए।

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