भगत सिंह स्टूडेंट्स & यूथ फ्रंट (BSYF) का आह्वान
निजी कंपनियों की तरह सार्वजनिक क्षेत्र की पानीपत रिफाइनरी भी बहुत बड़ी मात्रा में ठेका मजदूरों का इस्तेमाल करती है। ये मजदूर अपने शोषण और बुनियादी सुवधाओं की कमी के विरोध में संघर्ष पर उतरे हैं। जरूरी है कि यह संघर्ष यहीं तक सीमित न रहे। यह संघर्ष सत्ता में बैठे पूंजीपति वर्ग के खिलाफ़ है। संघर्ष को मजदूर वर्ग को सत्ता में लाने के परिपेक्ष्य से आगे लेके जाना होगा। भगत सिंह स्टूडेंट्स & यूथ फ्रंट (BSYF) का आह्वान याद दिलाता है कि यह संघर्ष पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ़ है जहाँ मानव को केवल मुनाफा कमाने का माध्यम के रूप में देखा जाता है।

पानीपत रिफाइनरी मजदूरों के न्यायपूर्ण मांगों के समर्थन में एकजुटता का आह्वान
मजदूर-मेहनतकश साथियो!
हरियाणा में नीपत स्थित इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) की रिफाइनरी में कार्यरत हजारों मजदूर हड़ताल पर हैं। 23 फरवरी को सुबह 11 बजे से 30 से 40 हजार की संख्या में मजदूरों ने रिफाइनरी गेट 1 और 4 पर अपनी कुछ बुनियादी मांगों के साथ प्रदर्शन शुरू किया था, जिसके कुछ घंटे बाद ही पुलिस की तरफ से प्रदर्शन को जबरन समाप्त कराने के लिए लाठीचार्ज शुरू कर दिया गया जिसमें कुछ मजदूर घायल भी हुए, जिसके बाद हालात पर काबू पाने के लिए सीआईएसएफ द्वारा हवाई फ़ाइरिंग करने की भी खबर आई है।
मजदूरों के शांतिपूर्ण और जायज़ प्रदर्शन पर प्रबंधन व ठेकेदारों के इशारों पर दमन कर माहौल को तनावपूर्ण बना देने के लिए यहां सीआईएसएफ जिम्मेदार है। आज पानीपत की रिफाइनरी में जो कुछ हो रहा है, वह इसी बनाई गई पूंजीवादी दुनिया की दरारों से झलकता हुआ सच है। वेतन में देरी, मनमानी कटौती, बारह घंटे काम लेकर आठ घंटे का भुगतान, ठेका मजदूरों के साथ भेदभाव और सुरक्षा उपायों में लगातार ढील — ये सब अचानक नहीं होते। ये उस सोच का परिणाम होते हैं जिसमें ” Ease of doing business” को मज़दूर की गरिमा से ऊपर रखा जाता है और मुनाफ़े को मनुष्य से अधिक महत्व दिया जाता है।
वहाँ के मजदूरों की माँगें बहुत साधारण और न्यायपूर्ण हैं — समय पर पूरा वेतन, PF और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी, स्थायी काम और छँटनी से सुरक्षा, सुरक्षित कार्यस्थल, नियमित मेंटेनेंस, पर्याप्त सेफ़्टी उपकरण, दुर्घटना की स्थिति में बीमा व इलाज और काम के दौरान भोजन-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ। ये कोई अतिरिक्त लाभ नहीं, बल्कि श्रम की न्यूनतम शर्तें हैं। लेकिन जब “लागत कटौती” और “उत्पादकता” की भाषा चलती है, तो सबसे पहले जिस जगह समझौता होता है, वह यही सुरक्षा और कल्याण है। स्टाफ कम कर दिया जाता है, शिफ्ट लंबी कर दी जाती है, मेंटेनेंस टाल दिया जाता है, प्रशिक्षण घटा दिया जाता है। ठेका व्यवस्था के माध्यम से जिम्मेदारी को धुंधला कर दिया जाता है, तब पानीपत की रिफाइनरी में घटी घटना की तरह मजदूरों की मौत होती है।
इसके पहले झारखंड के पतरातु में औद्योगिक दुर्घटना में मजदूरों की मौत हुई है। सैकड़ों मौतें लगातार हो रही हैं। यह महज़ लापरवाही नहीं है; यह मुनाफ़े की संरचना का हिस्सा है। इस व्यवस्था में मजदूर को एक जीवित इंसान नहीं, बल्कि एक “लागत” या “इनपुट” की तरह देखा जाता है।
जब पानीपत में साथियों ने काम रोका, तो अचानक बातचीत की भाषा बदल गई। इससे एक बुनियादी सच सामने आता है— जब तक उत्पादन चलता रहता है, हमारी समस्याएँ किनारे कर दी जाती हैं; जैसे ही उत्पादन रुकता है, वे केंद्रीय मुद्दा बन जाती हैं। इसका मतलब साफ है: श्रम केवल काम करने की ताक़त नहीं, बल्कि समाज की निर्णायक शक्ति है। लेकिन यहीं हमें ठहरकर एक और बात समझनी होगी। सरकार और पूँजीपति वर्ग केवल आर्थिक माँगों से स्थायी रूप से नहीं झुकते। वे कुछ रियायतें दे सकते हैं, तनाव कम कर सकते हैं, आश्वासन दे सकते हैं। पर यदि श्रम कानूनों की दिशा वही रहे, यदि ठेका और अस्थायी काम को “लचीलापन” कहकर सामान्य बनाया जाए, यदि यूनियन की ताक़त को सीमित किया जाए, तो समस्याएँ बार-बार लौटेंगी।
मोदी सरकार द्वारा बनाई गई चार श्रम संहिताएँ केवल तकनीकी दस्तावेज़ नहीं हैं। वे उस व्यापक परियोजना का हिस्सा हैं जिसमें श्रम को अधिक लचीला और पूँजी को ज़्यादा सुरक्षित बनाया जा रहा है। कागज़ पर “समानता” और “Parity” की बात होती है, पर यदि ज़मीन पर ठेका मजदूर असुरक्षा और भय में काम कर रहा है, तो कानून एक औपचारिक ढाँचा बनकर रह जाता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि हम अपनी आर्थिक माँगों को राजनीतिक प्रश्नों से जोड़ें। यदि PF की सुरक्षा कमजोर है, तो यह नीति का सवाल है। यदि सुरक्षा मानकों को लागू नहीं किया जाता, तो यह प्रशासनिक प्राथमिकता का सवाल है। यदि श्रम कानून मालिक को अधिक अधिकार देते हैं और मजदूर को कम सुरक्षा, तो यह सत्ता के चरित्र का सवाल है। इसलिए हमारी लड़ाई केवल वेतन बढ़ाने की नहीं है; हमारी लड़ाई इस बात की है कि कानून और नीतियाँ किसके पक्ष में खड़ी होंगी। जब तक संघर्ष फैक्ट्री गेट तक सीमित रहेगा, समाधान भी सीमित रहेगा। जब संघर्ष नीति और कानून के स्तर तक पहुँचेगा, तभी संतुलन बदल सकता है।
“पानीपत में चालीस हज़ार मज़दूरों का एक साथ खड़ा होना सिर्फ़ एक प्रदर्शन नहीं है; वह इस सच्चाई का प्रमाण है कि भय हमेशा व्यक्तिगत होता है, लेकिन साहस सामूहिक होता है और जब हम साथ खड़े होते हैं, तो डर सचमुच टूट जाता है।”
अब ज़रूरत है कि यह भ्रम भी टूटे कि राज्य तटस्थ है, सुधार निरपेक्ष हैं और पूंजीपति का मुनाफ़ा एवं श्रमिक का हित एक है। इतिहास हमें बताता है कि अधिकार कभी दान में नहीं मिलते। वे संगठित चेतना और सामूहिक प्रयास से हासिल होते हैं। यदि श्रमिक अपनी शक्ति को पहचाने और बिखराव से ऊपर उठकर साझा दिशा तय करे, तो कानून भी बदल सकते हैं। यदि श्रमिक बिखरे रहेंगे, तो कानून उसी के विरुद्ध लिखे जाते रहेंगे। इसलिए मजदूरों की एकता अनिवार्य है।
इतिहास का पहिया स्वयं नहीं घूमता। उसे वही घुमाते हैं जो उत्पादन करते हैं और जो अपने वर्ग तथा समाज के हितों के प्रति राजनीतिक तौर पर सजग रहते हैं। इसलिए यह समय केवल प्रतिक्रिया देने का नहीं, दिशा तय करने का है। हम केवल बेहतर शर्तों पर काम करने के लिए संघर्ष नहीं कर रहे हैं, वह पूंजीवादी व्यवस्था अपनी मुनाफे की होड़ के कारण हमें दे ही नहीं सकता है। इसलिए हम चाहते हैं कि उत्पादन के सभी साधनों का समाजीकरण हो, उत्पादन पूंजी के मालिकों के मुनाफा बढ़ाने के लिए न हों, बल्कि लोगों की जरूरत को पूरा करने के लिए हो। हमें इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अपने संघर्ष को तेज करना चाहिए।
हम इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL), पानीपत के संघर्षरत मजदूरों की निम्नलिखित मांगों का समर्थन करते हैं और आम मेहनतकश लोगों से भी अपील करते हैं कि वे उनके साथ खड़े हों-
1. 8 घंटे की ड्यूटी सख्ती से लागू की जाए!
2. वेतन का भुगतान प्रत्येक माह की 1 से 7 तारीख के बीच सुनिश्चित किया जाए तथा 240 दिन पूर्ण करने पर पूरी देय राशि का भुगतान किया जाए!
3. कंपनी के बोर्ड रेट के अनुसार वेतन दिया जाए तथा भविष्य निधि (PF) की राशि बराबर और नियमित रूप से जमा की जाए!
4. कार्य के दौरान किसी भी दुर्घटना या अनहोनी की स्थिति में कंपनी पूर्ण जिम्मेदारी ले और उचित मुआवज़ा दे!
5. के.के.एस. से उठाए गए मजदूर साथियों को तुरंत रिहा किया जाए!
6. ओवरटाइम (OT) का भुगतान दोगुनी दर से किया जाए!
7. सभी राष्ट्रीय अवकाश मजदूरों को प्रदान किए जाएं!
8. मासिक ड्यूटी 26 कार्यदिवस निर्धारित की जाए!
9. कार्यस्थल पर शौचालय और स्वच्छ पेयजल की समुचित व्यवस्था की जाए!
10. मजदूरों पर दर्ज की गई एफआईआर रद्द की जाए!
क्रांतिकारी एकजुटता के साथ
भगत सिंह स्टूडेंट्स & यूथ फ्रंट (BSYF)
