कामगार एकता कमेटी संवाददाता की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश सरकार की निजीकरण योजनाओं के खिलाफ उत्तर प्रदेश के बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों का वीरतापूर्ण संघर्ष 27 फरवरी को 457 दिन पूरे कर चुका है। उनके इस संघर्ष को न केवल देश भर के बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों का, बल्कि करोड़ों किसानों और बिजली उपभोक्ताओं का भी सक्रिय समर्थन मिल रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार इस वीरतापूर्ण संघर्ष को कुचलने के लिए विभिन्न हथकंडे और तरीके अपना रही है।

फरवरी 2026 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों के घरों में जबरन स्मार्ट मीटर लगाने की मुहिम तेज कर दी। इस कदम का विरोध करने वालों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ा। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने इस कदम की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि यह वर्ष 2000 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के साथ हुए लिखित समझौते का पूर्णतः उल्लंघन है, जिसमें बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों को रियायती बिजली आपूर्ति देने का प्रावधान था। संघर्ष समिति ने यह भी बताया कि बिजली क्षेत्र सुधार अधिनियम में भी स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि राज्य बिजली बोर्डों के तीन भागों में बंटवारे के बाद भी बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों की सेवा शर्तों और लाभों की पूर्ण सुरक्षा की जाएगी। संघर्ष समिति ने कहा है कि स्मार्ट मीटर लगाना बिजली वितरण के निजीकरण की दिशा में सिर्फ पहला कदम है।
उत्तर प्रदेश सरकार निजीकरण अभियान का सक्रिय रूप से विरोध कर रहे श्रमिकों, अधिकारियों और इंजीनियरों के खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाई कर रही है। इनमें से कई को सरासर झूठे बहाने बनाकर निलंबित किया जा रहा है और हजारों को दूरस्थ स्थानों पर स्थानांतरित किया जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में 25,000 से अधिक कम वेतन वाले संविदा कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त किया जा चुका है।
हालांकि, बिजली क्षेत्र के श्रमिक, विभिन्न स्तरों और श्रेणियों में एकजुट होकर, बहादुरी से संघर्ष कर रहे हैं। वे झुकने के बजाय, अपने न्यायसंगत संघर्ष को और तीव्र कर रहे हैं और उसका विस्तार कर रहे हैं। वे हमारे देश के सभी मेहनतकश लोगों के पूर्ण सक्रिय समर्थन के पात्र हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की श्रमिक-विरोधी, जनविरोधी और अन्यायपूर्ण कार्रवाइयों की कड़ी निंदा करना भी अत्यंत आवश्यक है।
