मज़दूर आंदोलन पर दमन के खिलाफ गुड़गांव में विरोध-प्रदर्शन आयोजित हुआ!

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) की प्रेस विज्ञप्ति

देशभर में जारी मज़दूर आंदोलनों और उन पर हो रहे पुलिसिया दमन के खिलाफ एक विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया गया। प्रदर्शनकारियों ने गुड़गांव–मानेसर, नोएडा तथा देश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे मज़दूरों पर हो रहे बर्बर दमन की कड़ी निंदा की। “बाहरी तत्वों” का आरोप लगाकर मज़दूर आंदोलन को बदनाम करने और उसे तोड़ने की कोशिश की जा रही है, जबकि यह आंदोलन मज़दूरों की बुनियादी मांगों — 8 घंटे का कार्यदिवस, ओवरटाइम का उचित भुगतान, साप्ताहिक अवकाश, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां और ₹30,000 न्यूनतम वेतन — को लेकर चल रहा है। प्रदर्शन के अंत में यह संकल्प लिया गया कि मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा और देशभर में व्यापक एकजुटता बनाई जाएगी।

प्रेस विज्ञप्ति

दिनांक: 19 अप्रैल 2026

स्थान: लघु सचिवालय, गुड़गांव (हरियाणा)

मज़दूर आंदोलन पर दमन के खिलाफ गुड़गांव में विरोध-प्रदर्शन आयोजित!

आज, 19 अप्रैल 2026 को लघु सचिवालय, गुड़गांव में मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) के आह्वान पर देशभर में जारी मज़दूर आंदोलनों और उन पर हो रहे पुलिसिया दमन के खिलाफ एक विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में विभिन्न मज़दूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों, छात्र-युवा संगठनों और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

प्रदर्शनकारियों ने गुड़गांव–मानेसर, नोएडा तथा देश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे मज़दूरों पर हो रहे बर्बर दमन की कड़ी निंदा की। वक्ताओं ने विशेष रूप से गुड़गांव–मानेसर में मॉडेलमा और रिचा ग्लोबल के 56 से अधिक मज़दूरों — जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं — और साथ ही नोएडा से ३५० मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और उन पर हत्या के प्रयास, आगजनी व दंगे जैसी गंभीर धाराएं लगाने को अन्यायपूर्ण बताया। इसके साथ ही

प्रदर्शन के दौरान मानेसर व नोएडा में गिरफ्तार पुरुष व महिला मज़दूरों तथा इंकलाबी मज़दूर केंद्र और बिगुल मज़दूर संगठन के कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई और उन पर लगाए गए फर्जी मुकदमों को रद्द करने की जोरदार मांग की गई।

सभा को संबोधित करते हुए इंकलाबी मजदूर केंद्र के मुन्ना प्रसाद ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई मजदूर-विरोधी श्रम संहिताओं के दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन नीतियों के चलते मालिकान द्वारा मजदूरों से 12–12 घंटे काम कराया जा रहा है, जिसके खिलाफ मजदूरों का आक्रोश स्वतःस्फूर्त रूप से विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में उभर रहा है। उन्होंने हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों द्वारा इस आंदोलन के दमन की कड़ी आलोचना की।

बेलसोनिका से मोहिंदर ने कहा कि हाल में किए गए आपराधिक कानूनों में संशोधनों का इस्तेमाल मजदूर आंदोलनों को दबाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि हड़ताल जैसे बुनियादी अधिकारों को सीमित किया जा रहा है और आंदोलन में शामिल मजदूरों को जेल में रखा जा रहा है, जबकि उनके परिवारों को उनसे मिलने तक नहीं दिया जा रहा।

CSTU से सौरभ ने बढ़ती महंगाई के बीच मजदूरों की आर्थिक स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि जब मजदूर ₹30,000 न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे हैं, तो सरकार को इसे स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मजदूरों की मेहनत से भारी मुनाफा कमाने वाले पूंजीपतियों के पक्ष में सरकार खड़ी दिखाई दे रही है। जन संघर्ष मंच से सोमनाथ ने मांग रखी कि मजदूरों पर दमन तुरंत बंद किया जाए, सभी गिरफ्तार मजदूरों को रिहा किया जाए, न्यूनतम मजदूरी ₹30,000 की जाए और श्रम संहिताओं को रद्द किया जाए।

प्रदर्शन में यह भी उठाया गया कि इंकलाबी मज़दूर केंद्र के कार्यकर्ताओं श्यामबीर, हरीश और राजू, बेलसोनिका के अजीत और पिंटू यादव तथा मुंजाल शोवा के मज़दूर आकाश को साजिशकर्ता बताकर गिरफ्तार करना एक सुनियोजित कार्रवाई है। वक्ताओं ने कहा कि इन घटनाओं की जिम्मेदारी मज़दूरों पर थोपना गलत है और इसकी निष्पक्ष न्यायिक जांच होनी चाहिए।

नोएडा में बिगुल मज़दूर के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की भी कड़ी आलोचना की गई। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों में ट्रेड यूनियन नेताओं, लेखकों और पत्रकारों पर की जा रही कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया गया। सीटू नेताओं जयभगवान व विनोद को फेसबुक पर भड़काऊ भाषण का आरोप लगाकर नोटिस जारी करना, CITU और CPM के सांसदों को मजदूर परिवारों से मिलें से रोकना, फिरोजाबाद में सीटू के नेता भूरी सिंह यादव को जेल भेज दिया गया, नोएडा में गंगेश्वर दत्त शर्मा और अन्य नेताओं को लंबे समय से नजरबंद रखा गया है, किसान नेता व एडवोकेट रुपेश वर्मा पर पुलिस निगरानी जारी है, और देश भर से ट्रेड यूनियन नेताओं की धर-पकड़ व नजरबंदी की घटनाएं सामने आ रही हैं। यह पूरी स्थिति लोकतंत्र और कानून के शासन के विरुद्ध है तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन है।

वक्ताओं ने कहा कि “बाहरी तत्वों” का आरोप लगाकर मज़दूर आंदोलन को बदनाम करने और उसे तोड़ने की कोशिश की जा रही है, जबकि यह आंदोलन मज़दूरों की बुनियादी मांगों — 8 घंटे का कार्यदिवस, ओवरटाइम का उचित भुगतान, साप्ताहिक अवकाश, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां और ₹30,000 न्यूनतम वेतन — को लेकर चल रहा है।

प्रदर्शन में यह भी रेखांकित किया गया कि पिछले कुछ महीनों में उत्तर भारत के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में ठेका मज़दूरों के आंदोलन ने एक नई ऊर्जा और एकजुटता दिखाई है। इसके बावजूद सरकारों द्वारा 350 से अधिक मज़दूरों की गिरफ्तारी और आंदोलन को साजिश करार देना बेहद चिंताजनक है।

मासा और अन्य संगठनों की प्रमुख मांगें:

* सभी गिरफ्तार मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की तत्काल और बिना शर्त रिहाई

* फर्जी मुकदमों की वापसी

* मज़दूर आंदोलनों पर पुलिसिया दमन पर रोक

* 9 और 13–14 अप्रैल की घटनाओं की निष्पक्ष न्यायिक जांच

* हड़ताल और यूनियन बनाने के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा

सभा को मजदूर संघर्ष संगठन से सूरज,श्रमिक संग्राम कमिटी से सुभाष, TUCI से उमाकांत , AITUC से श्रवण, एफटीआईआईयू न्यू से पी के शाही, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र से ऋचा, ग्रामीण मजदूर यूनियन से संतोष, निर्माण कामगार मजदूर यूनियन से रघुबीर, पछास से राहुल , लोकपक्ष से अन्वीर ,BNASU के अनिरुद्ध और सतीश माहना, आकांक्षा प्रिया,राहुल सिद्धांत, सहित अन्य वक्ताओं ने संबोधित किया ने भी संबोधित किया, जबकि कार्यक्रम का संचालन रंजना और सोमनाथ ने किया और समापन व्यक्तत्व IMK से खीमानंद ने किया !

प्रदर्शन के अंत में यह संकल्प लिया गया कि मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा और देशभर में व्यापक एकजुटता बनाई जाएगी।

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