कामगार एकता कमिटी के संवाददाता की रिपोर्ट

ऑल इंडिया रेलवे ट्रैक मेंटेनर्स यूनियन, वेस्टर्न रेलवे, मुंबई डिवीजन (AIRTU) और कामगार एकता कमिटी (KEC) ने संयुक्त रूप से मई दिवस के अवसर पर मुंबई में कामगारों की एक बैठक आयोजित की। इस बैठक में ट्रैक मेंटेनर्स, ट्रेन मैनेजर्स, टिकट चेकर और भारतीय रेल की कार्यशालाओं में काम करने वाले कर्मचारी, परिधान उद्योग के मजदूर, आईटी कर्मी, प्रोफेसर और शिक्षक आदि शामिल हुए।
बैठक स्थल को “दुनिया के मजदूरों, एक हो!” और “मई दिवस अमर रहे!” जैसे बैनरों से सजाया गया था।
AIRTU के एक वक्ता ने सभी का स्वागत किया और उन्हें मई दिवस के इतिहास को समझने का आग्रह किया। उन्होंने समझाया कि मई दिवस का वास्तविक इतिहास जानबूझकर कामकाजी लोगों से छिपाया जाता है क्योंकि शासक पूंजीपति वर्ग को डर है कि मजदूर वर्ग पूंजीवादी शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में मजदूरों की उस साहसिक एकता से प्रेरित हो जाएगा।
उन्होंने आगे बताया कि आज भी हमारे देश के अधिकांश कामकाजी लोग, जिनमें भारतीय रेल में काम करने वाले लोग भी शामिल हैं, 12-14 घंटे काम करने के लिए मजबूर हैं, और विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में प्रगति ने उनके जीवन और कामकाजी परिस्थितियों को बेहतर बनाने में मदद नहीं की है। उन्होंने कहा कि न केवल भारतीय रेल के सभी वर्गों के कर्मचारियों के बीच एकता आवश्यक है, बल्कि पूंजीवादी शोषण को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिए यह जरूरी है कि धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, लिंग और देश के आधार पर होने वाले किसी भी विभाजन को पार करते हुए पूरे मजदूर वर्ग को एकजुट किया जाए।
KEC के वक्ता ने दुनिया भर में 8 घंटे के कार्यदिवस के लिए मजदूरों के संघर्ष के इतिहास का वर्णन किया। 1886 में शिकागो के मजदूरों के नेतृत्व में अमेरिकी मजदूरों के संघर्ष ने जुलाई 1889 में सेकंड इंटरनेशनल के गठन के लिए एकत्र हुए क्रांतिकारी मजदूर नेताओं को गहराई से प्रेरित किया। इसी कारण उन्होंने घोषणा की कि दुनिया के सभी देशों के मजदूर हर साल 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाकर शिकागो के शहीदों का सम्मान करेंगे। यह परंपरा आज तक जारी है।
भारत में मई दिवस के इतिहास को बताते हुए उन्होंने कहा कि 1 मई 1923 को चेन्नई में पहली बार मई दिवस मनाया गया था, जिसका नेतृत्व लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान के कॉमरेड सिंगारवेलु ने किया था। उस घटना ने भारतीय मजदूर वर्ग की समाजवादी चेतना को भी उजागर किया। 1948 के फैक्ट्री अधिनियम में 48 घंटे के कार्य सप्ताह और एक साप्ताहिक अवकाश को कानून बनाए जाने के बाद अंततः 8 घंटे का कार्यदिवस कानूनी रूप से हासिल किया गया। परंतु, वास्तविकता यह है कि न केवल 8 घंटे का कार्यदिवस बल्कि कामकाजी लोगों के लगभग सभी अधिकार केवल कागजों पर ही बने हुए हैं और हर दिन खुलेआम कुचले जाते हैं।

एक अन्य वक्ता ने मई दिवस के अवसर पर जारी KEC के बयान पर विस्तार से प्रकाश डाला। देश की सारी संपत्ति हमारे देश के मजदूरों के पसीने और मेहनत से बनती है, लेकिन इसका फल पूंजीपति वर्ग हड़प लेता है। पूरी सरकारी मशीनरी पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा के लिए काम करती है। चुनावी व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि किसी भी समय जो भी पार्टी पूंजीपति वर्ग की सबसे अच्छी सेवा कर सकती है, उसे सरकार चलाने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। इसलिए उन्होंने कहा कि श्रमिकों को एक नई व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता है, जो यह सुनिश्चित करे कि देश के सभी मामलों में उनके पास निर्णायक निर्णय लेने की शक्ति हो और चुने हुए प्रतिनिधि उन लोगों के प्रति पूरी तरह जवाबदेह हों जिन्होंने उन्हें चुना है। इसलिए उन्होंने कहा कि मई दिवस का वास्तविक आह्वान मजदूरों और किसानों के शासन की स्थापना के लिए काम करना है।
इसके बाद हुई चर्चाओं में सभी प्रतिभागियों ने सहमति व्यक्त की कि कामकाजी लोग ही देश को सभी के सर्वोत्तम हित में चलाने में सक्षम हैं। बैठक में शामिल कई लोगों ने प्रस्तुत विचारों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त की। सभी प्रतिभागियों ने मई दिवस के वास्तविक इतिहास को फैलाने और श्रमिकों में यह विश्वास जगाने पर सहमति जताई कि वे शासक बन सकते हैं।
क्रांतिकारी गीतों तथा मजदूरों के जीवन पर आधारित गीतों और कविताओं ने कार्यक्रम के दौरान बीच-बीच में माहौल को जीवंत बनाए रखा और उत्साह बढ़ाया।
