“मज़दूर काम नहीं करते!” यह पूँजीपतियों का प्रचार है। असलियत क्या है?

ऑल हरियाणा पावर कॉरपोरेशन वर्कर यूनियन के अध्यक्ष कॉमरेड सुरेश राठी से मिली जानकारी के आधार पर कामगार एकता समिति के संवाददाता की रिपोर्ट।

“मज़दूर आलसी होते हैं! वे काम नहीं करते! वे बिना ठीक से काम किए ही अपनी वेतन कमाना चाहते हैं!” पूँजीपतियों और उनके विचारकों का यह प्रचार इतना व्यापक और लगातार चलने वाला है कि कभी-कभी हममें से कुछ लोग भी इसके शिकार हो जाते हैं!

उदाहरण के लिए, अगर कोई ट्रेन या सरकारी बस देर से आती है, तो हममें से कुछ लोग रेलवे या सरकारी परिवहन के मज़दूरों को दोष देते हैं। अगर सरकारी अस्पतालों में इलाज में देरी होती है या हमारे बच्चे स्कूल या विद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले कुछ विषय नहीं समझ पाते हैं, तो हममें से कुछ लोग अस्पताल के मज़दूरों, डॉक्टरों या स्कूल के शिक्षकों को दोष देते हैं! जब हमें बैंक में अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए लंबा समय बिताना पड़ता है, तो हममें से कुछ लोग बैंक मज़दूरों से नाराज़ हो जाते हैं!

ऐसा ही तब होता है जब बिजली आपूर्ति बहाल होने में देरी होती है और हममें से कुछ लोग बेचारे, ज़रूरत से ज़्यादा काम के बोझ तले दबे बिजली मज़दूरों को दोष देने लगते हैं! लेकिन हममें से कितने लोग जानते हैं कि पिछले कई दशकों से सभी सरकारी कंपनियों में पक्के मज़दूरों की भारी कमी है? पक्के मज़दूरों की संख्या लगातार घट रही है और जो पक्के मज़दूर बचे हैं, उन्हें किसी तरह बिना ट्रेनिंग वाले ठेका मज़दूरों की मदद से ग्राहकों को सेवा देनी पड़ती है। ज़्यादा काम के बोझ और तनाव के अलावा, बिजली के मामले में यह स्थिति उन्हें सुरक्षा के गंभीर खतरों में भी डालती है।

उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (UHBVN) में मंज़ूर 17,956 पदों में से 7,392 यानी 41% पद खाली हैं, जबकि दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम (DHBVN) में मंज़ूर 22,338 पदों में से 11,327 यानी 51% पद खाली हैं! शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में बिजली उपभोक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और अब लगभग 82 लाख बिजली उपभोक्ता हैं, लेकिन फील्ड टेक्नीशियन, लाइनमैन, मीटरिंग मज़दूर और मेंटेनेंस स्टाफ़ के खाली पदों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। पक्के मज़दूर भर्ती करने के बजाय, हरियाणा सरकार ने हार्ट्रॉन (Hartron) और HKRN जैसी श्रम ठेका कंपनियों के ज़रिए लगभग 11,000 ठेका मज़दूर रखे हैं। लेकिन न तो ये मज़दूर पूरी तरह से प्रशिक्षित हैं और न ही ये स्थायी हैं। इससे हरियाणा के बिजली मज़दूरों पर काम का भारी बोझ पड़ रहा है।

हमने उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बिजली मज़दूरों की ऐसी ही परेशानियों को उजागर किया है। सार्वजनिक क्षेत्र के सभी उपक्रमों में ऐसी ही चिंताजनक स्थिति है।

इसलिए, एक-दूसरे की काम करने की निष्ठा पर शक करने के बजाय, हम मेहनतकश लोगों को पूँजीपतियों और उनके विचारकों के दुष्प्रचार को खारिज कर देना चाहिए और उनसे कहना चाहिए कि “हमारे देश की सारी दौलत और सेवाएँ हमारे देश के मेहनतकश लोग ही अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति से पैदा करते हैं!” हमें उनसे यह भी कहना चाहिए कि “असली परजीवी तो वे ही हैं!”

हमें एक आवाज़ में खाली पदों की इस गंभीर समस्या के तत्काल समाधान की मांग करनी चाहिए, क्योंकि यह सभी कामकाजी लोगों की भलाई पर बुरा असर डालती है!

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