“व्यापार करने में आसानी” या “मजदूरों पर जुल्म करने में आसानी”?

कामगार एकता कमिटी के संवाददाता की रिपोर्ट

2 सितंबर, 2026 को दिल्ली कैबिनेट ने “दिल्ली ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस बिल, 2026” (व्यापार करने में आसानी बिल, EoDB 2026) को मंज़ूरी दी। इस बिल का एकमात्र उद्देश्य मालिकों को जवाबदेह ठहराए बिना, श्रमिकों का हर संभव शोषण करना है। यह बिल स्पष्ट रूप से मालिकों के मुनाफ़े को अधिकतम करने का काम करता है, जबकि पहले से ही असुरक्षित स्थिति में काम कर रहे मज़दूरों की सुरक्षा को और अधिक ख़तरे में डालता है। किसी भी तरह से इस बिल को इस आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता कि इससे श्रमिकों को कोई फ़ायदा हो रहा है।

इस बात की पूरी संभावना है कि अन्य राज्यों की सरकारें भी इसी तरह के मज़दूर-विरोधी बिल पास करेंगी। इसलिए, पूरे श्रमिक वर्ग पर इसके पड़ने वाले प्रभावों को समझना बहुत ज़रूरी है।

यह बिल विनिर्माण इकाइयों (मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स) और अन्य उद्यमों के लिए अनिवार्य नियमित सरकारी निरीक्षण की शर्त को हटा देता है। नए EoDB 2026 के अनुसार, कारखानों और विनिर्माण इकाइयों के मालिक एक मोबाइल ऐप के ज़रिए कार्यस्थल पर सुरक्षा उपायों के लागू होने का “स्व-प्रमाणन” (सेल्फ़-सर्टिफिकेशन) कर सकते हैं। ऐप के ज़रिए सौंपी गई इन रिपोर्टों के आधार पर, श्रम विभाग कारखानों और उद्यमों की कभी भी (रैंडम) जाँच करेगा।

यह EoDB केंद्र सरकार के ‘ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस (OSHW) कोड, 2020’ के अनुरूप है। इस कोड ने उद्योगों और व्यवसायों के नियमित, समयबद्ध सरकारी निरीक्षण की व्यवस्था को बदलकर एक ऐसा ढांचा लागू किया है, जो स्व-प्रमाणन, स्व-नियमन और ऐप के ज़रिए होने वाली रैंडम सरकारी जाँच पर आधारित है। यह कोड कारख़ाना मालिकों और मालिकों द्वारा किए गए कई अपराधों को “मामूली” अपराधों की श्रेणी में डाल देता है। इससे इन उल्लंघनों के लिए आपराधिक मुक़दमा चलाने की संभावना ख़त्म हो जाती है और इसकी जगह नागरिक दंड (जैसे जुर्माना) का प्रावधान आ जाता है। इसमें कार्यस्थल पर सुरक्षा ख़तरों और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़े औद्योगिक कार्यों में बरती गई लापरवाही भी शामिल है। इसके अलावा, यह कोड उन कारख़ानों में सुरक्षा निगरानी की अनिवार्यता को पूरी तरह से हटा देता है जहाँ 500 से कम मज़दूर काम करते हैं, और उन निर्माण स्थलों (कंस्ट्रक्शन साइट्स) से भी जहाँ 250 से कम मज़दूर काम करते हैं।

दिल्ली सरकार का ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ (व्यापार करने में आसानी) बिल ऐसे समय में आया है जब कारखानों में आग लगने, कार्यस्थलों पर दुर्घटनाओं, निर्माण कार्यों में गड़बड़ी और इमारतों के गिरने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। इन घटनाओं में कई मज़दूर और आम लोग घायल हुए हैं, हमेशा के लिए अपंग हो गए हैं या उनकी जान चली गई है। हाल की कुछ दुखद घटनाओं में शामिल हैं: बवाना फैक्ट्री में विस्फोट और इमारत का गिरना (मई 2025), मायापुरी औद्योगिक क्षेत्र में आग (जून 2026), 2024 में राजिंदर नगर के बेसमेंट में पानी भरने से छात्रों की मौत, मालवीय नगर में लॉजिंग (आवास) में आग (जून 2026), और 6 सितंबर 2026 को सत्य निकेतन में छात्रों के लिए बनी पांच मंजिला इमारत का गिरना, जिसमें कम से कम सात छात्रों की मौत हो गई।

जुलाई में जारी ‘सेफ इन इंडिया फाउंडेशन’ की ‘क्रश्ड 2026’ (CRUSHED 2026) रिपोर्ट में गुरुग्राम-मानेसर ऑटोमोटिव उद्योग में सुरक्षा नियमों के बड़े पैमाने पर उल्लंघन का खुलासा हुआ है। यहाँ 2025 में हज़ारों मज़दूर खराब मशीनरी और सुरक्षा उपकरणों की कमी के कारण घायल हुए थे।

जिन मामलों में जांच हुई, उनमें साफ तौर पर यह सामने आया कि ये जानलेवा दुर्घटनाएं कार्यस्थलों पर सुरक्षा नियमों की अनदेखी के कारण हुईं। इन प्रतिष्ठानों ने खुद को ‘सुरक्षित’ होने का प्रमाण पत्र (self-certified) दे दिया था, जबकि असल में वे कई अनिवार्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन कर रहे थे। कई मामलों में यह भी पता चला कि सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देकर औचक निरीक्षणों का भी समझोता कर दिया गया था।

यहाँ एक बुनियादी सवाल उठता है: क्या कार्यस्थल पर सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से मुनाफ़ा कमाने वाले मालिकों की मर्जी पर छोड़ी जा सकती है? क्या यह उम्मीद करना उचित है कि मालिक खुद से अनिवार्य सुरक्षा मानकों का पालन करेंगे, जबकि ऐसा करने से उन पर अतिरिक्त खर्च आ सकता है या उनका मुनाफ़ा कम हो सकता है?

कार्यस्थल पर सुरक्षा, मालिकों की नेकनीयती, ईमानदारी या उनकी अपनी प्राथमिकताओं पर निर्भर नहीं रह सकती; इसके लिए सख्त नियम, स्वतंत्र निरीक्षण और जवाबदेही तय करने की व्यवस्था होनी चाहिए। क्या यह बात किसी से छिपी है कि मालिक हमेशा अपने मज़दूरों की सेहत, सुरक्षा और भलाई के बजाय अपने मुनाफ़े को ज़्यादा अहमियत देते हैं?

इस बिल का सीधा फ़ायदा कारखानों और उद्यमों के पूंजीपति मालिकों को मिलेगा। यह बिल उन्हें सुरक्षा नियमों की अनदेखी करने पर भी जवाबदेही से बचने की छूट देता है। वे बस कुछ जुर्माना या दंड देकर आसानी से बच निकल सकते हैं। दूसरी ओर, मज़दूरों और उनके परिवारों को इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है—परिवार के किसी सदस्य की जान जाना या अपंग हो जाना, और साथ ही परिवार की कमाई का ज़रिया भी छिन जाना। दिल्ली सरकार के इस विधेयक की कड़ी निंदा की जानी चाहिए, क्योंकि यह सभी मज़दूरों पर सीधा हमला है। यह हर उस व्यक्ति और उसके परिवार पर हमला है जो श्रमिक है, चाहे वह कहीं भी काम करता हो। यह विधेयक स्पष्ट रूप से सरकार के उस असली चेहरे को सामने लाता है जो उन पूंजीपति मालिकों के हितों के लिए काम करती है, जो हर कीमत पर अपना मुनाफा अधिकतम करना चाहते हैं। देशभर के श्रमिक और उनके परिवार कार्यस्थलों पर सुरक्षा नियमों को सख्ती से लागू करने की मांग कर रहे हैं। वे एक सुरक्षित और स्वस्थ कामकाजी माहौल के अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं।

Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted