श्री सचिन टिक्कू, संयोजक, जम्मू कश्मीर पावर एम्प्लाइज एंड इंजीनियर्स कोऑर्डिनेशन कमेटी (JKPEECC) द्वारा रविवार, 2 जनवरी 2022 को आयोजित “ऑल इंडिया फोरम अगेंस्ट प्राइवेटाइजेशन (AIFAP)” की मासिक सभा में दिये गये भाषण की प्रतिलिपि

सर्व हिन्द निजीकरण विरोधी फोरम (AIFAP) को धन्यवाद। मैं उन सभी संस्थापक सदस्यों का बहुत आभारी हूं जिन्होंने जम्मू-कश्मीर को वास्तव में प्रतिनिधित्व करने और राष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखने का अवसर दिया। मैं भाग लेनेवाले सभी सदस्यों को और उन लोगों को भी हार्दिक शुभकामनाएं भेजता हूँ जो आज भाग नहीं ले पाए हैं। जम्मू-कश्मीर में निजीकरण के खिलाफ इस लड़ाई को आगे बढ़ाया गया है। आप इस तथ्य की अत्यधिक सराहना करेंगे कि जम्मू-कश्मीर ने, एक राज्य से केंद्र शासित प्रदेश में बदल होने के बावजूद, इस निजीकरण के कदम का मूँहतोड़ जवाब दिया हालांकि वर्तमान में, केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन सीधे केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है, और केंद्र सरकार की नीतियां और कार्यक्रम, केंद्र शासित प्रदेशों में बिना किसी रोक-टोक के सीधे लागू होती हैं।

आपने पिछले साल सुना होगा कि कोविड लहर के बीच में माननीय वित्त मंत्री निर्मला जी ने घोषणा की थी कि केंद्र शासित प्रदेशों में वितरण क्षेत्र का निजीकरण संसद की मंजूरी के बिना भी किया जाएगा। बिजली एक समवर्ती विषय होने का हमेशा मतलब है कि संसद की अनुमति ली जाने चाहिए था। लेकिन एक कार्यकारी आदेश द्वारा, वे केंद्र शासित प्रदेशों में वितरण क्षेत्र के निजीकरण को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

हमने देखा था कि चंडीगढ़ में, उन्होंने निजीकरण की प्रक्रिया शुरू की थी, भले ही चंडीगढ़ एक ऐसा केंद्र शासित प्रदेश है जहां पारेषण (संचरण) और वितरण नुकसान 10% से कम था, और यह सरकारी क्षेत्र के उपक्रम में एक बहुत ही लाभदायक उद्यम था। इसलिए, नुकसान ज्यादा है, इसलिए हम निजीकरण कर रहे हैं और उपभोक्ता सेवा में सुधार करना है, यह पूरी तरह से झुटा बयान था।

यह मूल रूप से, मैं कह सकता हूं, मुनाफे का निजीकरण और नुकसान को सब्सिडी देना ही है। इस पूरे निजीकरण का सिद्धांत यह है कि आप आकर्षक क्षेत्रों को निजी क्षेत्रों के लिए छोड़ देते हैं, आप निजी क्षेत्रों को चुने-चुने हुए क्षेत्रों को देते हैं।

जम्मू और कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों में एक बहुत ही कठिन भूभाग है: हम एक सीमावर्ती राज्य हैं, हमारे क्षेत्रों को मुश्किल से प्रबंधित किया जाता है, और कुछ बर्फ से ढके होते हैं, और यहां तक कि सर्दियों के दौरान लगभग महीनों तक कट जाते हैं। इसलिए, इस केंद्र शासित प्रदेश में भी, उन्होंने निजीकरण को आगे बढ़ाने की कोशिश की। सरकार का हालिया दुस्साहस पारेषण क्षेत्र में है, यह हमारे लिए आश्चर्य की बात है। पूरे भारत में पारेषण क्षेत्र वर्तमान में राज्य के स्वामित्व में है। वर्तमान में किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में पारेषण क्षेत्र नहीं है जहां कोई अन्य कंपनी शामिल है। फिर भी बिजली मंत्री ने एक एडवाइजरी जारी की कि आप पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के साथ संयुक्त उद्यम के साथ आगे बढ़ सकते हैं। जम्मू-कश्मीर के किसी भी हितधारक को, कर्मचारियों के दृष्टिकोण या उपभोक्ताओं या संयुक्त विद्युत विनियमन आयोग (Joint Electricity Regulation Commission) को विश्वास में लिए बिना, वे एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गए जहां एक संयुक्त उद्यम के लिए एक समझौते या समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जा रहे थे।

जैसा कि हम जानते थे, भारत सरकार के पास पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की केवल 51% हिस्सेदारी है और बाकी हिस्सेदारी शेयरधारकों और निजी निवेशकों के पास है। इसलिए, यह जम्मू-कश्मीर के पारेषण क्षेत्र के निजीकरण की दिशा में अप्रत्यक्ष कदम था, जो विनाशकारी हो सकता था, क्योंकि जम्मू-कश्मीर एक सीमावर्ती राज्य होने के नाते, पूरे देश के लिए इतनी संवेदनशील सुरक्षा चिंता का विषय है। पिछली बार जब हमने लद्दाख में बड़ी बाढ़ देखी थी, केवल BSNL का दूरसंचार ऑपरेटर ही लोगों की सेवा करने में सक्षम था और केवल BSNL ही लद्दाख को भारत से संचार लाइनों पर कट-ऑफ होने से रोक रहा था।

आप समझ सकते हैं, COVID के दौरान भी, लोग बिजली के लिए एक सरकारी क्षेत्र की इकाई, बिजली विकास विभाग पर निर्भर थे, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में वर्तमान में सबसे कम दर है: रु. 3 प्रति इकाई दर है। पूरे भारत में, राष्ट्रीय औसत लगभग रु. 7-8 है। उत्पादन क्षेत्र में निवेश करने और अधिक अवसर देने के बजाय, सरकार निजीकरण के कदमों को दूसरे क्षेत्रों में आगे बढ़ा रही है। हमने एक कड़वी गोली निगली जब हमने पाया कि उत्पादन क्षेत्र में, NHPC अन्दर आ गयी है , और अब हमारे अधिकांश संसाधनों का उपयोग NHPC द्वारा किया जा रहा है, और देश के बाकी हिस्सों में राज्य से बिजली की आपूर्ति की जा रही है, और हमें बहुत कम हिस्सा मिल रहा है। परिस्थिति यह है कि हम देश के बाकी हिस्सों से उच्च दरों पर बिजली खरीद रहे हैं, जबकि हमारे संसाधनों में 20,000 मेगावाट की क्षमता है। जब इतनी बड़ी क्षमता का इस्तेमाल किया जा रहा है, और हमें उसका एक छोटा हिस्सा दिया जा रहा है, तो हम लगभग 2,500 या 3,000 मेगावाट की अपनी आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। हम अतिरिक्त शुल्क का भुगतान करते हैं, और फिर हम अपने उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति करते हैं।

हमारी लड़ाई इस तथ्य से शुरू हुई कि सरकार ने पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के साथ वास्तव में एक संयुक्त उद्यम बनाने का निर्णय लिया था। हमने बहिष्कार का नोटिस दिया। यह एक ऐतिहासिक अवसर था, और हम इस लड़ाई से चूक नहीं सकते थे क्योंकि हमारी सोच बहुत स्पष्ट थी कि अगर हम पावर ग्रिड को अपनी परिसंपत्ति में शामिल होने देते हैं जब कि वे कुछ भी निवेश नहीं कर रहे थे, वे पूरी परिसंपत्ति के मालिक बन जायेंगे। वे बस हमसे परोसी थाली में खाना लेने जा रहे थे और हमारी परिसंपत्तियों में 50% भागीदार बन रहे थे जो हमने अब तक विकसित की हैं और भविष्य में जो भी संपत्ति बनने जा रही थी – वे आउटसोर्सिंग करेंगे और कल पावर ग्रिड हमारे रोजगार के अवसरों को समाप्त कर देगा।

पहले से ही जम्मू-कश्मीर सबसे अधिक बेरोजगारवाले केंद्र शासित प्रदेशों में से एक है, लगभग 21% लोग अब बेरोजगार हैं। जम्मू-कश्मीर में अधिकांश इंजीनियर वर्तमान में पिछले 5-6 वर्षों से बेरोजगार हैं क्योंकि न तो निजी क्षेत्र में और न ही सरकारी क्षेत्र में नौकरी के अवसर पैदा हो रहे थे। इसलिए, हमने इसे एक फ्लैश पाइंट के रूप में लिया क्योंकि हम इस तथ्य से समझौता नहीं कर सकते कि यह संयुक्त उद्यम कर्मचारियों के हित में नहीं था। हमारे पास लगभग 10,000 दिहाड़ी मजदूर हैं जिनका करियर दांव पर लगा जाता क्योंकि आखिरकार, एक और भागीदार हमारे क्षेत्र में आ रहा था और वह इसमें कुछ भी नहीं ला रहा था, सिवाय इसके कि वह हमसे सब कुछ छीन रहा था। उन सभी दैनिक रेटेड श्रमिकों के भविष्य के लिए और हमारे अपने भविष्य के लिए और समग्र उपभोक्ताओं के लिए लड़ना जरुरी था। हमने अपनी हड़ताल की बात उनको बताई और हमने सरकार को अपना बहिष्कार नोटिस दिया, हमने मीडिया से बातचीत की और उन्हें बताने बात बताने की कोशिश की जो तथ्यों पर आधारित थी। हमने उनसे कहा कि अगर कोई दूसरी कंपनी बन रही है, तो इसका अपना परिचालन खर्च होगा, यह उन खर्चों को उपभोक्ताओं पर डाल देगा। अंतत: इसका बोझ उपभोक्ताओं पर ही पड़ने वाला है। भले ही हम अपने सेवा अधिकारों के हितों की रक्षा कर सकें, उपभोक्ता का क्या होगा?

वर्तमान में उपभोक्ता सभी सुविधाओं का लाभ उठा रहा है। यदि उपभोक्ता फोकस है, तो उपभोक्ता पर बोझ डालने वाले परिचालन व्यय का रास्ता मंजूर नहीं होना चाहिए। तो उपभोक्ताओं ने भी हमारी बात मान ली। आप वास्तव में इस तथ्य की सराहना करेंगे कि पहली बार, लगभग 20-30 सामाजिक संगठनों और राजनीतिक संगठनों के जम्मू-कश्मीर के लोग लड़ाई में आए और उन्हों ने हमारा पूरा समर्थन किया। यहां तक कि राजनीतिक नेताओं ने भी हमारे पक्ष में बयान दिए। यहां तक कि वकीलों का प्रतिनिधित्व करने वाले बार एसोसिएशन और जम्मू-कश्मीर के चैंबर ऑफ कॉमर्स ने भी हमारा पुरजोर समर्थन किया। उन सभी ने बयान दिया क्योंकि हम उन्हें अपनी बात समझाने में सक्षम रहे कि यह जम्मू-कश्मीर के समग्र हित में नहीं है जो वर्तमान में संक्रमण के दौर में है।

आजकल हमें बताया जाता है कि हम कुछ महीनों के बाद एक राज्य बन सकते हैं। इसलिए, इस समय बिजली क्षेत्र को पावर ग्रिड जैसी पहले से ही सूचीबद्ध कंपनी, ऐसी एक निजी क्षेत्र की इकाई के थाली में नहीं परोसा जा सकता है। उन्हें वह परिसंपत्ति नहीं दी जा सकती जो हमने वर्षों में बनाई है। बिजली के बारे में भी जम्मू-कश्मीर ने तरक्की की है। 2002 में, हमारे पास 2,500 मेगावाट की पारेषण क्षमता थी। आज हमारे पास करीब 5,000 मेगावाट की पारेषण क्षमता है। वह सब बिजली विकास विभाग द्वारा किया गया था, वह हमारे अपने लोगों द्वारा किया गया था; हमारे अपने दैनिक रेटेड श्रमिकों ने और हमारे सभी लोगों ने उन संपत्तियों को बनाने में योगदान दिया है।

यदि हम पावर ग्रिड को इस पूरे क्षेत्र में 50% हिस्सा लेने की अनुमति देते, तो यह वास्तव में निजी क्षेत्र के लिए पावर ग्रिड के साथ समझौता ज्ञापनों में शामिल होने के लिए एक खिड़की खोल देता और उन्होंने अपना आधिपत्य बना लिया होता, जैसा कि NHPC ने चिनार वैली पावर प्रोजेक्ट्स में किया है। हम इस कदम से आशंकित थे, इसलिए हमने एक नोटिस दिया जब 17 तारीख को पहले दौर की वार्ता विफल हो गई, और हम काम के बहिष्कार पर आगे बढ़े।

हमने जिस कार्य बहिष्कार की योजना बनाई थी, वह यह था कि यदि उपभोक्ता के परिसर में या 11-केवी लाइन पर फीडर के सबसे निचले पायदान पर कोई खराबी आती है, तो हम उस खराबी को नहीं ठीक करेंगे। अस्पतालों को छोड़कर यदि कोई खराबी आती है तो उसे ठीक करने का काम नहीं किया जाएगा। भगवान ने हमारी मदद की और धीरे-धीरे व्यवस्था में दोष अपने आप फूट पड़े और हमारे लोगों ने सहयोग किया। बिजली कर्मचारी और इंजीनियर समन्वय समिति में जम्मू-कश्मीर सरकार के बिजली विकास विभाग के 20,000 कर्मचारी शामिल हैं। उन्होंने संकल्प लिया कि हम इन दोषों पर काम नहीं करेंगे। कश्मीर में दिन में करीब 5 डिग्री तापमान और रात में शून्य के नीचे तापमान रहा, वहीं जम्मू में भी लगभग सब-जीरो तापमान देखा गया। लेकिन लोगों ने ही नहीं, बल्कि हमारे कर्मचारियों ने भी सहयोग किया।

यह कर्मचारियों की जीत थी क्योंकि उन्होंने एक साथ फैसला किया कि हम उन दोषों को नहीं सुधारेंगे क्योंकि सरकार गंभीरता से बातचीत नहीं कर रही थी। करीब 96 घंटे तक यह सिलसिला चलता रहा। लगभग 70वें घंटे में सेना को ग्रिड स्टेशनों में बुलाया गया, लेकिन वे भी असहाय थे क्योंकि हम कभी भी बिजली की आपूर्ति बंद नहीं करनेवाले थे। हमने कभी भी किसी भी जगह से बिजली की आपूर्ति बंद नहीं की, किसी भी स्टेशन पर हमने ग्रिड स्टेशन या रिसीविंग स्टेशन बंद नहीं किए।

हम केवल धैर्य में विश्वास करते थे। हमें विश्वास था कि हमें सरकार को धैर्यपूर्वक समझाना होगा कि मेरा दिहाड़ी मज़दूर क्या कर रहा है, मेरा इंजीनियर क्या कर रहा है, हम 24×7 सिस्टम कैसे चला रहे हैं। वे हमारे काम के महत्व को महसूस नहीं कर रहे थे। एक बार जब सिस्टम अपने आप ढहने लगा, तो उनके पास कुछ भी नहीं बचा। वे कह रहे थे कि ग्रिड काम कर रहे हैं लेकिन उपभोक्ताओं को बिजली नहीं मिल रही है, इसलिए वे चौंक गए। सेना पोल पर बिजली कैसे पहुँचा सकती है? वह केवल ग्रिड स्टेशनों पर पहरा दे सकती है जिसे हमने नुकसान पहुंचाने का इरादा कभी नहीं किया क्योंकि यह हमारी परिसंपत्ति थी: हमें ग्रिड या रिसीविंग स्टेशनों के साथ कुछ भी क्यों करना चाहिए था? इसलिए, हमने इंतजार किया और देखा, और दृढ़ता एक बड़ी चीज थी। हमने सिस्टम के धीरे-धीरे बंद होने के लिए लगभग 72 घंटे तक प्रतीक्षा की – जो लोग समझते हैं वे अनुमान लगा सकते हैं कि लगभग 1,000 मेगावाट ऊर्जा जो हम 17 तारीख से पहले आपूर्ति कर रहे थे, वह घटकर 400 मेगावाट हो गई। इसलिए, उपभोक्ताओं को 600 मेगावाट ऊर्जा वितरित नहीं की जा रही थी। इसलिए, जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में क्षेत्रों में ब्लैकआउट देखा गया, वह भी इतनी कड़ाके की सर्दी में।

सरकार को वास्तव में इस तथ्य को समझने के लिए मजबूर होना पड़ा कि जब तक हमारे लोग काम करना शुरू नहीं करते, तब तक उनके लिए उपभोक्ताओं को बिजली देना संभव नहीं था। अंतत: सरकार फंस गयी, और पहली बार उन्होंने महसूस किया कि बिजली कर्मचारी और इंजीनियर इतनी महत्वपूर्ण कर्मचारी हैं, और वे उनकी उपेक्षा कर रहे थे और वे सोच रहे थे कि उन्हें बुलडोज़ करना आसान है। हमें किसी जबरदस्ती की कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ा, यह एक जीत है। एकता के कारण हमें किसी जबरदस्ती का सामना नहीं करना पड़ा। हर बैठक में मैं अपने साथियों से कहा करता था कि मैं वह व्यक्ति नहीं हूं जिसे नेतृत्व करना चाहिए, आप सभी में अग्रणी क्षमता में हैं क्योंकि आप व्यवस्था चला रहे हैं। यदि आप काम नहीं करते हैं, तो आपके स्थान को नुकसान होगा और उस क्षेत्र में ब्लैकआउट देखा जाएगा। आखिर में मेरे हाथ-पैर वे लोग थे जो जमीन पर थे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धन्यवाद; मुझे कहना होगा कि एक केंद्र शासित प्रदेश होने के साथ-साथ सेना बुलाई जा रही है, केंद्रीय मंत्रालय सीधे तौर पर शामिल है, एक नीतिगत निर्णय शामिल था, फिर भी सब कुछ उलटा दिया गया।

समझौते के चरण में आने के दौरान, हमने यह सुनिश्चित किया कि हम तब तक नहीं झुकेंगे जब तक कि हम उन्हें यह एहसास न करा दें कि हम प्रमुख हितधारक हैं और जब तक बिजली कर्मचारी और आगे का रास्ता क्या है, इस बात पर इंजीनियर समन्वय समिति विचार-विमर्श का भाग नहीं है तब तक यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सकता।

इससे जुड़े, इस एजेंडे में हमारी कुछ और प्रमुख मांगें थीं क्योंकि जब से हमारे निगम अस्तित्व में आए हैं, हम वेतन में देरी का सामना कर रहे हैं। हमारे लोगों को इस बहाने वेतन में देरी की जा रही थी कि आप घाटे में चल रहे हैं। लेकिन हम सरकारी सेवा में आए थे, हम लोक सेवा आयोग से सेवा चुनाव बोर्ड के माध्यम से शामिल हुए थे, और इन सभी लोगों को वेतन में देरी के कारण भुगतना पड़ रहा था। आप हमारे वेतन से इनकार नहीं कर सकते, इस बात का सरकार को एहसास दिलाने के लिए हम दृढ़ थे।

इस बात पर, मुझे आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहली बार वेतन 31 तारीख को ही दिया गया, पहली तारीख को भी नहीं। इसलिए, पिछले महीने की 31 तारीख को, तुरंत 20,000 कर्मचारियों के वेतन का वितरण किया गया।

यह सब इसलिए हासिल हुआ, मुझे कहना होगा, क्योंकि हमें ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) का समर्थन प्राप्त था। शुरू से ही करीब 20 राज्यों ने उपराज्यपाल को और केंद्रीय गृह मंत्रालय को हमार मांग-पत्र दिया था। उन्होंने सभी अधिकारियों को समर्थन पत्र भेजे थे। पहली कॉल पर, इंजीनीयर शैलेंद्र दुबे, जो ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के अध्यक्ष हैं, जम्मू आए और लगभग 3 दिनों तक हमारे साथ उन्होंने यहां डेरा डाला। जब तक हम एक समझौते पर नहीं पहुंचे, तब तक उन्होंने जगह नहीं छोड़ी। यह उनकी ओर से वास्तव में सराहनीय था कि हमें साथ साथ उनका अनुभव मिला।

मुझे कहना होगा कि इस अनुभव से हमने बहुत कुछ सीखा है। हमने सीखा है कि अगर हमारे मन में स्पष्ट दृष्टि और लक्ष्य है तो कुछ भी असंभव नहीं है। हमारे कर्मचारी अब बहुत प्रेरित हैं क्योंकि सारी व्यवस्था हमारे खिलाफ थी, वे सोच रहे थे कि बिजली कर्मचारियों के पास कोई शक्ति नहीं है, उन्हें हल्के में लिया जा रहा हथा। इस आंदोलन ने वास्तव में बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों को एक नया जीवन दिया है, और इसने हमें नैतिक रूप से उभारा है, और हम इससे बहुत मजबूती से बाहर आए हैं। हम प्रशासन और यहां तक कि समाज के हर कोने को समझाने में सफल रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि अब हमारे प्रति समाज के मिजाज में बदलाव आ रहा है क्योंकि हम जो कह रहे थे उससे लोग जुड़े।

मुझे कहना होगा कि AIFAP के मार्गदर्शन ने भी मदद की; इंजीनियर शैलेंद्र दुबे पहले से ही AIFAP का हिस्सा थे और उनके माध्यम से हमारे आंदोलन के दौरान हमें महत्वपूर्ण समर्थन मिला। यह एक अच्छी शुरुआत है क्योंकि पूरे भारत में इस मुद्दे पर यह पहला आंदोलन है।

आप समझ सकते हैं, जम्मू-कश्मीर में सरकार के खिलाफ बोलना बहुत मुश्किल है, यह बेहद कठिन है। कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद पहली बार आप देख सकते हैं कि हजारों की संख्या में लोगों ने जमा होकर विरोध किया; वे बिजली की आपूर्ति चालू करने के लिए तैयार नहीं थे। लोगों ने पूरा सहयोग किया। यह एक जन आंदोलन था। यह कुछ ऐसा था जिसकी हमने कभी उम्मीद नहीं की थी। व्यक्तिगत मोर्चे पर भी मेरे परिवार ने, सभी के परिवारों ने सहयोग किया। हमारे पास लगभग 3 दिनों तक बिजली नहीं थी, फिर भी हमारे परिवारों ने सहयोग किया। पानी की कमी थी, यहां तक कि कई जगहों पर मोबाइल टेलीफोन और इंटरनेट भी ठप हो गये।

आप समझ सकते हैं कि बिजली कर्मचारी और इंजीनियर महत्वपूर्ण हैं, बिजली क्षेत्र उन सभी सेवाओं का एक महत्वपूर्ण बुनियादी निर्माण खंड है जो सब के लिए ज़रूरी है। हमारी वजह से ही अस्पताल चल रहे थे, नहीं तो हालात बहुत खराब होते। मैं कह सकता हूं कि सद्बुद्धि प्रबल हुई और सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने भी सरकार को अच्छा मार्ग दिखाया और यह संघर्ष किसी अन्य दिशा में नहीं गया। हम सौहार्दपूर्ण ढंग से एक समझौते पर पहुंचे हैं जहां हम नीतिगत निर्णयों में विजयी हुए हैं।

मुझे कहना होगा कि हम उत्पादन क्षेत्र में भी यह बताने में सक्षम हैं, जिसमें पहले से ही NHPC का आधिपत्य है, कि बहुत सारे पदों पर जम्मू-कश्मीर के लोग हो सकते हैं – मेरे पास हमेशा एक सॉफ्ट कॉर्नर होता है कि जम्मू-कश्मीर के लोग, जो सबसे दूर की जगह से आते हैं, उन्हें वास्तव में नौकरी पाने की जरूरत है। आप समझ सकते हैं कि मुझे महाराष्ट्र जा कर वहां काम करना काफी मुश्किल है क्योंकि अपनी जड़ों से दूर रहना अंतहीन नहीं हो सकता, यह अनंत नहीं हो सकता। हम पहले ही पलायन का सामना कर चुके हैं, मैंने व्यक्तिगत रूप से कश्मीर के उस हिस्से से लगभग 5 साल की उम्र में पलायन किया था और फिर जम्मू में बस गया। पूरी दुनिया में मेरे सहयोगी अलग-अलग जगहों पर बंट गए हैं।

यह बहुत महत्वपूर्ण है, हमारी सरकार को यह समझने की जरूरत है कि यह कदम वास्तव में बहुत सारे रोजगार के अवसर छीनने वाला था। जब आउटसोर्सिंग होती है, तो बहुत कम नौकरियां पैदा होती हैं। आप सभी मेरी तुलना में बहुत पढ़े-लिखे हैं, आप समझ सकते हैं कि पूंजीवाद अपने चरम पर है और यह क्रोनी कैपिटलिज्म है जिसे हमने देखा। राजनीति विज्ञान का छात्र होने के नाते मैं कहूंगा कि यह मेरे जीवन का महत्त्वपूर्ण संघर्ष था। मेरे साथ इंजीनियर और वे लोग हैं जो लगभग 20 साल पहले सेवानिवृत्त हुए हैं, उन्होंने यह कहा कि ऐसा संघर्ष हमने 50 वर्षों में भी नहीं देखा है। भारत भर में, कई संघर्ष हुए हैं। जहां तक जम्मू-कश्मीर का सवाल है, हमारे खिलाफ सभी बाधाओं के बावजूद, हम विजयी हुए। यह हम सब हैं, यह कोई एक व्यक्ति नहीं है, जम्मू से लेकर कुपवाड़ा, कश्मीर तक सभी ने भाग लिया।

मेरे साथ कश्मीर के मेरे सहयोगी थे, मुंशी माजिद अली, जम्मू-कश्मीर इलेक्ट्रिकल ग्रेजुएट इंजीनियर्स के अध्यक्ष। उन्होंने अन्य यूनियनों की अपनी टीम के साथ कश्मीर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दैनिक वेतन भोगी, तकनीशियन, सभी ने शानदार काम किया। पुंछ राजौरी से समर्थन प्राप्त करते हुए, आपने उन नामों को सुना होगा, वे पूरी तरह से ब्लैकआउट देखे थे। भदरवाह, डोडा, किश्तवाड़, हर जगह के लोग सचमुच भारी संख्या में आये।

जब सेना बुलाई गई तो मैं सोच रहा था कि शायद हमारे लोग ठन्डे हो जाएंगे और आगे क्या होगा। लेकिन मुझे नहीं पता था कि असाधारण सर्वशक्तिमान (परमेश्वर) उस संदेश को मेरे दिमाग में और सभी के दिमाग में भेजने के लिए जिम्मेदार थे। पहले दिन, हमारे पास 1,000 लोगों का जमावड़ा था, और एक बार सेना बुलाए जाने के बाद, हमारे पास 5,000 लोगों का जमावड़ा था! मैं वास्तव में प्रेरित हुआ। उस रात, मैं सो नहीं सका। मैं लगभग 5 दिनों तक घर नहीं गया। हम कारों में घूम रहे थे क्योंकि पुलिस हमारे स्थान की तलाश कर रही थी, वे हमें ट्रैक करना चाहते थे, वे हमें पकड़ना चाहते थे, वे इस आंदोलन को किसी न किसी तरह से बंद करना चाहते थे। जब हम सुबह उन जनसभाओं में उपस्थित हुए, तो लोगों का वास्तव में कायाकल्प हो गया था।

यह वास्तव में एक जन आंदोलन था। यह वास्तव में एक ऐतिहासिक संघर्ष है जिसे लोगों ने देखा है और जिसका हिस्सा रहे हैं। हमारे पास एक अनुकरणीय महिला बल, महिला सहकर्मी थे, जो हमारे विजय मार्च में AIFAP वेबसाइट पर भी दिखती हैं। हमें उन सभी महिलाओं का पुरजोर समर्थन था जो हमारे साथ खड़ी रहीं और धरना स्टेशन नहीं छोड़ा। इस तरह के अनुकरणीय आंदोलन वास्तव में हमारे आगे बढ़ने का रास्ता हैं, क्योंकि निजीकरण केवल कहने के लिए उपभोक्ता संतुष्टि के लिए है, वे सभी चीजें वास्तव में सरकार के लिए माइनें नहीं रखती हैं।

उन प्रयोगों को हम अपनी आंखों से देख सकते हैं। जैसे चंडीगढ़ यह बिजली क्षेत्र में एक लाभदायक उद्यम है और अभी भी इसका निजीकरण किया जा रहा है। ये सारी बातें हमें इस बात की याद दिलाती हैं कि सरकार को और भी कुछ चाहिए जिसकी तलाश में वह है। सरकार उन संपत्तियों को बेचने की कोशिश कर रही है, जिसके हम पूरी तरह खिलाफ थे। जम्मू-कश्मीर के पारेषण क्षेत्र में हमारे पास लगभग 24,000 करोड़ की संपत्ति है। यदि वे संपत्तियां पावर ग्रिड को एक थाली में परोसी जातीं, तो यह साम्राज्यवाद का एक और कारण बन जाती, क्योंकि कोई इसे लेकर उस पर कब्ज़ा करने वाला था, और हम इससे अपने पूरे जीवन भर हमेशा पछताते।

मैं कहूंगा कि हम सब AIFAP के साथ हैं। पैनल में आप सभी पढ़े लिखे लोगों के साथ अपना अनुभव साझा करने का यह एक ऐतिहासिक अवसर है। हम AIFAP से जो भी कार्यक्रम प्राप्त करते हैं, हम उसका समर्थन करना और सक्रिय रूप से भाग लेना जारी रखेंगे। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) का हिस्सा होने के नाते, हमारे पास पहले से ही एक मजबूत नेटवर्क है। आपको आश्वासन दिया जाता है कि जम्मू-कश्मीर के बिजली विकास विभाग के 20,000 लोग AIFAP के साथ हैं।

हम सभी विजयी हुए हैं, हमें बस खुद पर विश्वास करना है। विश्वास के कारण, हम हर समस्या पार करने में सक्षम हुए। दृष्टि और लक्ष्य में विश्वास था। हमारे मन में कोई राजनीति नहीं थी, हम जानते थे कि इस सरकार का फैसला गलत है। जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है। मैं कह सकता हूं कि इस सफलता का एकमात्र मंत्र यह था कि हम ईश्वर में विश्वास करते थे और हम मानते थे कि हमारी विचार प्रक्रिया इस उद्यम के दोषों के खिलाफ है। यही मूल बात है। अगर आप सच्चे रास्ते पर हैं, तो मुझे लगता है कि सफलता हमेशा आपके कदम चूमेगी और ऐसा हुआ। एक बार फिर, जम्मू-कश्मीर की ओर से हम आप सभी का धन्यवाद करते हैं।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

 

 

 

 

 

 

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DINESH
DINESH
10 months ago
यह बहुत प्रेरणादायक है, यह हमें एकजुट होकर लड़ने की ताकत देता है, 

ये जीत ये भी दिखाता है कि हम एकजुट होकर  संघर्ष करे तो किसी भी ताकत को झुका सकते है
, जम्मू-कश्मीर के बहादुर साथियों को सलाम