श्री सोमनाथ मालिक, केंद्रीय अध्यक्ष, इंडिएं रेलवे कॉन्ट्रेक्ट वर्कर्स फेडरेशन, नई दिल्ली, एवं अध्यक्ष उत्तरीय रेलवे मजदूर यूनियन, प्रेस सचिव (NFIR) द्वारा

भारत सरकार ने 2019 और 2020 में “Ease of Doing Business” के नाम पर आज़ादी से पहले और बाद के संघर्षों के आधार पर बने 44 केंद्रीय श्रम कानूनों में से 29 श्रम कानूनों को समाप्त कर चार नई श्रम संहिताएँ लागू करने की घोषणा की।
इन संहिताओं का उद्देश्य कानूनों का सरलीकरण बताया गया, लेकिन वस्तुतः यह श्रमिक अधिकारों का संकुचन, मजदूरों को असंगठित करने का प्रयास, और पूंजीपतियों को खुली छूट देने वाली पहल है।
देश के सभी बड़े–छोटे ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संगठनों के कड़े विरोध के कारण ये संहिताएँ अब तक लागू नहीं हो पाई थीं, लेकिन हाल ही में श्रम मंत्री के बयान ने साफ संकेत दिया है कि सरकार इन्हें कभी भी लागू कर सकती है और कल दिनाँक 21 नवम्बर को इसकी अधिसूचना (गज़ट पब्लिश) जारी कर दिया गया है और लागू हो गया चारो श्रम संहिता (लेबर कोड)।
जिससे बेरोज़गारी, शोषण, स्थायी नौकरी का अंत, यूनियन अधिकारों का क्षरण, हड़ताल के मौलिक अधिकार पर प्रहार और सामाजिक सुरक्षा लाभों में भारी कटौती जैसे गंभीर खतरे सामने हैं।
चार श्रम संहिताओं का विवरण:-
A. मजदूरी संहिता, 2019
(निम्नलिखित 4 कानूनों का विलय)
1. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948
2. मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936
3. बोनस भुगतान अधिनियम, 1965
4. समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976
B. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020
(निम्नलिखित 3 कानूनों का विलय)
1. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
2. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926
3. स्थाई आदेश अधिनियम, 1946
C. व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य (OSH) संहिता
(कुल 13 सुरक्षा एवं कार्यस्थल कानूनों का विलय)
कारखाना अधिनियम, खान अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम, डॉक श्रमिक सुरक्षा अधिनियम, निर्माण मजदूर अधिनियम, बागान श्रमिक अधिनियम, प्रवासी मजदूर कानून आदि।
D. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020
(9 प्रमुख योजनाएं और सुरक्षा कानून सम्मिलित)
EPF, ESI, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ, पेंशन, बीमा, असंगठित श्रमिक सुरक्षा योजनाएं आदि।
चार श्रम संहिताओं के ख़तरे और चिंताएँ
1. नौकरी की सुरक्षा खत्म होने का खतरा
300 कर्मचारियों तक की कंपनियों को सरकारी अनुमति बिना छंटनी का अधिकार।
Fixed Term Employment (FTE) के विस्तार से स्थायी नौकरियाँ समाप्त।
कंपनियाँ शॉर्ट-टर्म अनुबंध पर काम करवाकर लंबे समय के लाभों से बच सकती हैं।
2. ट्रेड यूनियन को कमजोर करने की कोशिश
हड़ताल से 60 दिन पहले नोटिस अनिवार्य।
सुलह-प्रक्रिया शुरू होते ही हड़ताल अवैध।
यूनियन पंजीकरण के नियम कठोर।
इसका परिणाम होगा—सामूहिक सौदेबाजी का अंत।
3. असंगठित क्षेत्र में शोषण बढ़ेगा
कॉन्ट्रैक्ट वर्कर (ठेका प्रथा) की परिभाषा कमजोर, शोषण को बढ़ावा।
12 घंटे की शिफ्टों की अनुमति – बिना स्पष्ट ओवरटाइम नियम।
4. व्यावसायिक सुरक्षा में भारी कमी
20–40 मजदूरों वाले कारखानों को सुरक्षा कानूनों से बाहर।
निरीक्षण व्यवस्था ढीली।
दुर्घटनाएँ और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ेंगे।
5. राज्यों द्वारा अलग-अलग नियम बनाना
श्रमिक अधिकारों में राज्य-स्तरीय असमानता।
निवेश आकर्षण की होड़ में राज्य श्रमिक सुरक्षा और कमजोर कर सकते हैं।
चार श्रम संहिताओं का निष्कर्ष
ये संहिताएँ:
- नौकरी की सुरक्षा घटाती हैं।
- यूनियन अधिकार कम करती हैं।
- हड़ताल के अधिकार को सीमित करती हैं।
- सामाजिक सुरक्षा कमजोर करती हैं।
- कार्य के घंटे बढ़ाती हैं।
- नियोक्ताओं को अनुशासनात्मक कार्रवाई से मुक्त करती हैं।
स्पष्ट है — पूंजीपतियों के लिए सुविधा, लेकिन श्रमिकों के लिए असुरक्षा और शोषण।
सेल्स प्रमोशन एम्प्लाइज (Medical & Sales Representatives) पर प्रभाव
सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों पर सबसे अधिक नकारात्मक असर पड़ेगा:
नियुक्ति पत्र (Form A) का प्रावधान खत्म – वेतन वृद्धि, DA का अधिकार समाप्त।
छुट्टियों के प्रावधान खत्म किए जाने की संभावना।
अन्य 10 उद्योगों के सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों पर भी असर।
Fixed Term Employment लागू होने से स्थायी रोजगार समाप्त।
12 घंटे तक कार्य समय बढ़ने का खतरा।
बोनस, इंसेंटिव और वेतन संरचना में कटौती की संभावनाएं।
हड़ताल/यूनियन गठन पर कठोर नियम—कर्मचारियों की आवाज़ दबेगी।
– छंटनी और अनुबंध समाप्त करने में कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता।
समग्र रूप से यह संहिता सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों के अधिकार छीनने की दिशा में है।
हमारा संघर्ष – हमारा संकल्प
ये श्रम संहिताएँ श्रमिकों के अधिकार छीनने, मजदूरों को असंगठित करने और पूंजीपतियों को खुली छूट देने का प्रयास हैं।
देश के आर्थिक विकास के लिए व्यापार और श्रमिक अधिकारों के बीच संतुलन अनिवार्य है, मगर सरकार ने संतुलन तोड़ दिया है।
अब समय है एकता का, संगठन का और संघर्ष का।
साथियों,
संघर्ष ही हमारा हथियार है, एकता ही हमारी ताकत है।
श्रम संहिताओं के खिलाफ हम सबको मिलकर लड़ना होगा।
लड़ेंगे – जीतेंगे
इंकलाब ज़िंदाबाद!
सोमनाथ मालिक, केंद्रीय अध्यक्ष, इंडिएं रेलवे कॉन्ट्रेक्ट वर्कर्स फेडरेशन, नई दिल्ली, एवं अध्यक्ष उत्तरीय रेलवे मजदूर यूनियन, प्रेस सचिव (NFIR)
