कामगार एकता कमिटी के संवाददाता की रिपोर्ट

भारतीय रेल में हाल ही में चयनित नए लोको रनिंग स्टाफ (सहायक लोको पायलट) को प्रशिक्षण के महत्वपूर्ण चरण रोड लर्निंग के लिए विभिन्न स्टेशनों पर भेजा गया है। लेकिन प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही इन कर्मचारियों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, जो न केवल उनकी गरिमा के प्रतिकूल हैं बल्कि रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जेएनपीटी (JNPT) स्टेशन क्षेत्र में रोड लर्निंग के लिए बड़ी संख्या में पहुंचे नए रनिंग स्टाफ के लिए रेलवे प्रशासन द्वारा पर्याप्त आवास एवं विश्राम की व्यवस्था नहीं की गई। परिणामस्वरूप कई कर्मचारियों को रात में पार्क और खुले मैदान में जमीन पर सोने के लिए मजबूर होना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों में दर्जनों कर्मचारी खुले आसमान के नीचे विश्राम करते दिखाई दे रहे हैं।

पहले से अनुमानित थी संख्या, फिर भी नहीं हुई तैयारी
यह स्थिति अचानक उत्पन्न नहीं हुई। जिन कर्मचारियों का चयन हुआ और जिन्हें प्रशिक्षण हेतु भेजा गया, उनकी संख्या रेलवे प्रशासन को पहले से ज्ञात थी। इसके बावजूद न तो अतिरिक्त रनिंग रूम की व्यवस्था की गई, न ही अस्थायी आवास, छात्रावास अथवा अन्य वैकल्पिक व्यवस्था का प्रबंध किया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम से पहले संबंधित मंडल प्रशासन को विस्तृत योजना बनानी चाहिए, जिसमें आवास, भोजन, परिवहन एवं विश्राम जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाए। लेकिन इस मामले में प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा सीधे नए कर्मचारियों को भुगतना पड़ा।
थका हुआ कर्मचारी क्या सीखेगा सुरक्षित संचालन?
लोको रनिंग स्टाफ रेलवे की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। इन्हीं कर्मचारियों के हाथों में लाखों यात्रियों और करोड़ों रुपये के माल की सुरक्षा होती है। ऐसे में यदि प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे कर्मचारियों को पर्याप्त विश्राम, उचित आवास और सम्मानजनक वातावरण ही उपलब्ध न हो, तो उनसे उच्च स्तरीय प्रशिक्षण और सुरक्षा संस्कृति की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
रेलवे सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि थकान, मानसिक तनाव और अव्यवस्थित जीवन-स्थितियां किसी भी सुरक्षा-संवेदनशील कार्य के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करती हैं। जब प्रशिक्षण के दौरान ही कर्मचारियों को मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़े, तो उनके मनोबल और कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
रेलवे आवास नीति पर सवाल
यह घटना रेलवे की आवास एवं प्रशिक्षण प्रबंधन व्यवस्था की कमियों को भी उजागर करती है। एक ओर रेलवे आधुनिक तकनीक, हाई-स्पीड कॉरिडोर और सुरक्षा उन्नयन की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उसके नए कर्मचारी रहने और आराम करने जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित दिखाई देते हैं।
प्रश्न यह भी है कि यदि रेलवे के पास अपने प्रशिक्षणरत कर्मचारियों के लिए पर्याप्त आवास नहीं है, तो आउट स्टेशन पर भेजे जाने वाले कर्मचारियों के लिए दीर्घकालिक और व्यवस्थित समाधान क्यों नहीं विकसित किया गया?
कर्मचारियों में रोष
ऐसा विदित हुआ है कि इस घटना को लेकर रनिंग स्टाफ संगठनों एवं कर्मचारियों में नाराजगी व्याप्त है। उनका कहना है कि रेलवे प्रशासन को कर्मचारियों को केवल मानव संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ के रूप में देखना चाहिए। प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे कर्मचारियों को सम्मानजनक वातावरण, उचित विश्राम और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
तत्काल सुधार की आवश्यकता
रेलवे प्रशासन को इस घटना से सबक लेते हुए भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। प्रशिक्षण हेतु भेजे जाने वाले कर्मचारियों की संख्या के अनुसार अग्रिम योजना, अतिरिक्त आवास की व्यवस्था, रनिंग रूम की क्षमता का विस्तार तथा वैकल्पिक विश्राम स्थलों का प्रबंध सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
क्योंकि सुरक्षित रेल संचालन केवल आधुनिक इंजनों और तकनीक से नहीं, बल्कि प्रशिक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक परिस्थितियों में कार्य करने वाले कर्मचारियों से संभव होता है। यदि रेलवे अपने भविष्य के लोको पायलटों को ही मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा सकती, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सुरक्षा के लिए उसका रवैया भी गंभीर चिंता का विषय है।
