नई दिल्ली में 29 जुलाई, 2026 को मज़दूरों और किसानों की ट्रेड यूनियनों के सर्व हिन्द सम्मेलन में मज़दूर एकता कमेटी की अपील

साथियों,
हम देश के अलग-अलग राज्यों से यहां इकट्ठा हुए हैं, इस बात पर चर्चा करने के लिए कि पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकारों के मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी और समाज-विरोधी हमलों को रोकने के लिए हमें क्या करना चाहिए।
जब प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्री ‘सबका साथ, सबका विकास’ और 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने की बात करते हैं, तो उनकी बातें खोखली लगती हैं। कोई बच्चा भी देख सकता है कि विकास सिर्फ़ पूंजीपतियों का हो रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें मज़दूरों और किसानों को बर्बाद करके, पूंजीपतियों के लिए “ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस” सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
सच तो यह है कि हमारी सरकारें मज़दूरों और किसानों को इंसान ही नहीं मानतीं, जिनकी खुशहाली और सुरक्षा की गारंटी होनी चाहिए। वे हमें गुलामों की तरह समझती हैं, जिनके खून के आखिरी कतरे को निचोड़ कर पूंजीपति वर्ग के अधिकतम मुनाफों को सुनिश्चित किया जा सके।
इसीलिए मज़दूर-विरोधी चार लेबर कोड लागू किए गए हैं, जबकि पूरे देश के मज़दूरों ने इनका विरोध किया है। इसीलिए अमरीका और दूसरे देशों के साथ ‘मुक्त व्यापार समझौते’ किए जा रहे हैं, जबकि देश भर के किसान और मज़दूर इनका विरोध कर रहे हैं।
हमारे देश में ज़्यादातर मज़दूरों को अपने-अपने राज्यों में घोषित सरकारी न्यूनतम वेतन से बहुत कम वेतन पर काम करने को मजबूर किया जा रहा है। उन्हें बिना किसी ओवरटाइम के दिन में 12 घंटे और हफ़्ते में 72 घंटे काम करना पड़ता है। वे ठेके पर काम करते हैं और उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती।
पूरे देश में मज़दूर अपने हकों के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। केंद्र और राज्य सरकारों ने उनके विरोध-प्रदर्शनों को कुचलने के लिए अप्रत्याशित हिंसा का प्रयोग किया है। हज़ारों मज़दूर जेलों में बंद हैं; उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) जैसे कड़े कानूनों के तहत मामले दर्ज किये गए हैं, जिनमें ज़मानत मिलने की भी कोई उम्मीद नहीं है — और यह सब सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने विरोध करने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल किया!
दिल्ली और कई दूसरे शहरों की सड़कें हमारे देश के युवाओं की आवाज़ से गूंज रही हैं। वे उच्च शिक्षा संस्थानों में भर्ती के लिए और सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षाओं में हो रहे घोटालों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। वे मांग कर रहे हैं कि सरकार इसमें अपनी नाकामयाबी को स्वीकार करे और इसकी ज़िम्मेदारी ले। लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले, पेलेट गन के हमले, बेरहमी से पिटाई, विरोध-प्रदर्शन में शामिल युवाओं को कड़े रासुका के तहत गिरफ़्तार करने का फ़ैसला — इनमें से कुछ भी हमारे बहादुर युवाओं को संघर्ष के रास्ते से नहीं हिला पा रहा है। वे इस देश का भविष्य हैं।
साथियों,
मज़दूरों और किसानों की यूनियनों का एक साझा मंच पर एकजुट होना बहुत ही सकारात्मक कदम है।
हमारी मुख्य मांगें हैं: चार लेबर कोड को रद्द करना; ठेके पर काम को खत्म करना; सभी मज़दूरों के लिए गुज़ारे लायक वेतन; सभी कृषि उत्पादों के लिए लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद की गारंटी; सभी मज़दूरों और किसानों के लिए गारंटीड पेंशन समेत सामाजिक सुरक्षा; निजीकरण के कार्यक्रम पर रोक; बिजली वितरण के निजीकरण को खत्म करना; मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी और देश-विरोधी मुक्त व्यापार समझौतों को रद्द करना; सभी के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा; सभी के लिए सुरक्षित रोज़गार। इन जायज़ मांगों को पूरा करने के लिए हमें अपने एकजुट संघर्ष को और तेज़ करना होगा।
हम जानते हैं कि हमारी समस्याओं की जड़ पूंजीपति वर्ग की हुकूमत है। पूंजीपति वर्ग का एजेंडा मज़दूरों के शोषण और किसानों की लूट को और बढ़ाकर खुद को तेज़ी से अमीर बनाना है। केंद्र और राज्य सरकारों को चला रही पूंजीपति वर्ग की पार्टियों द्वारा इस एजेंडे को लागू किया जा रहा है।
पूंजीपति वर्ग की हुकूमत की जगह पर मज़दूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित करनी होगी! राज्य सत्ता हमारे हाथों में होने पर, हम मज़दूर और किसान अर्थव्यवस्था को सभी के लिए खुशहाली व सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में बदल सकते हैं!
इस सम्मेलन में इकट्ठा हुए हम सब को मज़दूर-किसान जनसमुदाय को इस सच्चाई के बारे में जागृत करना होगा कि हिन्दोस्तान हमारा है। अब वक्त आ गया है कि हम देश के मालिक बनें। हमें समाज का एजेंडा तय करना होगा।
आइए, इसी नज़रिए के साथ अपनी तात्कालिक मांगों के लिए संघर्ष करें!
