डॉ. एस. दास, संयुक्त सचिव, कामगार एकता कमिटी द्वारा

केंद्र सरकार द्वारा 14 अगस्त को SHANTI (सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) अधिनियम के मसौदा नियम जारी किए जाने से एक बार फिर इस अधिनियम की जनविरोधी, पूंजीवादी समर्थक प्रकृति पर ध्यान गया है। यह अधिनियम परमाणु ऊर्जा के उत्पादन से संबंधित सभी पहलुओं को समेटता है और दिसंबर 2025 में संसद द्वारा पारित किया गया था। इस अधिनियम ने परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962, और परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व (CLND) अधिनियम, 2010, को निरस्त कर उनकी जगह एक ही कानून लागू किया।
अधिनियम के पारित होने के साथ, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है। जब 1990 के दशक में अन्य माध्यमों से बिजली के उत्पादन को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया गया था, तब परमाणु ऊर्जा उत्पादन को इसकी रणनीतिक महत्ता के कारण राज्य के इजारेदारी के रूप में बरकरार रखा गया था, क्योंकि इसका परमाणु बमों के उत्पादन से घनिष्ठ संबंध है।
SHANTI विधेयक पेश करते हुए, सरकार ने घोषणा की कि विधेयक का उद्देश्य देश में परमाणु ऊर्जा उत्पादन को वर्तमान में 9000 मेगावाट से कम से बढ़ाकर 2047 तक 100,000 मेगावाट करना है। सरकार ने निजीकरण को यह दावा करते हुए उचित ठहराया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी आवश्यक है। टाटा और अडानी जैसे इजारेदार समूहों ने पहले ही परमाणु ऊर्जा उत्पादन में प्रवेश करने में अपनी रुचि घोषित कर दी है।
1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के अनुसार, केंद्र सरकार का कर्तव्य था कि वह परमाणु ऊर्जा पर कड़ा नियंत्रण रखे क्योंकि इसके लिए अत्यधिक विशेषज्ञता और सावधानी की आवश्यकता थी ताकि दुर्घटनाएँ न हों।
परमाणु ऊर्जा संयंत्र में होने वाली दुर्घटना अन्य सभी औद्योगिक दुर्घटनाओं से अलग होती है। इसमें 30 से 100 किमी के दायरे में सभी लोगों, जिनमें जानवर भी शामिल हैं, को निकालना आवश्यक हो जाता है, जिससे क्षेत्र की सभी गतिविधियाँ ठप हो जाती हैं। दुर्घटना के बाद यह रेडियोधर्मी विकिरण उत्पन्न कर सकती है, जिससे प्रभावित क्षेत्र में वर्षों तक कृषि, वार्षिक पशुपालन और मत्स्य पालन असंभव हो जाता है। इससे कई दशकों तक लोगों के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुँचता है।
1986 में रूस के चेर्नोबिल संयंत्र और 2011 में जापान के फुकुशिमा संयंत्र में हुई दुर्घटनाओं का प्रभाव बहुत बड़ा था। अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश देशों में लोग परमाणु संयंत्रों की स्थापना के विरोध में हैं।
भारत में भी जब भी परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए किसी प्रस्तावित स्थल की घोषणा की जाती है, लोग उसका विरोध करते रहे हैं। लोगों के विरोध के कारण सरकार को महाराष्ट्र में जैतापुर जैसे परमाणु ऊर्जा परियोजना स्थलों को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अपने-अपने देशों में विरोध के कारण, अमेरिका की वेस्टिंगहाउस और जनरल इलेक्ट्रिक, फ्रांस की EDF, जापान की मित्सुबिशी और अन्य परमाणु संयंत्र उपकरण निर्माता नई बाजारों की तलाश कर रहे हैं और उन्हें भारत में बड़ी संभावनाएं दिखाई देती हैं। SHANTI अधिनियम द्वारा प्रदान की गई छूटों के बाद, भारत के अप्रमाणित प्रौद्योगिकियों और उपकरणों के परीक्षण स्थल में बदल दिए जाने का गंभीर खतरा है।
विदेशी परमाणु संयंत्र आपूर्तिकर्ता ‘सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज’ (CLND) अधिनियम का ज़ोरदार विरोध करते रहे हैं, क्योंकि यह अधिनियम किसी भी दुर्घटना की स्थिति में परमाणु ऊर्जा उपकरण देने वाले को ज़िम्मेदार ठहराता था और वे इस अधिनियम को रद्द करने की मांग कर रहे थे, जिसे SHANTI अधिनियम ने पूरा कर दिया है।
SHANTI अधिनियम की जन-विरोधी पूंजीवादी विशेषताएँ
- SHANTI अधिनियम निजी और विदेशी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा उत्पादन से संबंधित लगभग सभी गतिविधियों—यूरेनियम खनन, ईंधन निर्माण, रिएक्टर संचालन और प्रयुक्त ईंधन के पुनर्संसाधन—की जिम्मेदारी संभालने की अनुमति देता है। इनमें से प्रत्येक गतिविधि में रेडियोधर्मी रिसाव, लंबे समय तक रहने वाले रेडियोधर्मी कचरे और विनाशकारी दुर्घटनाओं के जोखिम होते हैं।
- 2010 के परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम ने “प्रदूषक भुगतान करे” सिद्धांत के तहत संचालक की सख्त देयता स्थापित की और दोषपूर्ण उपकरण या घोर लापरवाही से जुड़े मामलों में संयंत्र संचालकों को उपकरण आपूर्तिकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराने की अनुमति दी। SHANTI अधिनियम परमाणु संयंत्र संचालकों की देयता और संयंत्र आपूर्तिकर्ताओं की जिम्मेदारी को काफी सीमित करता है। परमाणु दुर्घटनाओं के लिए मुआवजा अब पीड़ितों को हुई क्षति के पैमाने से जुड़ा नहीं है। इसके बजाय, इसे परमाणु संयंत्रों की स्थापित क्षमता के आधार पर सीमित किया गया है। यहां तक कि सबसे बड़े बिजली संयंत्रों के लिए भी, संचालक की देयता 3,000 करोड़ रुपये (लगभग $319 मिलियन) तक सीमित है। छोटे संयंत्रों के लिए देयता की सीमाएं आनुपातिक रूप से कम हैं। यदि देयता इस सीमा से अधिक हो जाती है, तो सरकार हस्तक्षेप करेगी और सार्वजनिक धन से मुआवजे का भुगतान करेगी।
- दायित्व की सीमाएँ ऐतिहासिक परमाणु आपदाओं की लागत से बहुत कम हैं। जापान में फुकुशिमा परमाणु आपदा की सफाई की लागत $180 बिलियन से अधिक हो चुकी है, जबकि यूक्रेन में चेरनोबिल आपदा के दीर्घकालिक आर्थिक परिणामों की लागत सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुँचती जा रही है।
- नियामक उल्लंघनों के लिए दंड भी बहुत कम हैं, जिनमें अधिकतम एक करोड़ रुपये (लगभग $106,000) का जुर्माना है—यहाँ तक कि गंभीर उल्लंघनों से जुड़े मामलों में भी।
- प्रभावित लोगों द्वारा किसी भी अदालत में कोई दावा दायर नहीं किया जा सकता। अधिनियम मुआवजे के आवेदन दाखिल करने के लिए तीन वर्ष की अवधि भी निर्धारित करता है, जबकि दावा करने के अधिकार की समाप्ति संपत्ति के नुकसान के लिए 10 वर्ष और व्यक्तिगत चोट के लिए 20 वर्ष निर्धारित की गई है।
- परमाणु दुर्घटनाओं की स्थिति में आपराधिक दायित्व के बारे में अधिनियम काफी हद तक मौन है। यह लापरवाही, सुरक्षा संबंधी आँकड़ों में हेरफेर, घटना रिपोर्टों को दबाने या तोड़फोड़ को स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं करता है। आपराधिक जवाबदेही को परिभाषित करने में विफल रहकर, अधिनियम निजी कॉरपोरेट्स को कानूनी कार्रवाई से बचाता है।
- यह अधिनियम दीर्घकालिक परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन और स्थल पर अपशिष्ट निपटान के बारे में काफी हद तक मौन है। भंडारण, निपटान और संयंत्र को बंद करने के लिए वित्तपोषण की स्पष्ट योजनाओं के बिना, निजी तौर पर संचालित परमाणु संयंत्र भविष्य की पीढ़ियों के लिए अनसुलझी रेडियोधर्मी विरासत छोड़ सकते हैं।
- निजीकरण के परमाणु क्षेत्र के श्रमिकों के लिए गंभीर सुरक्षा संबंधी निहितार्थ भी हैं। बड़े बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में निर्माण, रखरखाव और अपशिष्ट प्रबंधन के लिए अक्सर अनौपचारिक ठेका श्रम पर निर्भरता होती है। मजबूत नियामक निगरानी के बिना, इन श्रमिकों को अधिक विकिरण जोखिम और कमजोर सुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है। SHANTI अधिनियम में व्यावसायिक सुरक्षा मानकों, दीर्घकालिक स्वास्थ्य निगरानी, या विकिरण के संपर्क के लिए मुआवजे के बारे में पर्याप्त प्रावधान नहीं हैं।
- हालाँकि अधिनियम परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को वैधानिक दर्जा प्रदान करता है, नियुक्तियाँ परमाणु ऊर्जा विभाग के नियंत्रण में ही रहती हैं, और कोई स्वतंत्र चयन प्रक्रिया नहीं है। नियामक बोर्ड का अधिदेश मुख्यतः तकनीकी सुरक्षा संबंधी प्रश्नों तक सीमित रहता है।
- यह अधिनियम भारत की संघीय संरचना में परमाणु आपदा प्रतिक्रिया से जुड़े प्रश्नों को अनसुलझा छोड़ देता है। यह परमाणु आपात स्थितियों के दौरान केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करता या प्रतिक्रिया और पुनर्बहाली के समन्वय के लिए आवश्यक तंत्रों की रूपरेखा प्रस्तुत नहीं करता।
देश के लोग अभी भी भोपाल गैस त्रासदी और इसके लिए जिम्मेदार लोगों तथा इससे पीड़ित लोगों के साथ क्या हुआ, इसे याद करते हैं। दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक आपदाओं में से एक के लिए यूनियन कार्बाइड और उसके उत्तराधिकारियों को पूरी तरह जवाबदेह ठहराने में हुई विफलता को हम अभी भी याद करते हैं। निजी तौर पर संचालित परमाणु सुविधाओं में संभावित आपदाओं के मामलों में नियामक विफलता, कॉरपोरेट दंडमुक्ति और विलंबित न्याय को लेकर लोगों की आशंकाएँ जायज़ हैं।
नियमों का मसौदा तैयार किए जाने के साथ ही, बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, किसानों और देश की जनता के विरोध के बावजूद SHANTI अधिनियम को लागू किया जा रहा है।
संक्षेप में, SHANTI अधिनियम भारतीय और विदेशी पूंजीपतियों को परमाणु ऊर्जा उत्पादन से मुनाफा कमाने में सक्षम बनाता है, जबकि संभावित परमाणु दुर्घटनाओं के जोखिम और परिणाम हम, भारतीय जनता, भुगतेंगे।
