लोक राज संगठन का बयान, 3 अक्टूबर 2026
(मराठी में बयान हिंदी बयान के बाद पढ़ें)
करोड़ों मज़दूर अपने अलग–अलग अधिकारों पर हो रहे हमलों को लेकर बहुत चिंतित हैं। श्रम कानून उनसे संगठित होने और हड़ताल करने का अधिकार छीन रहे हैं। अब SIR प्रक्रिया के ज़रिए वोट देने के अधिकार पर भी हमला किया गया है। पिछले एक साल में करोड़ों कामकाजी लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। इससे वे लोकतंत्र–विरोधी और जन–विरोधी SIR और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर नाराज़ हैं। कई मांगें उठाई गई हैं। AIFAP के सदस्य संगठनों में से एक, ‘लोक राज संगठन‘ ने पूरी चुनावी प्रक्रिया का अध्ययन किया है और ऐसी मांगें रखी हैं जो मज़दूरों, किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों को चुनावी प्रक्रिया के केंद्र में लाएंगी और इसे उनके प्रति जवाबदेह बनाएंगी। उनका बयान (साथ में संलग्न) सिर्फ़ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की मांग से कहीं आगे के सवाल उठाता है।

वोट देने का अधिकार चुनावी प्रक्रिया की नींव है। फिर भी, डेटाबेस में किसी गलती, नाम की स्पेलिंग में अंतर या पुराने दस्तावेज़ के न होने की वजह से किसी नागरिक को इस अधिकार से वंचित किया जा सकता है। वोटर लिस्ट बनाने वाली संस्था के पास बहुत ज़्यादा ताकत होती है। लेकिन लोगों के पास इस संस्था की निगरानी करने या उसे जवाबदेह ठहराने का कोई असरदार तरीका नहीं है।
हाल की घटनाओं ने इस विरोधाभास को साफ़ तौर पर उजागर किया है। करोड़ों लोगों को वोटर लिस्ट में अपना नाम बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा है। साथ ही, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के फैसलों पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और उन्हें पद से हटाने की मांग की जा रही है। कुछ संगठनों ने उन लोगों के ख़िलाफ़ स्वतंत्र जांच और कार्रवाई की मांग की है जो मतदाताओं के नाम ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से हटाने के लिए ज़िम्मेदार हैं।
ये मांगें जायज़ हैं। परंतु, मौजूदा संकट एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या चुनाव प्राधिकरण को ही पुनर्गठित करके लोगों के नियंत्रण में लाया जाना चाहिए?
वोट देने के अधिकार पर हमला हो रहा है।
‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) के तहत देश भर के नागरिकों को अपनी पात्रता फिर से साबित करनी थी। खबरों के अनुसार, इसके अलग-अलग चरणों के दौरान मतदाता सूची के मसौदा से 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटा दिए गए हैं।
ECI का कहना है कि SIR का मकसद मरे हुए लोगों, एक से ज़्यादा बार रजिस्टर हुए वोटरों, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए लोगों और अयोग्य लोगों के नाम हटाना है। वोटर सूची का सही होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन उन्हें ठीक करने की ज़िम्मेदारी लोगों पर नहीं डाली जा सकती।
जो नागरिक दशकों से वोट देते आ रहे हैं, उन्हें नोटिस मिले हैं क्योंकि उनकी मौजूदा जानकारी पुराने रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती है। उम्र, पते, स्पेलिंग या परिवार की जानकारी में अंतर होने से किसी व्यक्ति का वोट खतरे में पड़ सकता है। प्रवासी मज़दूरों, बुज़ुर्गों, किराएदारों, शादी के बाद नाम बदलने वाली महिलाओं और पुराने रिकॉर्ड न रखने वाले परिवारों को सबसे ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।
बहुत से लोगों को यह नहीं पता है कि उनके नाम हटा दिए गए हैं। दूसरों को अपनी कमाई छोड़कर सरकारी दफ़्तरों के बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। उन्हें यह साबित करना पड़ रहा है कि सरकारी रिकॉर्ड में हुई गलतियाँ उनकी अपनी गलती नहीं हैं।
पश्चिम बंगाल में वोटर सूची से 27.16 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए थे। इनमें से 22.21 लाख लोगों ने नाम वापस जुड़वाने के लिए अपील की। खबरों के मुताबिक, अप्रैल 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सिर्फ़ 1,607 लोगों के नाम ही सूची में वापस जोड़े गए। जो लोग योग्य थे लेकिन वोट नहीं डाल पाए, उन्हें ऐसा नुकसान हुआ जिसकी भरपाई चुनाव के बाद नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के रवैये ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। खबरों के अनुसार, एक न्यायाधीश ने कहा कि जो लोग एक चुनाव में वोट नहीं दे पाए, वे अगले चुनाव में वोट दे सकते हैं। हाल ही में, मुख्य न्यायाधीश ने हजारों लंबित अपीलों की अत्यावश्यकता को यह कहकर खारिज कर दिया कि आने वाले चुनाव “सिर्फ़ उपचुनाव” हैं। एक चुनाव में न मिल पाया वोट दूसरे चुनाव में वापस नहीं मिल सकता। यह इस बात पर ज़ोर देता है कि वोट देने के अधिकार को एक मौलिक और लागू करने योग्य अधिकार के तौर पर मान्यता दी जानी चाहिए।
ऑनलाइन चुनावी पंजीकरण प्रणाली, ECINet नेट ने समस्या को और बढ़ा दिया है। इसने चुनावी जानकारी को एक केंद्रीय डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर ला दिया है। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) अपने निर्वाचन क्षेत्रों की मतदाता सूचियों के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार हैं। फिर भी सॉफ़्टवेयर प्रणाली उन्हें किसी नाम को बहाल करने से रोकती है, जब तक कि केंद्र से अनुमति न दी जाए। ECINet द्वारा जमीनी स्तर के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को त्रुटि सुधारने से रोकने के बाद गोवा के 97 पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया।
तकनीक को लोगों को अपने अधिकारों का प्रयोग करने में सहायता करनी चाहिए। इसे नागरिकों और उनके मतदान के अधिकार के बीच खड़े किसी प्राधिकरण में नहीं बदलना चाहिए।
ECI ने अब SIR के दौरान छूट गए पात्र मतदाताओं को बहाल करने के लिए एक विशेष अभियान की घोषणा की है। इसने ECINet की समीक्षा की भी घोषणा की है। ये उपाय नागरिकों और राजनीतिक संगठनों द्वारा उठाई गई समस्याओं की गंभीरता को दर्शाते हैं। SIR प्रक्रिया को रोका जाना चाहिए। किसी भी चुनाव के आयोजित होने से पहले हर उस पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची में बहाल किया जाना चाहिए जिसे गलत तरीके से बाहर कर दिया गया है।
यह स्थापित करने का दायित्व निर्वाचन प्राधिकरण पर होना चाहिए कि कोई व्यक्ति अपात्र है। पूर्व सूचना, उचित साक्ष्य, सुनवाई और अपील के प्रभावी अधिकार के बिना किसी भी नाम को हटाया नहीं जाना चाहिए। मतदान शुरू होने पर मत देने के अधिकार से संबंधित कोई भी अपील अनिर्णीत नहीं रहनी चाहिए।
मत देने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। इसे हर उस प्राधिकरण के विरुद्ध कानूनी रूप से लागू किया जा सकना चाहिए जो इसे नकारने का प्रयास करता है।
तत्काल सुधार और उनकी सीमाएँ
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री से मिलकर बनी समिति द्वारा किया जाता है। इसलिए सत्तारूढ़ सरकार का चयन समिति के तीन में से दो पदों पर नियंत्रण होता है।
विपक्षी दलों ने मांग की है कि मंत्रिमंडल के मंत्री की जगह भारत के मुख्य न्यायाधीश को रखा जाए। उनका तर्क है कि इससे चयन प्रक्रिया अधिक संतुलित होगी। यह मांग सार्वजनिक चर्चा की हकदार है। हालांकि, यह अपने आप में निर्वाचन आयोग को जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बनाएगी।
चाहे कोई मंत्री या न्यायाधीश चयन समिति में बैठे, नागरिकों की फिर भी आयुक्तों को नामित करने, उनकी जाँच करने या उन्हें मंजूरी देने में कोई भूमिका नहीं होगी। वे किसी सार्वजनिक मंच पर उनसे सवाल नहीं कर सकेंगे या उन्हें वापस नहीं बुला सकेंगे। चुनावी शक्ति लोगों से ऊपर खड़ी एक केंद्रीय संस्था में केंद्रित रहेगी।
ECI की पूरी निर्णय-प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। उसकी बैठकों का एजेंडा और कार्यवृत्त सार्वजनिक किए जाने चाहिए। आयुक्तों के बीच मतभेद दर्ज किए जाने चाहिए। हर महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट कारण दिए जाने चाहिए। मतदाता सूचियों को बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ्टवेयर और डेटाबेस का स्वतंत्र रूप से ऑडिट किया जाना चाहिए।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल ने भी व्यापक अविश्वास पैदा किया है। चुनाव की निष्पक्षता अधिकारियों, निर्माताओं या तकनीकी विशेषज्ञों पर विश्वास पर निर्भर नहीं हो सकती। हर मतदाता यह सत्यापित करने में सक्षम होना चाहिए कि डाला गया वोट सही ढंग से दर्ज और गिना गया है। उम्मीदवारों और नागरिकों को मतगणना के हर चरण को देखने में सक्षम होना चाहिए।
लोक राज संगठन EVM के इस्तेमाल को समाप्त करने और कागजी मतपत्रों की वापसी की मांग करता है। मतपत्रों की अभिरक्षा, उनकी गिनती और परिणामों की घोषणा उम्मीदवारों और जनता के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में खुले तौर पर की जानी चाहिए।
निजी धन भी चुनावों में समानता को नष्ट करता है। कुछ पार्टियों और उम्मीदवारों के पास सैकड़ों करोड़ रुपये, कॉरपोरेट समर्थन, मीडिया नेटवर्क और पेशेवर डिजिटल अभियानों की ताकत होती है। अन्य मुख्यतः स्वैच्छिक कार्य और जनता से सीधे संपर्क पर निर्भर रहते हैं। ऐसी परिस्थितियों में समान अवसर का कोई मैदान नहीं हो सकता।
उम्मीदवारों का निजी वित्तपोषण समाप्त होना चाहिए। निर्वाचन प्राधिकरणों को सभी उम्मीदवारों को बैठक स्थलों, संचार सुविधाओं और मीडिया तक समान पहुँच प्रदान करनी चाहिए। किसी भी उम्मीदवार को राजनीतिक प्रभाव खरीदने में सक्षम नहीं होना चाहिए। राज्य को निर्वाचन प्रक्रिया का वित्तपोषण करना चाहिए।
ये सुधार आवश्यक हैं। लेकिन इन्हें निर्वाचन प्रणाली के व्यापक रूपांतरण का हिस्सा होना चाहिए।
निर्वाचन प्राधिकरण का पुनर्गठन किया जाना चाहिए
निर्वाचन प्राधिकरण का पुनर्गठन किया जाना चाहिए। राज्य, जिला और निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर चुनाव आयोग या समितियाँ होनी चाहिए। प्रत्येक के अधिकार स्पष्ट रूप से परिभाषित होने चाहिए और उन्हें उस स्तर के लोगों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक स्थायी निर्वाचन क्षेत्र समिति होनी चाहिए। इसके सदस्यों को कार्यस्थलों, गाँवों, शहरी मोहल्लों और जन संगठनों से निर्वाचित या प्रतिनिधि के रूप में भेजा जाना चाहिए। उन्हें सीमित अवधि के लिए कार्य करना चाहिए। उनकी बैठकें और निर्णय सार्वजनिक होने चाहिए। लोगों के पास उन्हें वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए।
इन समितियों को निरंतर स्थानीय सत्यापन के माध्यम से मतदाता सूचियों का रखरखाव करना चाहिए। नागरिकों को सूचियों का निरीक्षण करने, गलत तरीके से किए गए नामों के जोड़ या हटाने को चुनौती देने और त्रुटियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से कार्रवाई की मांग करने में सक्षम होना चाहिए।
निर्वाचन क्षेत्र समितियों को निर्वाचन क्षेत्र की जरूरतों और प्राथमिकताओं पर सार्वजनिक चर्चा भी आयोजित करनी चाहिए। उन्हें लोगों को उम्मीदवारों को नामित करने और चुनने में सक्षम बनाना चाहिए।
वर्तमान में, पार्टी नेतृत्व तय करता है कि कौन चुनाव लड़ेगा। मतदाताओं से कहा जाता है कि वे दूसरों द्वारा चुने गए उम्मीदवारों में से चयन करें। यह बदलना चाहिए। राजनीतिक दल अपने कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकते हैं और उम्मीदवारों की सिफारिश कर सकते हैं, लेकिन उन्हें नामांकन पर नियंत्रण नहीं रखना चाहिए।
उम्मीदवार कार्यस्थलों, गांवों, पड़ोसों और जन संगठनों से उभरने चाहिए। नागरिकों को उनके रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए, सार्वजनिक रूप से उनसे सवाल करने चाहिए और तय करना चाहिए कि किसे चुनाव लड़ने की अनुमति दी जानी चाहिए।
नागरिकों की राजनीतिक भूमिका मतदान के बाद समाप्त नहीं हो सकती। निर्वाचित प्रतिनिधियों को नियमित रूप से अपने मतदाताओं को रिपोर्ट देनी चाहिए। जो लोग किसी प्रतिनिधि को चुनते हैं, उन्हें किसी भी समय उस व्यक्ति को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए।
लोगों को कानून बनाने की पहल करने का अधिकार भी होना चाहिए। जनता के एक निर्धारित स्तर के समर्थन वाली किसी प्रस्ताव पर संबंधित निर्वाचित निकाय द्वारा विचार किया जाना चाहिए। समाज को प्रभावित करने वाले प्रमुख प्रश्नों का निर्णय जन परामर्श और जनमत-संग्रह के माध्यम से किया जाना चाहिए।
लोक राज संगठन राजनीतिक अधिकारों से सरोकार रखने वाले सभी नागरिकों और संगठनों से इन प्रस्तावों पर चर्चा करने का आह्वान करता है। वर्तमान संकट का अंत केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त के स्थान पर दूसरे की नियुक्ति या चयन प्रक्रिया में मामूली बदलाव के साथ नहीं होना चाहिए।
निर्वाचन आयोग और पूरी चुनावी प्रक्रिया को जनता के नियंत्रण में लाया जाना चाहिए। लोगों को केवल समय-समय पर मतदान करने वाले और स्थायी याचिकाकर्ता बने रहना बंद करना होगा। उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया के आयोजक, पर्यवेक्षक और निर्णयकर्ता बनना होगा। तभी निर्वाचन आयोग जनता की शक्ति का साधन बन सकता है।
***
निवडणूक आयोग जनतेला उत्तरदायी असलाच पाहिजे
लोक राज संघटन चे निवेदन, ३ ऑक्टोबर २०२६
मतदानाचा अधिकार हा निवडणूक प्रक्रियेचा पाया आहे. असे असूनही, केवळ डेटाबेसमधील त्रुटी, नावाच्या शब्दलेखनातील फरक किंवा एखादे जुने दस्तऐवज (कागदपत्र) उपलब्ध नसणे यांमुळे एखाद्या नागरिकाला या अधिकारापासून वंचित केले जाऊ शकते. मतदार याद्यांसाठी जबाबदार असलेल्या संस्थेकडे प्रचंड अधिकार असतात. परंतु, या संस्थेचे पर्यवेक्षण करण्यासाठी किंवा तिला जाब विचारण्यासाठी लोकांकडे कोणतीही प्रभावी यंत्रणा नाही.
अलिकडच्या घडामोडींमुळे हा विरोधाभास प्रकर्षाने समोर आला आहे. कोट्यवधी लोकांना मतदार यादीतील आपले नाव टिकवून ठेवण्यासाठी मोठा संघर्ष करावा लागला आहे. त्याच वेळी, भारतीय निवडणूक आयोगाच्या (Election Commission of India – ECI) अंतर्गत घेतलेल्या निर्णयांवर गंभीर प्रश्न उपस्थित करण्यात आले आहेत. मुख्य निवडणूक आयुक्त ज्ञानेश कुमार यांच्या राजीनाम्याची आणि त्यांना पदावरून हटवण्याची मागणी केली जात आहे. मतदारांना बेकायदेशीरपणे वगळण्यासाठी जबाबदार असलेल्यांची स्वतंत्र चौकशी आणि त्यांच्यावर कारवाईची मागणी काही संघटनांनी केली आहे।
या मागण्या रास्त आहेत. मात्र, सध्याच्या संकटामुळे एक मोठा प्रश्न निर्माण होतो. निवडणूक प्राधिकरणाचीच पुनर्रचना करून ते लोकांच्या नियंत्रणाखाली आणले पाहिजे का, असा तो प्रश्न आहे?
मतदानाचा हक्क धोक्यात
विशेष सखोल पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रियेअंतर्गत देशभरातील नागरिकांना आपली पात्रता नव्याने सिद्ध करणे आवश्यक होते. मिळालेल्या माहितीनुसार, या प्रक्रियेच्या विविध टप्प्यांमध्ये मसुदा मतदार यादीतून (draft electoral rolls) १३ कोटींहून अधिक नावे आत्तापर्यंत वगळण्यात आली आहेत.
निवडणूक आयोगाच्या (ECI) म्हणण्यानुसार, मृत व्यक्ती, एकापेक्षा जास्त मतदारसंघात नाव असलेले मतदार, कायमस्वरूपी स्थलांतरित झालेले आणि इतर अपात्र व्यक्तींची नावे वगळणे हा SIR चा उद्देश आहे. मतदार याद्या नक्कीच अचूक असायला हव्यात. पण त्या दुरुस्त करण्याची जबाबदारी लोकांवर ढकलली जाऊ शकत नाही.
गेल्या अनेक दशकांपासून मतदान करणाऱ्या नागरिकांना नोटीस पाठवण्यात आल्या आहेत, कारण त्यांची सध्याची माहिती जुन्या कागदपत्रांशी किंवा नोंदींशी जुळत नाहीये. वय, पत्ता, नावाचे स्पेलिंग/शब्दलेखन किंवा कौटुंबिक माहितीमधील फरकामुळे एखाद्या व्यक्तीचे मत धोक्यात येऊ शकते. स्थलांतरित मजूर, वृद्ध लोक, भाडेकरू, लग्नानंतर नावे बदललेल्या महिला आणि जुनी कागदपत्रे नसलेल्या कुटुंबांना सर्वात जास्त अडचणींचा सामना करावा लागतो.
बऱ्याच लोकांना हे माहीतच नाही की त्यांची नावे वगळण्यात आली आहेत. इतरांना आपली रोजीरोटी सोडून शासकीय कार्यालयांच्या फेऱ्या माराव्या लागत आहेत. सरकारी/अधिकृत नोंदींमधील चुका आपल्या नाहीत हे त्यांना सिद्ध करावे लागत आहे.
पश्चिम बंगालमध्ये २७.१६ लाख मतदारांची नावे मतदार यादीतून काढून टाकण्यात आली होती. त्यापैकी २२.२१ लाख मतदारांनी नाव समाविष्ट करण्यासाठी (नाव पुन्हा जोडण्यासाठी) अपील केले. मिळालेल्या माहितीनुसार, एप्रिल २०२६ च्या विधानसभा निवडणुकांपूर्वी केवळ १,६०७ मते पुनर्संचयित करण्यात आली. जे लोक पात्र असूनही मतदान करू शकले नाहीत, त्यांचे असे नुकसान झाले आहे जे निवडणुकीनंतर भरून काढता येणार नाही.
सर्वोच्च न्यायालयाच्या प्रतिसादाने जखमेवर मीठ चोळण्याचे काम केले आहे. एका न्यायाधीशाने असे निरीक्षण नोंदवल्याचे वृत्त आहे की, जे एका निवडणुकीत मतदान करू शकले नाहीत, ते पुढच्या निवडणुकीत मतदान करू शकतील. अलीकडेच, सरन्यायाधीशांनी आगामी निवडणुका “केवळ पोटनिवडणुका” असल्याचे सांगून हजारो प्रलंबित अपीलांची तातडीने सुनावणी करणे निकडीचे आहे हेच फेटाळून लावले. एका निवडणुकीत नाकारलेले मत दुसऱ्या निवडणुकीत परत देता येत नाही. यावरून मतदानाचा हक्क हा एक मूलभूत आणि अंमलबजावणीयोग्य हक्क आहे हे मान्य करण्याची गरज अधोरेखित होते.
ECINet या ऑनलाइन मतदार नोंदणी प्रणालीने समस्येत आणखी भर घातली आहे. या प्रणालीने निवडणुकीची माहिती एका केंद्रीय डिजिटल व्यासपीठावर संकेंद्रित केली आहे. मतदार नोंदणी अधिकारी (EROs) हे त्यांच्या मतदारसंघातील मतदार याद्यांसाठी कायदेशीररित्या जबाबदार असतात. तरीही, केंद्राकडून परवानगी मिळाल्याशिवाय ही सॉफ्टवेअर प्रणाली त्यांना एखादे नाव पुनर्संचयित करण्यापासून रोखू शकते. ECINet ने मतदार नोंदणी अधिकाऱ्यांना (ERO) चूक दुरुस्त करण्यापासून रोखल्यामुळे गोव्यातील ९७ पात्र मतदारांना मतदार यादीतून वगळण्यात आले.
तंत्रज्ञानाने लोकांना त्यांचे हक्क बजावण्यासाठी मदत केली पाहिजे. ते नागरिकांच्या आणि त्यांच्या मतदानाच्या हक्काच्या आड येणारी सत्ता बनता कामा नये.
निवडणूक आयोगाने (ECI) आता SIR दरम्यान वगळलेल्या पात्र मतदारांना पुन्हा समाविष्ट करण्यासाठी एक विशेष मोहीम जाहीर केली आहे. तसेच त्यांनी ECINet चे पुनरावलोकन करण्याची घोषणाही केली आहे. या उपाययोजना नागरिक आणि राजकीय संघटनांनी उपस्थित केलेल्या समस्यांचे गांभीर्य दर्शवतात. SIR प्रक्रिया थांबवलीच पाहिजे. कोणतीही निवडणूक होण्यापूर्वी, चुकीच्या पद्धतीने वगळण्यात आलेल्या प्रत्येक पात्र मतदाराचे नाव मतदार यादीत पुन्हा समाविष्ट केले पाहिजे.
एखादी व्यक्ती अपात्र आहे हे सिद्ध करण्याची जबाबदारी निवडणूक प्राधिकरणावरच असली पाहिजे. पूर्वसूचना, योग्य पुरावा, सुनावणी आणि अपीलाचा (दाद मागण्याचा) प्रभावी अधिकार दिल्याशिवाय कोणतेही नाव वगळण्यात येऊ नये. मतदान सुरू व्हायच्या आगोदर मतदानाच्या अधिकारासंबंधीचे कोणतेही अपील अनिर्णित राहू नये.
मतदानाचा हक्क हा एक मूलभूत हक्क म्हणून मान्य केला गेला पाहिजे. जो कोणी तो नाकारण्याचा प्रयत्न करेल, त्या प्रत्येक प्राधिकरणाविरुद्ध त्याबद्दल कायदेशीर दाद मागता आली पाहिजे.
तात्काळ सुधारणा आणि त्यांच्या मर्यादा
मुख्य निवडणूक आयुक्त आणि इतर दोन निवडणूक आयुक्तांची निवड एका समितीद्वारे केली जाते, ज्यामध्ये पंतप्रधान, लोकसभेतील विरोधी पक्षनेते आणि पंतप्रधानांनी नामांकित केलेले एक केंद्रीय कॅबिनेट मंत्री यांचा समावेश असतो. त्यामुळे, सत्ताधारी पक्षाचे या निवड समितीमधील तीनपैकी दोन जागांवर नियंत्रण असते.
कॅबिनेट मंत्र्यांच्या ऐवजी हिंदुस्थानच्या सरन्यायाधीशांचा (CJI) समावेश करण्यात यावा, अशी मागणी विरोधी पक्षांनी केली आहे. यामुळे निवड प्रक्रिया अधिक संतुलित होईल, असा युक्तिवाद त्यांनी केला आहे. या मागणीवर सार्वजनिक चर्चा होणे आवश्यक आहे. मात्र, यामुळे निवडणूक आयोग जनतेला उत्तरदायी होणार नाही.
निवड समितीवर मंत्री असो वा न्यायाधीश, आयुक्तांचे नामांकन करणे, त्यांच्या पात्रतेची तपासणी करणे किंवा त्यांना मंजुरी देण्यामध्ये नागरिकांची कोणतीही भूमिका नसेल. नागरिक त्यांना सार्वजनिक मंचावर प्रश्न विचारू शकणार नाहीत किंवा त्यांना पदावरून हटवू शकणार नाहीत. निवडणूक सत्ता जनतेच्या वर असलेल्या एका केंद्रीय संस्थेकडेच केंद्रित राहील.
निवडणूक आयोगाची (ECI) संपूर्ण निर्णय प्रक्रिया पारदर्शक असली पाहिजे. त्यांच्या बैठकींची कार्यसूची (अजेंडा) आणि इतिवृत्त (मिनिट्स) सार्वजनिक केले पाहिजेत. आयुक्तांमधील मतभेद नोंदवले गेले पाहिजेत. प्रत्येक महत्त्वाच्या निर्णयामागे स्पष्ट कारणे दिली पाहिजेत. मतदार याद्या अद्ययावत ठेवण्यासाठी वापरले जाणारे सॉफ्टवेअर आणि डेटाबेसचे स्वतंत्रपणे ऑडिट (परीक्षण) केले पाहिजे.
इलेक्ट्रॉनिक मतदान यंत्रांच्या (EVM) वापरामुळे मोठ्या प्रमाणावर अविश्वास निर्माण झाला आहे. निवडणुकीची विश्वासार्हता ही अधिकारी, उत्पादक किंवा तांत्रिक तज्ज्ञांवरील विश्वासावर अवलंबून असू शकत नाही. प्रत्येक मतदाराला, त्याने नोंदविलेले मत योग्यरित्या नोंदवले गेले आहे आणि मोजले गेले आहे, याची पडताळणी करता आली पाहिजे. उमेदवार आणि नागरिकांना मतमोजणीचा प्रत्येक टप्पा पाहता आला पाहिजे.
लोक राज संघटन EVM चा वापर बंद करून कागदी मतपत्रिकांचा वापर पुन्हा सुरू करण्याची मागणी करते. मतपत्रिका ताब्यात घेणे, त्यांची मोजणी आणि निकालांची घोषणा ही सर्व प्रक्रिया उमेदवार आणि लोकप्रतिनिधींच्या उपस्थितीत उघडपणे पार पाडली पाहिजे.
खाजगी पैसा देखील निवडणुकांमधील समानता नष्ट करतो. काही पक्ष आणि उमेदवारांकडे शेकडो कोटी रुपये, कॉर्पोरेट (उद्योग जगताचा) पाठिंबा, माध्यम यंत्रणा (मीडिया नेटवर्क्स) आणि व्यावसायिक डिजिटल प्रचारमोहिमा असतात. तर इतर उमेदवार मुख्यत्वे स्वयंसेवा आणि लोकांशी थेट संपर्कावर अवलंबून असतात. अशा परिस्थितीत सर्व उमेदवारांना समान संधी (लेव्हल प्लेइंग फील्ड) मिळू शकत नाही.
उमेदवारांचे खाजगी अर्थसाहाय्य बंद झाले पाहिजे. निवडणूक अधिकाऱ्यांनी सर्व उमेदवारांना सभांची ठिकाणे, संपर्क सुविधा आणि प्रसारमाध्यमांमध्ये समान प्रवेश उपलब्ध करून दिला पाहिजे. कोणत्याही उमेदवाराला राजकीय प्रभाव विकत घेता येता कामा नये. राज्याने (शासनाने) निवडणूक प्रक्रियेसाठी निधी पुरवला पाहिजे.
या सुधारणा आवश्यक आहेत. परंतु त्या निवडणूक प्रणालीच्या व्यापक परिवर्तनाचा भाग असल्या पाहिजेत.
निवडणूक प्राधिकरणाची पुनर्रचना झालीच पाहिजे
निवडणूक प्राधिकरणाची पुनर्रचना करणे आवश्यक आहे. राज्य, जिल्हा आणि मतदारसंघ पातळीवर निवडणूक आयोग किंवा समित्या असायला हव्यात. प्रत्येकाकडे स्पष्टपणे परिभाषित केलेले अधिकार असले पाहिजेत आणि ते त्या पातळीवरील लोकांना उत्तरदायी असले पाहिजेत.
प्रत्येक मतदारसंघात एक स्थायी मतदारसंघ समिती असली पाहिजे. त्याचे सदस्य कामाच्या ठिकाणांवरून, गावांमधून, शहरी परिसरांमधून आणि लोकसंघटनांमधून निवडून आलेले किंवा नियुक्त केलेले (प्रतिनिधी म्हणून पाठवलेले) असावेत. त्यांनी मर्यादित कालावधीसाठी सेवा बजावली पाहिजे. त्यांच्या बैठका आणि निर्णय सार्वजनिक असले पाहिजेत. त्यांना परत बोलावण्याचा (पदावरून काढून टाकण्याचा) अधिकार लोकांना असला पाहिजे.
या समित्यांनी सतत स्थानिक पडताळणीद्वारे मतदार याद्या अद्ययावत ठेवल्या पाहिजेत. नागरिकांना या याद्यांची तपासणी करता आली पाहिजे, चुकीच्या पद्धतीने नाव जोडण्याला किंवा वगळण्याला आव्हान देता आले पाहिजे आणि चुकांसाठी जबाबदार असणाऱ्या अधिकाऱ्यांवर कारवाईची मागणी करता आली पाहिजे.
मतदारसंघ समित्यांनी मतदारसंघाच्या गरजा आणि प्राधान्यक्रमांवर सार्वजनिक चर्चेचे आयोजनही केले पाहिजे. त्यांनी लोकांना उमेदवार नामनिर्देशित (उभे) करण्याची आणि निवडण्याची संधी उपलब्ध करून दिली पाहिजे.
सध्या, कोण निवडणूक लढवणार हे पक्षाचे नेतृत्व ठरवते. मतदारांना इतरांनी निवडलेल्या उमेदवारांमधून एकाची निवड निवडणुकीत करण्यास सांगितले जाते. हे बदलले पाहिजे. राजकीय पक्ष आपले कार्यक्रम सादर करू शकतात आणि उमेदवारांची शिफारस करू शकतात, परंतु त्यांनी उमेदवारांच्या नामांकनावर नियंत्रण ठेवू नये.
उमेदवार हे कामाच्या ठिकाणांवरून, गावांमधून, परिसरांमधून आणि लोकांच्या संघटनांमधून पुढे आले पाहिजेत. नागरिकांनी त्यांच्या कामाच्या नोंदींची/इतिहासाची तपासणी केली पाहिजे, त्यांना सार्वजनिकरित्या प्रश्न विचारले पाहिजेत आणि निवडणूक लढवण्याची परवानगी कोणाला दिली पाहिजे हे ठरवले पाहिजे.
मतदान केल्यानंतर नागरिकांची राजकीय भूमिका संपू शकत नाही. निवडून आलेल्या प्रतिनिधींनी आपल्या मतदारांना नियमितपणे अहवाल दिला पाहिजे. प्रतिनिधी निवडणाऱ्या लोकांना कोणत्याही वेळी त्या व्यक्तीला परत बोलावण्याचा (पदच्युत करण्याचा) अधिकार असला पाहिजे.
लोकांना कायदे प्रस्थापित करण्याचा किंवा त्यात सुधारणा करण्याचा प्रस्ताव मांडण्याचा अधिकार देखील असला पाहिजे. एका निश्चित पातळीवर जाहीर पाठिंबा मिळालेल्या प्रस्तावावर योग्य अशा लोकप्रतिनिधी संस्थेकडून (निवडून आलेल्या मंडळाकडून) विचार केला गेला पाहिजे. समाजावर परिणाम करणारे महत्त्वाचे प्रश्न सार्वजनिक सल्लामसलत आणि सार्वमताद्वारे ठरवले गेले पाहिजेत.
राजकीय हक्कांबद्दल चिंतीत असलेल्या सर्व नागरिकांना आणि संघटनांना या प्रस्तावांवर चर्चा व विचारविनिमय करण्याचे आवाहन लोक राज संघटन करत आहे. केवळ एका मुख्य निवडणूक आयुक्तांच्या बदलीने किंवा निवड प्रक्रियेत किरकोळ बदल करून सध्याचे संकट संपू नये.
निवडणूक आयोग (ECI) आणि संपूर्ण निवडणूक प्रक्रिया लोकांच्या नियंत्रणाखाली आणली पाहिजे. लोकांनी केवळ ठराविक काळाने मतदान करणारे मतदार आणि कायमचे अर्जदार (याचिकाकर्ते) असणे थांबवले पाहिजे. त्यांनी राजकीय प्रक्रियेचे आयोजक, पर्यवेक्षक आणि निर्णयकर्ते बनले पाहिजे. असे झाले तरच निवडणूक आयोग जनतेच्या सत्तेचे साधन बनू शकेल.
