तमिलनाडु में वस्त्र और फैशन मज़दूरों का संघर्ष

वर्कर्स यूनिटी मूवमेंट के संवाददाता की रिपोर्ट

22 मई को, सेलिब्रिटी फैशन लिमिटेड (CFL) के सौ से ज़्यादा मज़दूरों ने तांबरम स्थित मद्रास एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन (MEPZ) के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी नौकरियां वापस पाने और काम करने की हालतों पर प्रशासन द्वारा किए जा रहे हमलों को वापस लेने की मांग की।

इस संघर्ष का नेतृत्व गारमेंट एंड फैशन वर्कर्स यूनियन (GFWU) कर रहा है। वर्कर्स यूनिटी मूवमेंट और अन्य संगठन भी इस संघर्ष में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रहे हैं।

CFL के प्रबंधन ने अचानक, मज़दूरों – जिनमें से ज़्यादातर महिलाएं हैं – को यह जानकारी दी है कि कंपनी अब तक जो परिवहन सुविधा दे रही थी, उसे बंद कर दिया जाएगा। इसके बजाय, मज़दूरों को हर महीने यात्रा-भत्ता दिया जाएगा और उन्हें अपने परिवहन का इंतजाम खुद करना होगा। इस घोषणा से वे पूरी तरह से हताश हो गए हैं।

महिला मज़दूर, रोजाना चुन्नमपेट (मदुरंतकम के पास) से MPEZ स्पेशल इकोनॉमिक जोन (एसईजे़ड) तक एक तरफ़ का 88 किलोमीटर का सफ़र तय करती हैं। अपनी दयनीय हालत को उजागर करते हुए, प्रदर्शनकारी मज़दूरों ने कहा, “हममें से 100 से ज़्यादा लोग कंपनी की दी हुई इन बसों पर निर्भर हैं, यह एक ऐसी व्यवस्था है जो एक दशक से भी ज़्यादा समय से भरोसे के साथ चल रही है। इस परिवहन सुविधा को वापस लेना छंटनी के बराबर है। बिना किसी समर्पित परिवहन व्यवस्था के इस सफ़र को तय करना, शारीरिक और आर्थिक, दोनों ही तरह से असंभव है। हममें से कई लोग दूर-दराज़ के अंदरूनी गांवों में रहते हैं और उन्हें कंपनी के पिकअप पॉइंट तक पहुंचने के लिए पहले से ही कुछ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। ख़ासकर महिलायें, इस बस सेवा के छिन जाने से बेहद असुरक्षित, ख़तरे में और पूरी तरह से बिना किसी सहारे के रह जाती हैं।“ रोजाना की परिवहन सुविधा को बहाल करना प्रदर्शनकारी मज़दूरों की मुख्य मांगों में से एक है।

मज़दूरों ने यह भी शिकायत की है कि प्रबंधन ने उनके भविष्य निधि (पीएफ) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) का योगदान भी जमा नहीं किया है, जबकि वे नियमित रूप से उनकी मासिक तनख़्वाह से ये रकम काटते रहे हैं। वे पीएफ, ग्रेच्युटी, छंटनी भत्ता और छुट्टी के बदले नकद भुगतान की मांग कर रहे हैं, ताकि अगर परिवहन की कमी के कारण उनमें से कुछ को अपनी नौकरी छोड़ने पर मजबूर होना पड़े, तो उन्हें ये भुगतान मिल सकें।

मज़दूरों को काम की जगह पर, अक्सर शोषण और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। ट्रेड यूनियन से जुड़ने की वजह से, उन्हें प्रबंधन की तरफ़ से डराने-धमकाने का सामना करना पड़ता है। CFL और कई दूसरी वस्त्र कंपनियां, लगातार मज़दूरों की छंटनी कर रही हैं, उन्हें नौकरी से निकाल रही हैं, या मज़दूरों या उनके यूनियन प्रतिनिधियों से सलाह लिए बिना, उन्हें एक फैक्टरी से दूसरी फैक्टरी में ट्रांसफर कर रही हैं।

CFL में हो रहा विरोध प्रदर्शन, तमिलनाडु के पूरे वस्त्र निर्माण क्षेत्र में मज़दूरों की दर्दनाक हालत को उजागर करता है। गारमेंट एंड फैशन वर्कर्स यूनियन के जनरल सेक्रेटरी के मुताबिक, यूनियन, 15 साल से ज़्यादा समय से मज़दूरों के अधिकारों के लिए लड़ रही है और सीएफएल के सैकड़ों मज़दूर यूनियन के सदस्य हैं। फिर भी, कंपनी प्रबंधन और सरकारी अधिकारी, दोनों ही गारमेंट एंड फैशन वर्कर्स यूनियन को मान्यता देने या उससे बातचीत करने से इनकार करते हैं। “वे जान-बूझकर सुलह की प्रक्रिया को लंबा खींचते हैं, जिससे मज़दूर, जिन्हें न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलती, अपने दुखद हाल पर छोड़ दिए जाते हैं।” गारमेंट एंड फैशन वर्कर्स यूनियन ने ऐलान किया है कि वह मज़दूरों की गरिमा और अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।

महिलाओं की एक ट्रेड यूनियन, पेन थोझिललार संगम की सेक्रेटरी ने महिला मज़दूरों की बेहद कमज़ोर हालातों के बारे में बताया: “श्रम-क़ानून, महिला मज़दूरों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। वे फैक्टरी में 9-12 घंटे काम करती हैं, रोज़ 3 से 4 घंटे सफर करती हैं, और इसके अलावा उन पर घर की ज़िम्मेदारियां भी होती हैं। उनमें से कुछ महिलाएं अपने बच्चों से, सिर्फ़ हफ़्ते के आखि़र में ही मिल पाती हैं। महिला मज़दूरों के बच्चों को सही देखभाल न मिलने की वजह से तकलीफ उठानी पड़ती है, वे अक्सर पढ़ाई छोड़ देते हैं या छोटे-मोटे अपराधों में शामिल हो जाते हैं। हाशिए पर पड़े समुदायों से आने वाली महिला मज़दूरों को कैश ट्रांस्फर से मिलने वाली सहायता से ज़्यादा मदद की ज़रूरत है।

GFWU ने मांग की है कि लंबी दूरी से आने वाले ग्रामीण इलाकों के मज़दूरों, ख़ासकर महिलाओं के लिए, काम की जगह पर सुरक्षा से जुड़े नियमों के तहत, कंपनी की तरफ़ से मिलने वाले परिवहन को, नौकरी की एक ज़रूरी और बिना किसी शर्त वाला माना जाना चाहिए। यूनियन ने मांग की है कि CFL द्वारा दी जाने वाली मज़दूरी (पेरोल-रिकॉर्ड) की तुरंत जांच की जाए, ताकि मज़दूरों के पीएफ और ईएसआई में जमा न की गई रकम का पता लगाया जा सके। यूनियन ने, अधिकारियों से GFWU को मान्यता देने और सुलह की प्रक्रिया के लिए एक तय समय सीमा का सख़्ती से पालन करवाने की भी मांग की है। यूनियन ने यह भी मांग की है कि मज़दूरों की छंटनी या उन्हें नौकरी से निकाले जाने की स्थिति में, उन्हें पीएफ, ग्रेच्युटी और बाक़ी बची रकम का भुगतान अनिवार्य रूप से किया जाए। मज़दूरों का बीमा भी होना चाहिए, जिसका प्रीमियम कंपनी प्रबंधन को देना चाहिए। यूनियन ने मांग की है कि सरकार का श्रम-विभाग, श्रम कल्याण कोष का इस्तेमाल करके, मुश्किल हालातों में काम करने वाली महिला मज़दूरों को आर्थिक मदद दे।

यूनियन ने यह बात भी उठाई है कि जो कंपनियां, मज़दूरों के सामाजिक सुरक्षा भुगतानों के नियमों का उल्लंघन करती हैं, उन्हें सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए और उन्हें किसी भी तरह की सब्सिडी या वित्तीय प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए।

CFL के मज़दूरों का यह संघर्ष, वस्त्र मज़दूरों और अस्थायी अनुबंधों पर काम करने वाले अन्य मज़दूरों के अपने अधिकारों के लिए चल रहे संघर्ष में एक अहम क़दम है।

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