मज़दूर एकता कमेटी द्वारा आयोजित बैठक की रिपोर्ट

मज़दूर एकता कमेटी (MEC) ने ‘उद्योग’ की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट के हाल ही के फै़सले और मज़दूरों के अधिकारों के संघर्ष पर इसके प्रभाव पर एक चर्चा आयोजित की। इस बैठक में, दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और देश के कई अन्य हिस्सों से ट्रेड यूनियनों और मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
MEC की ओर से, कॉमरेड बिरजू नायक ने बैठक का संचालन किया। उन्होंने सहभागियों का स्वागत किया और MEC के कॉमरेड प्रकाश राव से इस विषय पर अपने विचार रखने को कहा।
चर्चा का मक़सद बताते हुए, कॉमरेड प्रकाश राव ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में, वर्तमान क़ानूनों में, यह साफ़ तौर पर परिभाषित नहीं किया गया है कि मज़दूर कौन है और मज़दूर के अधिकार क्या हैं। मौजूदा व्यवस्था द्वारा, श्रम से जुड़े क़ानूनों और अदालतों की भूमिका के बारे में, मज़दूरों के बीच कई तरह की गलतफ़हमियां फैलाई जाती हैं, ताकि मज़दूर एक ऐसी नई व्यवस्था के लिए संघर्ष न करें जिसमें उनके अधिकारों की गारंटी हो। उन्होंने कहा कि MEC का मानना है कि मज़दूर वर्ग के अधिकारों के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध मज़दूर संगठन, मज़दूरों को मौजूदा व्यवस्था के बारे में सच बताएं और यह भी बताएं कि अपने अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए मज़दूर वर्ग को क्या करने की ज़रूरत है।
कॉमरेड प्रकाश राव ने समझाया कि बैंगलोर वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड का मामला, औद्योगिक विवाद अधिनियम (आईडी एक्ट) 1947 यानी औद्योगिक विवाद कानून, के दायरे की परिभाषा से जुड़ा था। 1972 में, बोर्ड के मज़दूरों ने लेबर-कोर्ट में, अनुशासनात्मक जुर्माने लगाने की प्रक्रिया को चुनौती दी। प्रबंधन ने तर्क पेश किया कि बोर्ड कोई ‘उद्योग’ नहीं है और इसलिए आईडी एक्ट के दायरे में नहीं आता है। लेबर कोर्ट और हाई कोर्ट के, प्रबंधन के ख़िलाफ़ फै़सला सुनाने के बाद, मामला सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया। 1978 में, सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने यह माना कि बोर्ड, आईडी एक्ट की धारा 2(र) के तहत एक उद्योग है और इसके लिए, एक “ट्रिपल टेस्ट” (तीन-स्तरीय जांच) तय किया। इस जांच के अनुसार, उद्योग वह है जिसमें (1) व्यवस्थित गतिविधियां, (2) नियोक्ता और मज़दूर के बीच सहयोग, और (3) मानवीय ज़रूरतों को पूरा करने वाले सामान या सेवाओं का उत्पादन या वितरण शामिल हो, और जिसमें पूरी तरह से आध्यात्मिक या धार्मिक सेवाएं शामिल नहीं हैं। इस संदर्भ में, मुनाफ़ा कमाने का मक़सद मायने नहीं रखता, और सार्वजनिक या धर्मार्थ संस्थान भी इसमें शामिल किये जा सकते हैं।
यह फ़ैसला ऐसे समय में आया था जब 60 और 70 के दशक में, मज़दूरों के ज़ोरदार संघर्ष हो रहे थे। कई नए सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम स्थापित किए जा रहे थे। इन उद्यमों के साथ-साथ विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, स्कूलों आदि में शिक्षक, डॉक्टर आदि, खुद को यूनियनों में संगठित कर रहे थे। जब इन जगहों पर संघर्ष शुरू हुए, तो अदालतों ने अलग-अलग फै़सले दिए, कभी किसी फ़ैसले ने किसी विश्वविद्यालय या अस्पताल या सरकारी विभाग को आईडी एक्ट के तहत उद्योग घोषित किया, तो में कभी किसी अन्य फै़सले के तहत उन्हें उद्योग नहीं माना।
सत्ताधारी पूंजीपति वर्ग चाहता था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम, बड़े पैमाने के उद्योग और सेवाएं, सरकारी अस्पताल और विश्वविद्यालय बिना किसी रुकावट के सुचारू रूप से काम करें। उसे यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत थी कि इन उद्यमों और संस्थानों में संघर्ष, एक निश्चित सीमा के भीतर रहें। 1978 के सुप्रीम कोर्ट के फै़सले को, जिसमें कहा गया था कि औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 (आईडी एक्ट) सेना, पुलिस और कुछ अन्य क्षेत्रों को छोड़कर, अधिकांश सभी सरकारी संस्थानों पर लागू होगा, इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए।
MEC की प्रस्तुति ने स्पष्ट किया कि आईडी एक्ट 1947, जो किसी उद्यम में मज़दूरों और मालिकों के बीच संबंधों को नियंत्रित करता है, पूंजीवादी राज्य के हाथों में, एक ऐसा हथियार रहा है जिसने मज़दूरों को, उनके अधिकारों के लिए लड़ने के निश्चित साधनों से वंचित किया है। साथ ही, यह धारणा भी बनाई गई है कि आईडी एक्ट मज़दूरों के फ़ायदे के लिए बनाया गया है।
आईडी एक्ट मज़दूरों पर कई तरह की शर्तें थोपता है ताकि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ न सकें। मज़दूरों और प्रबंधन के बीच किसी भी विवाद को सबसे पहले लेबर कोर्ट में ले जाना पड़ता है। हड़ताल पर जाने से पहले उन्हें मालिकों को नोटिस देना होता है। हड़तालों को, आसानी से “गैर-कानूनी” घोषित किया जा सकता है और मज़दूरों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। प्रबंधन, मज़दूरों की यूनियनों और उनके संघर्ष को कुचलने के लिए उन्हें निलंबित कर सकता है या उन्हें नौकरी से भी निकाल सकता है। लेबर कोर्ट में मामले सालों-सालों तक खिंच सकते हैं। अगर लेबर कोर्ट, कभी मज़दूर के पक्ष में फैसला सुनाता भी है, तो प्रबंधन उसे ऊपरी अदालतों में ले जाकर, उस फै़सले को चुनौती दे सकता है और उसे लागू करने से इनकार कर सकता है। मज़दूर कभी न ख़त्म होने वाली इस क़ानूनी लड़ाई में फंस कर रह जाते हैं। आईडी एक्ट, बड़े पैमाने पर उद्योगों और सेवा क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों के लिए, हड़ताल को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना बहुत ही मुश्किल बना देता है।
साथ ही, आईडी एक्ट का इस्तेमाल, पूंजीपति वर्ग ने बड़े उद्योगों और सेवा क्षेत्र में वर्गों के बीच सुलह सुनिश्चित करने के लिए किया है। जब भी किसी ख़ास क्षेत्र में मज़दूरों के बड़े संघर्ष की संभावना होती है, तो सरकार, प्रबंधन और यूनियनों के बीच समझौता कराने के लिए दखल दे सकती है। मज़दूरों की कई ट्रेड यूनियनें, जिन्होंने इस व्यवस्था में अपनी जगह बना ली है, मज़दूरों को मौजूदा व्यवस्था से बांधे रखती हैं, प्रबंधन से कुछ मामूली फ़ायदों के लिए मोल-भाव करती हैं और मज़दूरों को एक नए समाज के लिए लड़ने से रोकती हैं।
1978 और 2026 के बीच, सुप्रीम कोर्ट के फै़सले के बाद के विवादों में एक यह सवाल उठा कि क्या सोशल फॉरेस्ट्री (सामाजिक वाणिकी) जैसी कल्याणकारी गतिविधियां, “उद्योग” की श्रेणी में आती हैं या नहीं। 2020 में, केंद्र सरकार ने तीन श्रम-कानूनों-यानी ट्रेड यूनियन एक्ट 1926, स्थाई आदेश अधिनियम 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947-को मिलाकर एक नया क़ानून बनाया – जिसका नाम है – औद्योगिक संबंध संहिता-(आईआर कोड), 2020। आईआर कोड 2020, पिछले क़ानूनों की तरह ही, मज़दूरों को उनके अधिकारों के लिए लड़ने के सुनिश्चित तरीक़ों से वंचित करता है। हालांकि इसके तहत ‘उद्योग’ की परिभाषा में, 1978 के सुप्रीम कोर्ट के फै़सले को शामिल किया गया है, लेकिन इसमें चौरिटेबल और परोपकारी संस्थाओं, सरकार के संप्रभु कार्यों (जैसे डिफेंस रिसर्च, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष), घरेलू सेवाओं और किसी भी ऐसी गतिविधि को बाहर रखा गया है जिसे केंद्र सरकार स्पष्ट रूप से नोटिफाई करके बाहर कर सकती है।
20 अगस्त 2026 को फै़सला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने कहा कि आईडी एक्ट के तहत चल रहे पुराने विवादों (कोर्ट के मुक़दमों) में 1978 की परिभाषा का इस्तेमाल जारी रहेगा, जबकि नए विवाद, आईआर कोड 2020 के तहत आएंगे। कोर्ट ने, आईआर कोड 2020 के तहत, नई परिभाषा की विस्तार से जांच नहीं की। कोर्ट ने बताया कि राज्य के संप्रभु कार्यों का फै़सला सरकार करेगी, जो भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में होगा।
प्रस्तुति में इस बात को फिर से दोहराया गया कि न तो आईडी एक्ट 1947, न ही 1978 का सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला, न ही आईआर कोड 2020 और न ही 2026 का सुप्रीम कोर्ट का फै़सला, मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। यह तय करने की लड़ाई कि “मज़दूर” कौन है और मज़दूरों के अधिकारों को लागू करवाने का संघर्ष जारी है। कॉमरेड प्रकाश राव ने बताया कि यह संघर्ष, पूंजीपति वर्ग के शासन की जगह मज़दूरों-किसानों का राज स्थापित करने के नज़रिए से लड़ा जाना चाहिए।
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की जनरल सेक्रेटरी कॉमरेड अमरजीत कौर ने 1978 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में “उद्योग” की परिभाषा और 2026 के फै़सले के असर के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि आईआर कोड 2020 हमारे देश के 90 प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूरों को यूनियन बनाने, हड़ताल करने और एक सम्मानजनक जीवन-यापन योग्य वेतन, पेंशन और दूसरे फ़ायदों के अधिकारों से वंचित करता है। उन्होंने बताया कि निर्माण क्षेत्र से जुड़े मज़दूर, आंगनवाड़ी और आशा मज़दूर, मिड-डे मील मज़दूर, गिग-मज़दूर, घरेलू मज़दूर और कई अन्य लोग, मज़दूर के तौर पर अपनी पहचान और अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, और उन्होंने एकजुट होकर संघर्ष को तेज़ करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
अपने अधिकारों के लिए संघर्ष में मज़दूरों के सामने पेश आने वाली समस्याओं पर ज़ोरदार चर्चा हुई।
सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) के कॉमरेड वीरेंद्र गौड़ ने आईआर कोड 2020 के बारे में विस्तार से बताया और कहा कि कैसे मज़दूर वर्ग के एक बहुत बड़े हिस्से को सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता है। उन्होंने सरकार की उन कोशिशों की कड़ी निंदा की जिनमें मज़दूरों को यूनियन बनाने और हड़ताल करने के अधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने बताया कि मौजूदा क़ानून और अदालतें मज़दूर-विरोधी हैं और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष में, मज़दूर वर्ग के सभी हिस्सों की और ज़्यादा एकजुटता जुटाने का आह्वान किया।
कामगार एकता कमेटी के श्री गिरीश ने बताया कि कैसे पूंजीपति वर्ग जानबूझकर मज़दूरों को “कैप्टन”, “पार्टनर“, “मैनेजर” जैसे अलग-अलग नाम देता है ताकि मज़दूर के तौर पर उनकी पहचान छिपाई जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि 1947 के आईडी एक्ट और मौजूदा आईआर कोड का असली मक़सद, मज़दूरों को न्याय देना नहीं है, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने के साधनों से वंचित करना है और यह सुनिश्चित करना है कि पूंजीपति “शांतिपूर्वक” मज़दूरों का शोषण करते रहें। उन्होंने बताया कि हमें इस हक़ीक़त के बारे में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि मौजूदा व्यवस्था के तहत, मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है। उन्होंने एक ऐसी नयी व्यवस्था को स्थापित करने के मक़सद से एकजुट संघर्ष का आह्वान किया जिसमें मज़दूरों के अधिकारों को हक़ीक़त में सुनिश्चित किया जा सके और उनकी रक्षा की जा सके।
स्व-रोज़गार महिला संघ -सेल्फ एम्प्लॉयड वीमेन एसोसिएशन (SEWA) की लता ने स्ट्रीट-वेंडर, स्कीम-मज़दूर, घरेलू-कामगार, गिग-मज़दूर और असंगठित क्षेत्र के अन्य मज़दूरों के संघर्ष के बारे में बताया, जो मज़दूर के तौर पर अपनी पहचान और अपने अधिकारों की मान्यता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
राजस्थान में शिक्षकों और मज़दूरों के अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से लड़ने वाले श्री हनुमान प्रसाद शर्मा ने विस्तार से बताया कि कैसे हर क़दम पर मेहनतकश लोगों को न्याय से वंचित रखा जाता है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हमें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष को और तेज़ करना चाहिए, और इस गलतफ़हमी में नहीं रहना चाहिए कि अदालतें मेहनतकश लोगों को न्याय दिलाएंगी।
“वर्कर्स यूनिटी मूवमेंट” के श्री भास्कर ने कई उदाहरण देकर समझाया कि कैसे आईआर कोड 2020, ज़्यादातर मज़दूरों को सम्मानजनक जीवन-यापन योग्य वेतन और काम की सुरक्षित हालातों के अधिकार से वंचित करता है, और इसके साथ ही उनके लिए संगठित होना और अपने अधिकारों के लिए लड़ना बहुत मुश्किल बना देता है। उन्होंने बताया कि जब मज़दूर, पूंजीपतियों की जगह, खुद शासक बनेंगे, तभी वे अपने अधिकारों को सुनिश्चित कर पाएंगे।
प्रस्तुति के दौरान कई मुद्दे सामने आए, जिन पर सहभागियों ने स्पष्टीकरण मांगा। कुछ सवाल इस प्रकार थे: (1) जब मज़दूरों का अनुभव यह बताता है कि लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिलता, तो वे अदालतों पर कितना भरोसा कर सकते हैं? (2) क्या अदालतें, पूंजीपतियों और मज़दूरों के बीच विवादों में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभा सकती हैं, या वे केवल कार्यपालिका के फै़सलों पर मुहर लगाती हैं? (3) मज़दूर वर्ग के भारी विरोध के बावजूद चार लेबर कोड (श्रम कानून) पारित किए गए। मज़दूरों की आवाज को क्यों नज़रंदाज़ किया गया? (4) क्या इस आम धारणा में कोई सच्चाई है कि पहले के अदालती फै़सले मज़दूरों के ज़्यादा पक्ष में होते थे, जबकि आजकल ऐसा नहीं है? (5) मज़दूर कौन है, इस बारे में भ्रम पैदा करने के लिए अलग-अलग नामों -जैसे पार्टनर, एग्जीक्यूटिव, ऑफिसर, मैनेजर, का इस्तेमाल किया जाता है। इसका मक़सद क्या है?
कॉमरेड प्रकाश राव ने स्पष्ट किया कि जो कोई भी अपनी शारीरिक या मानसिक श्रम-शक्ति को बेचकर आजीविका कमाता है, वह मज़दूर है। हालांकि, श्रम-क़ानूनों के अनुसार, मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा इससे बाहर रखा गया है, जैसे सेना, पुलिस और अन्य सरकारी सेवाओं में काम करने वाले लोग। एक निश्चित वेतन से ज़्यादा कमाने वालों को मज़दूर नहीं माना जाता। आईटी उद्योग, ऐप-आधारित काम, स्कीम-मज़दूर और कई अन्य क्षेत्रों में काम करने वालों को भी मज़दूर ही नहीं माना जाता।
हर मज़दूर को ऐसा वेतन मिलना चाहिए जिससे वह सम्मानजनक जीवन जी सके, साथ ही गारंटीकृत पेंशन, स्वास्थ्य सेवा, मातृत्व और शिशु देखभाल की सुविधाएं, बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा, उचित आवास और साफ़-सुथरी रहने की सुविधायें मिलनी चाहिएं। हालांकि, आबादी का एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद मज़दूरों को इन सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता है।
उन्होंने समझाया कि मौजूदा व्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसके ज़रिए पूंजीपति वर्ग हमारे लोगों के विशाल बहुमत पर शासन करता है। संसद, अदालतें और क़ानून सभी इस शासन को वैधता प्रदान करते हैं। 1947 से लेकर आज तक उन्होंने हमेशा ऐसा ही किया है। वे उस राज-तंत्र का हिस्सा हैं जिसके माध्यम से पूंजीपति वर्ग अपना शासन चलाता है और मज़दूर वर्ग का शोषण करता है। वे मज़दूरों के हितों की रक्षा करने वाले साधन नहीं हैं। यह ज़रूरी है कि हममें से हर कोई इस चेतना को मज़दूरों के व्यापक हिस्से तक पहुंचाए।
हम मज़दूरों को इस व्यवस्था को बदलकर एक ऐसी व्यवस्था लाने के लिए संघर्ष करना चाहिए जिसमें मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकश लोगों के अधिकारों की गारंटी हो और उन्हें लागू किया जा सके। उन्होंने अपनी बात ख़त्म करते हुए कहा कि हमें यह संघर्ष, पूंजीपति वर्ग के शासन की जगह मज़दूरों-किसानों का राज स्थापित करने के नज़रिए से लड़ना चाहिए।
कॉमरेड बिरजू ने चर्चा का समापन किया। उन्होंने इस बेहद-अहम मुद्दे पर अपने विचार रखने के लिए सभी सहभागियों का धन्यवाद किया। उन्होंने शोषण और अन्याय की मौजूदा व्यवस्था को बदलकर एक ऐसी नई व्यवस्था लाने के लिए एकजुट संघर्ष को तेज़ करने का आह्वान किया, जिसमें सभी मज़दूरों के अधिकारों की गारंटी हो।
