भारतीय रेलवे के लोको रनिंग स्टाफ 15 मई को देशभर में नॉन-एसी लोकोमोटिव केबिनों के अंदर अत्यधिक गर्मी के खिलाफ ‘मुंडी गरम’ प्रदर्शन करेंगे

कामगार एकता कमेटी (KEC) संवाददाता की रिपोर्ट

भारतीय रेलवे के लोको पायलट (LP) और सहायक लोको पायलट (ALP) भीषण गर्मी के दौरान नॉन-एसी लोकोमोटिव केबिनों के अंदर असहनीय गर्मी की स्थिति के विरोध में 15 मई को देशभर में ‘मुंडी गरम’ प्रदर्शन करेंगे। ‘मुंडी गरम’ का तात्पर्य लोकोमोटिव केबिनों के अंदर सहन की जाने वाली भीषण गर्मी से है।

ऑल-इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (AILRSA) द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य ‘अमानवीय कार्य परिस्थितियों’ की ओर ध्यान आकर्षित करना है, जो लोको रनिंग स्टाफ के स्वास्थ्य और रेल संचालन की सुरक्षा दोनों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हैं।

भारतीय रेलवे के पास वर्तमान में लगभग 15,000 लोकोमोटिव हैं, लेकिन इनमें से आधे से भी कम में एयर कंडीशनिंग सिस्टम लगे हैं, और इनमें से कई यूनिटें निष्क्रिय पड़ी हैं। AILRSA के अध्यक्ष राम राज भगत ने बताया, “स्थिति बेहद खराब है। जब भी हम मरम्मत के लिए रखरखाव विभाग से संपर्क करते हैं, तो हमें बताया जाता है कि बजट उपलब्ध नहीं है।”

AILRSA के केंद्रीय अध्यक्ष राम शरण ने कहा कि लोको पायलटों को असहनीय तापमान में ट्रेनें चलाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि रेलवे अधिकारियों से बार-बार अपील करने के बावजूद कोई खास प्रतिक्रिया नहीं मिली है। उन्होंने कहा, “गर्मी के चरम मौसम में, जब बाहर का तापमान 40-45 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है, तो इंजन और लोकोमोटिव बॉडी के कारण लोकोमोटिव केबिन के अंदर का तापमान और भी बढ़ जाता है। कई मामलों में यह 50 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर चला जाता है। ऐसी परिस्थितियों में ट्रेन चलाना किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए बेहद मुश्किल है।”

अत्यधिक गर्मी के लंबे समय तक संपर्क में रहने से लोको पायलटों में थकान, निर्जलीकरण, सिरदर्द, उल्टी, कमजोरी और एकाग्रता में कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। ऐसी स्थितियां न केवल लोको पायलटों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा करती हैं, बल्कि लंबी दूरी की रेल यात्राओं के दौरान परिचालन सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बढ़ाती हैं।

चिकित्सा विशेषज्ञों ने भी लोकोमोटिव केबिन के अंदर अत्यधिक गर्मी के लंबे समय तक संपर्क में रहने से जुड़े जोखिमों पर चिंता व्यक्त की है। लोकोमोटिव केबिन के अंदर गैर-इंसुलेटेड धातु की छतें गर्मी के संपर्क को और बढ़ा देती हैं और हीटस्ट्रोक, निर्जलीकरण, तीव्र हृदय गति और संज्ञानात्मक हानि जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती हैं। एक डॉक्टर ने कहा, ”सबसे खतरनाक प्रभावों में से एक हीटस्ट्रोक है, जिसमें शरीर की शीतलन प्रणाली विफल होने लगती है। यदि कोई ड्राइवर मधुमेह या हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित है तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।”

एक अन्य डॉक्टर ने चेतावनी दी कि अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने से ड्राइवरों में इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, चक्कर आना, चिंता और एकाग्रता में कमी भी हो सकती है।

रेलवे स्टाफ नेताओं ने कहा कि भारतीय रेलवे के कई क्षेत्रों में तेजी से आधुनिकीकरण के बावजूद, फ्रंटलाइन रनिंग स्टाफ की कार्य स्थितियों की उपेक्षा जारी है। एक वरिष्ठ लोको पायलट ने बताया कि ड्यूटी के दौरान कई ड्राइवरों को नियमित रूप से निर्जलीकरण, पेट की बीमारियों और सिरदर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, हालांकि ऐसे कई मामले आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होते। उन्होंने कहा, ”अगर कोई ड्राइवर ट्रेन चलाते समय ध्यान खो देता है या घबराहट महसूस करता है, तो यह एक गंभीर मामला बन जाता है, क्योंकि इसका सीधा असर ट्रेन के संचालन और सुरक्षा पर पड़ता है।”

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