सार्वजनिक क्षेत्र और सार्वजनिक सेवाओं पर जनआयोग का बयान (PCPSPS)

जनआयोग ने विदेशी AI/डेटा सेंटरों को दी गई रियायतों की समीक्षा करने की मांग की
तारीख: 26.06.2026
क्लाउड कंप्यूटिंग के लिए ज़रूरी AI/डेटा सेंटर, पानी और बिजली की बहुत ज़्यादा खपत के लिए जाने जाते हैं। एक GW का डेटा सेंटर हर साल 11.4 TWH बिजली और 8.1 अरब लीटर पानी की खपत करता है। अगर बिजली की आपूर्ति ज़्यादातर कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्र से होती है (जैसा कि भारत में होता है), तो एक GW का डेटा सेंटर वातावरण में 8.1 अरब टन कार्बन छोड़ता है। इसके अलावा, डेटा सेंटर प्रदूषण भी फैलाते हैं।
हाल ही में, दुनिया भर में बड़े AI/डेटा सेंटर बनाने की होड़ मची हुई है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, अगले दस सालों में डेटा सेंटरों की कुल ग्लोबल क्षमता 200 GW तक पहुँच जाएगी, जिसमें से 50% संयुक्त राज्य अमेरिका में, 30% एशिया-पैसिफिक में और बाकी भारत समेत दूसरे इलाकों में बनेंगे।
डेटा सेंटर की क्षमता में इतनी तेज़ी से बढ़ोतरी का मतलब है कि इसमें खरबों डॉलर का निवेश किया जाएगा, जबकि इससे मिलने वाले वित्तीय वापसी के बारे में कोई पक्का भरोसा नहीं है। इसलिए, यह मुमकिन है कि डेटा सेंटर का यह बूम भी एक और ऐसा ‘ बुलबुला’ साबित हो जो आगे चलकर फूट जाएगा।
स्थानीय जल संसाधनों और बिजली की आपूर्ति पर इनके बुरे असर को देखते हुए, अमेरिका और यूरोप में स्थानीय समुदाय इनके लगाए जाने का विरोध कर रहे हैं। अमेरिका के कुछ राज्यों में, स्थानीय सरकारें डेटा सेंटरों पर बिजली और पानी के लिए ज़्यादा शुल्क लगा रही हैं।
ज़्यादातर अमेरिकी IT कंपनियाँ पेंटागन के साथ मिलकर काम करती हैं। US क्लाउड अधिनियम और डेटा से जुड़े दूसरे कानूनों के तहत, अमेरिकी सरकार के पास यह अधिकार है कि वह किसी भी अमेरिकी कंपनी को—चाहे वह अमेरिका में हो या किसी दूसरे देश में—अपने पास मौजूद डेटा का एक्सेस देने के लिए मजबूर कर सके।
यूरोप में, इस डर को देखते हुए कि अमेरिकी डेटा सेंटर डेटा संप्रभुता के लिए खतरा बन सकते हैं, सदस्य देश यूरोपीय क्लाउड सेवाओं के विकास को बढ़ावा देने और अमेरिकी कंपनियों से डेटा संप्रभुता की रक्षा के लिए नियम लागू कर रहे हैं।
अमेरिका में डेटा सेंटर बनाने के खिलाफ़ स्थानीय लोगों के विरोध के कारण, गूगल जैसी अमेरिकी IT कंपनियाँ अपने डेटा सेंटर परियोजनाओं को भारत जैसे देशों में ले जा रही हैं, जहाँ डेटा संप्रभुता के कानून अपर्याप्त हैं, पर्यावरण संबंधी नियम कमज़ोर हैं और सांठ-गांठ वाला पूँजीवाद बड़े पैमाने पर फैला हुआ है।
आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में नेता उन्हें बहुत कम कीमत पर ज़मीन, बिजली और पानी देने के साथ-साथ पूंजीगत सब्सिडी,कर में छूट और दूसरी तरह की मदद देने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, केंद्रीय वित्त मंत्री ने अपने 2026 के बजट भाषण में खास तौर पर “विदेशी” डेटा सेंटरों के लिए 2047 तक कर अवकाश दिन का ऐलान किया – यह एक ऐसा कदम है जो घरेलू कंपनियों के साथ भेदभाव करता है और डेटा स्टोरेज और AI प्रोसेसिंग में घरेलू क्षमताएं विकसित करने की ज़रूरत के खिलाफ है। GW विदेशी डेटा सेंटर क्षमता के लिए, इसका मतलब है कुल मिलाकर 95,000 करोड़ रुपये का राजस्व का नुकसान। पहले से ही, हालिया बजट के अनुबंध 7 से यह साफ है कि बड़े व्यवसाय को कर में कई तरह की छूट मिलने की वजह से, भारत में बड़े व्यवसाय द्वारा चुकाई जाने वाली औसत प्रभावी टैक्स दर छोटे बिज़नेस की तुलना में कम है। इस लिहाज़ से, विदेशी डेटा सेंटरों के लिए घोषित टैक्स हॉलिडे प्रतिगामी है।
उम्मीद है कि 2030 तक भारत में लगभग 17 GW डेटा सेंटर क्षमता तैयार हो जाएगी। इनमें से ज़्यादातर को अमेरिकी IT कंपनियाँ, अडानी, रिलायंस और TCS जैसी घरेलू कंपनियों के साथ मिलकर बनाएंगी। इतनी डेटा सेंटर क्षमता के लिए 194 TWH बिजली की ज़रूरत होगी, जो 2030 तक दिल्ली की बिजली की ज़रूरत से 4 गुना ज़्यादा होगी। इसी तरह, 2030 तक इसके लिए 138 अरब लीटर पानी की ज़रूरत होगी, जो उस साल दिल्ली की पानी की ज़रूरत से 15-18 गुना ज़्यादा होगा। 17 GW क्षमता वाले डेटा सेंटरों का कार्बन पदछाप 2030 तक दिल्ली के कार्बन पदछाप के बराबर होगा।
1 GW के डेटा सेंटर के लिए 600-800 एकड़ ज़मीन की ज़रूरत होती है। अगर खेती लायक ज़मीन डेटा सेंटरों को दी जाती है, तो यह देखते हुए कि हमारे देश में प्रति व्यक्ति खेती लायक ज़मीन का इस्तेमाल 0.3 एकड़ है, 17 GW डेटा-सेंटर क्षमता से 30,000 से ज़्यादा छोटे किसान जिनमें ज़्यादातर दलित हैं अपनी ज़मीन और रोज़ी-रोटी से बेदखल हो जाएंगे। उन्हें शायद ही कभी इतना मुआवज़ा मिलता है जो उनकी रोज़ी-रोटी के नुकसान की भरपाई कर सके।
विशाखापत्तनम में, AI/डेटा सेंटर चलाने वाली एक विदेशी कंपनी को सौंपी गई दो निर्माण-स्थान वन भूमि पर हैं। इनमें से एक निर्माण-स्थान MOEF (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय) द्वारा घोषित ‘इको-सेंसिटिव ज़ोन’ (पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र) में आती है। विशाखापत्तनम के बीचों-बीच डेटा सेंटर के लिए दी गई ज़मीन ऐसी जगह पर है कि अगर वहाँ कोई ढांचा खड़ा किया जाता है, तो वह शहर के निवासियों को पीने का पानी आपूर्ति करने वाले अहम स्रोत, ‘मुडासरलोवा जलाशय’ में पानी के बहाव को रोक देगा। जलाशय के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद उस साइट पर निर्माण होने से जलाशय में गाद (silt) जमा होगी, जिससे लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराने की इसकी क्षमता और भी कम हो जाएगी। साथ ही, वह डेटा सेंटर जलाशय में जमा पानी में अपने प्रदूषक तत्व भी मिलाएगा, जिससे लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ेगा।
इस बात को ध्यान में रखते हुए कि केंद्र और राज्य सरकारें डेटा सेंटर बनाने वाली IT कंपनियों को भारी छूट दे रही हैं, इसका मतलब यह है कि जिन छोटे ज़मीन मालिकों की ज़मीन ज़बरदस्ती ली जाती है और जो कर देने वाले लोग हैं, वे गूगल जैसी उन IT कंपनियों के कामकाज के लिए सब्सिडी दे रहे होंगे जो हर साल खरबों डॉलर का मुनाफ़ा कमाती हैं।
रोज़गार के मौकों की बात करें तो, एक GW डेटा सेंटर ज़्यादा से ज़्यादा 1000 नौकरियां ही दे सकता है। इन अमेरिकी IT कंपनियों को बुलाने की जल्दबाज़ी में, राज्यों ने शायद ही कभी उनसे इतनी भी स्थानीय नौकरी देने का कोई कानूनी वादा लिया हो।
आंध्र प्रदेश में, अमेरिकी IT कंपनी गूगल को खुश करने की जल्दबाजी में, स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व ने इसके डेटा सेंटर को ” वितरण कंपनी” के तौर पर दर्ज किया है। इसका मतलब है कि डेटा सेंटर को अब उस औद्योगिक उपभोक्ता के तौर पर नहीं देखा जाएगा जिसे राज्य की वितरण कंपनी यानी APEPDCL सर्विस देती है; लेकिन साथ ही, राज्य की बिजली बनाने और पारेषण करने वाली कंपनियों और APEPDCL पर ही ज़रूरी अतिरिक्त बिजली बनाने और T&D सुविधाओं में निवेश करने की ज़िम्मेदारी बनी रहेगी। अगर डेटा सेंटर किसी दूसरे औद्योगिक उपभोक्ता की तरह APEPDCL का उपभोक्ता होता, तो उस पर आम औद्योगिक शुल्कदर लागू होता, जिससे APEPDCL ग्रामीण इलाकों और पिछड़े उपभोक्ता समूह तक बिजली पहुँचाने के लिए क्रॉस-सब्सिडी दे पाती। डेटा सेंटर के पक्ष में राज्य सरकार के इस संदिग्ध अधिसूचना की वजह से, राज्य की बिजली कंपनियों को T&D नेटवर्क पर 500-700 करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश का बोझ उठाना पड़ेगा। इसका असर यह होगा कि खुदरा उपभोक्ता के लिए शुल्कदर 0.20-0.30 रुपये प्रति इकाई बढ़ जाएगा। इसके अलावा, राज्य की बिजली बनाने वाली कंपनियों को भी ज़्यादा सीमांत लागत पर अतिरिक्त बिजली बनाने की क्षमता तैयार करनी होगी।
साल में 90% से ज़्यादा समय तक काम करने वाले डेटा सेंटर, राज्य की बिजली कंपनियों पर भारी मांग डालते हैं। डेटा सेंटर में मांग में उतार-चढ़ाव से ग्रिड की स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता है।
यह अजीब बात है कि अमेरिका जैसे देशों में स्थानीय नियामक डेटा सेंटर्स पर बिजली की ज़्यादा दरें लागू कर रहे हैं, जबकि हमारे नेता उनके साथ बहुत नरमी बरत रहे हैं और उन्हें रियायत वाली दरें दे रहे हैं।
राज्य द्वारा Google डेटा सेंटर जैसे बड़े उपभोक्ता को वितरण कंपनी के तौर पर अधिसूचित करने की वैधता पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
हमारा मानना है कि जिन राज्यों में डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं, उन्हें ग्रिड और T&D नेटवर्क पर डेटा सेंटर के तकनीकी और आर्थिक असर, और दूसरे खुदरा ग्राहकों को बिजली आपूर्ति करने की लागत पर पड़ने वाले असर का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र जाँच करवानी चाहिए। साथ ही, इस जाँच को सार्वजनिक क्षेत्र में और राज्य बिजली नियामक आयोगों के देखने के लिए भी उपलब्ध कराना चाहिए।
यह देखते हुए कि डेटा सेंटर्स से होने वाले सामाजिक नुकसान, उनसे मिलने वाले सामाजिक फायदों से कहीं ज़्यादा हैं, हम केंद्र और राज्य सरकारों से अपील करते हैं कि वे उन रियायतों पर फिर से विचार करें जो कर देने वालों, बिजली उपभोक्ताओं, ज़मीन गंवाने वालों और आम जनता की कीमत पर दी गई हैं।
अपने बहुत बड़े डिजिटल उपयोगकर्ता आधार और मोबाइल के भारी इस्तेमाल की वजह से, भारत दुनिया का लगभग 20% डेटा बनाता है। हालांकि, इसमें से सिर्फ़ 3% से 10% डेटा ही देश के अंदर इकट्ठा और संसाधित किया जाता है। भारत में बनने वाले ज़्यादातर डेटा को बाहर भेजा जाता है, जहाँ बड़ी वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियाँ उसे संसाधित करती हैं और फिर वापस बेचती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MEITY) 2020 में एक डेटा सेंटर नीति लेकर आया था, लेकिन उसने इसे अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया है। अब समय आ गया है कि हम एक ऐसी व्यापक डेटा सेंटर नीति लागू करें जो डेटा इकट्ठा, डेटा संसाधित और AI एप्लीकेशन के क्षेत्र में स्वदेशी क्षमताएं विकसित करने पर ज़ोर दे। हमारी रणनीति में CPSEs की मुख्य भूमिका तय होनी चाहिए और इसमें घरेलू शैक्षणिक संस्थानों और स्टार्ट-अप्स को भी शामिल किया जाना चाहिए।
भारत को लोगों की डेटा गोपनीयता की सुरक्षा के लिए एक मज़बूत कानूनी ढांचा बनाना चाहिए और ऐसे कानूनी उपाय करने चाहिए जो अमेरिकी IT कंपनियों को अमेरिकी अधिकारियों को रणनीतिक घरेलू डेटाबेस का एक्सेस देने से रोक सकें।
लंबे समय में, भारत को अपने खुद के सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड घरेलू ईमेल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विकसित करने चाहिए, ताकि विदेशी नियंत्रण वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हमारी निर्भरता कम हो सके।
खासकर, हमें लगता है कि भारत को एलन मस्क की स्पेसलिंक जैसी विदेशी संस्था के हमारे उपग्रह स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था पर फिर से विचार करना चाहिए। भारत को आम लोगों और रक्षा, दोनों ही कामों के लिए GPS की जगह एक मज़बूत नेविगेशन सिस्टम की ज़रूरत है। मौजूदा NAVIC सिस्टम को और मज़बूत बनाने के लिए, ऑर्बिट में अत्याधुनिक एटॉमिक क्लॉक वाले और ज़्यादा समर्पित उपग्रह स्थापित किए जाने चाहिए।
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सार्वजनिक क्षेत्र और सार्वजनिक सेवाओं पर जन आयोग (प्युपल्स कमीशन ऑन पब्लिक सेक्टर एंड पब्लिक सर्विसेज)
सार्वजनिक क्षेत्र और सार्वजनिक सेवाओं पर जन आयोग (PCPSPS) के बारे में: इस आयोग में जाने-माने शिक्षाविद, कानून विशेषज्ञ, पूर्व प्रशासक, ट्रेड यूनियन के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। PCPSPS का मकसद है कि वह नीति बनाने की प्रक्रिया से जुड़े सभी लोगों और सरकारी संपत्तियों/कंपनियों को मुद्रीकरण करने, उनमें विनिवेश करने और उनका निजीकरण करने के सरकार के फ़ैसले का विरोध करने वालों के साथ गहराई से बातचीत करे और अंतिम रिपोर्ट जारी करने से पहले कई क्षेत्र –विशिष्ट रिपोर्ट तैयार करे। यहाँ आयोग की पहली अंतरिम रिपोर्ट दी गई है – निजीकरण: भारतीय संविधान का अपमान।
अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें:
थॉमस फ्रेंको
पूर्व महासचिव, ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन और पीपुल फर्स्ट
संपर्क: +91 9445000806
