कामगार एकता कमिटी (KEC) के संवाददाता की रिपोर्ट

विद्युत कर्मचारी संयुक्त कृति समिति, उत्तर प्रदेश ने एक बार फिर मांग की है कि यूपी पावर कॉरपोरेशन सभी संवर्गों के श्रमिकों और कर्मचारियों के कैडर पुनर्गठन का व्यापक अभ्यास तत्काल करे तथा पिछले नौ वर्षों में बिजली उपभोक्ताओं की संख्या में हुई भारी वृद्धि को ध्यान में रखते हुए सभी स्तरों पर कर्मचारियों की संख्या बढ़ाए।
समिति ने बताया कि एक ओर यूपी पावर कॉरपोरेशन का प्रबंधन बड़े गर्व से घोषणा करता है कि यूपी पावर कॉरपोरेशन के पास देश में सबसे अधिक उपभोक्ता हैं, लेकिन दूसरी ओर वह अपने कर्मचारियों की दयनीय स्थिति को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करता है। संघर्ष समिति ने कहा कि वर्ष 2000 में लगभग 60 लाख उपभोक्ता और 1.2 लाख कर्मचारी थे, जबकि आज स्थायी कर्मचारियों की संख्या 30,000 से भी कम रह गई है, जबकि उपभोक्ताओं की संख्या छह गुना से अधिक बढ़कर लगभग 3.75 करोड़ हो गई है। स्थिति को और भी खराब बनाते हुए, निजीकरण की मुहिम के तहत लगभग 25,000 ठेका श्रमिकों को सेवा से हटा दिया गया है।
अपर्याप्त कार्यबल न केवल वर्तमान कर्मचारियों पर कार्यभार को अत्यधिक बढ़ाता है, बल्कि उपभोक्ताओं को दी जाने वाली सेवाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
समिति ने यह भी मांग की है कि पर्याप्त पदोन्नति के अवसर भी बनाए जाएँ ताकि कर्मचारी वर्षों तक एक ही ग्रेड या पद पर बने रहने के कारण हतोत्साहित न हों।
संघर्ष समिति ने यह भी बताया कि इन सबके ऊपर, यूपी पावर कॉरपोरेशन ने समिति के मजबूत और तार्किक विरोध के बावजूद बिजली वितरण की वर्टिकल प्रणाली को जबरन लागू कर दिया है। यह कदम यूपी सरकार ने बिजली वितरण को निजीकरण के लिए तैयार और उपयुक्त बनाने के उद्देश्य से उठाया है। इस नई प्रणाली को लागू करने के तहत बड़ी संख्या में स्थायी पद समाप्त कर दिए गए हैं और भारी संख्या में ठेका श्रमिकों को नौकरी से निकाल दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप कार्यभार में अत्यधिक वृद्धि हुई है। पहले एक सहायक अभियंता 3 से 4 उपकेंद्रों की जिम्मेदारी संभालता था, लेकिन अब वह 8 से 10 उपकेंद्रों के लिए जिम्मेदार है। कई तकनीकी कर्मचारियों को बिल वसूली का अतिरिक्त कार्य सौंप दिया गया है, जिसके कारण उपकेंद्रों और बिजली आपूर्ति लाइनों के रखरखाव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिससे खराबियों की संख्या बढ़ी है और उन्हें ठीक करने में अधिक समय लग रहा है। इसलिए वे मांग कर रहे हैं कि नई लागू की गई वर्टिकल प्रणाली को तत्काल समाप्त किया जाए, पुरानी व्यवस्था को बहाल किया जाए, सभी रिक्त पदों को तुरंत भरा जाए और सेवा से निकाले गए अनुभवी ठेका श्रमिकों को पुनः नियुक्त किया जाए।
देशभर के पूरे बिजली क्षेत्र में स्थिति इसी प्रकार की है।
स्थायी कर्मचारियों की संख्या में भारी कमी और बड़ी संख्या में रिक्त पद सार्वजनिक क्षेत्र के सभी उपक्रमों की साझा समस्या है। चाहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हों, भारतीय रेल हो, विभिन्न राज्य परिवहन उपक्रम हों, सरकारी स्वास्थ्य अस्पताल और औषधालय हों, स्कूल और कॉलेज हों, कोयला तथा अन्य खदानें हों, दूरसंचार, बीमा, इस्पात उद्योग या विभिन्न राज्य सरकारों के विभाग हों—इन सभी में पिछले तीन दशकों में जिन उपभोक्ताओं को वे सेवाएँ प्रदान करते हैं उनकी संख्या कई गुना बढ़ी है, जबकि स्थायी कर्मचारियों की संख्या में नाटकीय रूप से कमी आई है। इसलिए सभी उपभोक्ताओं को उचित सेवा प्रदान करने के लिए आवश्यक कार्यबल का पुनर्गणना करना तथा सभी रिक्त पदों को स्थायी कर्मचारियों से भरना एक ऐसी साझा और एकजुट करने वाली मांग है, जिसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में कार्यरत सभी श्रमिकों को बिना किसी समझौते के एकजुट होकर उठाना चाहिए।
सभी मेहनतकश लोगों के लिए इन न्यायसंगत मांगों का समर्थन करना आवश्यक है।
